10 अगस्त 2025, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और प्रगतिशील फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं, तो महिला को भरण-पोषण का अधिकार प्राप्त होता है, भले ही उनके बीच कानूनी विवाह के प्रमाण न हों।
फैसले की मुख्य बातें:
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पति-पत्नी जैसे रिश्ते को मान्यता: कोर्ट ने कहा कि यदि कोई जोड़ा समाज की नजर में पति-पत्नी की तरह वर्षों से साथ रह रहा है, तो इस रिश्ते को पूरी तरह नकारना न्याय के उद्देश्य के विपरीत होगा।
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कानून का उद्देश्य: अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का असली मकसद न्याय प्रदान करना है, न कि उन रिश्तों को नजरअंदाज करना जिन्हें समाज में मान्यता प्राप्त है, भले ही वे दस्तावेजी रूप से प्रमाणित न हों।
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भरण-पोषण का अधिकार: ऐसे मामलों में महिला को भरण-पोषण देने से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसका जीवन, सम्मान और अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना एक वैध पत्नी का।
न्याय का नया दृष्टिकोण
इस निर्णय से उन महिलाओं को राहत मिलेगी जो ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में रह चुकी हैं या समाज की नजर में पत्नी की तरह जीवन बिता चुकी हैं, लेकिन दस्तावेजी विवाह न होने के कारण न्याय से वंचित रह जाती थीं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली में एक सकारात्मक बदलाव की ओर संकेत करता है। यह न सिर्फ संवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि न्याय केवल दस्तावेजों पर आधारित नहीं, बल्कि यथार्थ और समाज में प्रचलित व्यवहार पर भी आधारित हो सकता है।




