हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब! अदालत ने केंद्र व राज्यों से मांगी त्वरित कार्ययोजना

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सुप्रीम कोर्ट ने देश में बच्चों के लगातार लापता होने की घटनाओं पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि यदि यह रिपोर्ट सही है कि भारत में हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब हो रहा है, तो इसे तात्कालिक रूप से राष्ट्रीय संकट के रूप में देखा जाना चाहिए। अदालत ने सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर की, जिसमें बताया गया था कि विभिन्न राज्यों से बच्चों के गायब होने की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह सिर्फ एक सांख्यिकी नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की पीड़ा है जिनके बच्चे अचानक गायब हो जाते हैं और जिनकी खोज के लिए ठोस एवं समयबद्ध तंत्र अभी भी पूरी तरह सक्षम नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्यों से इस विषय पर समन्वित रणनीति बनाने का निर्देश दिया। अदालत ने सुझाव दिया कि हर राज्य में नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएं और एक केंद्रीय ऑनलाइन पोर्टल बनाया जाए, जहां किसी बच्चे के लापता होने की जानकारी तुरंत दर्ज की जा सके। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसी प्रणाली न केवल पुलिस और बाल कल्याण समितियों को समय पर जानकारी देगी बल्कि देशभर में त्वरित अलर्ट जारी करने में भी मददगार होगी। अदालत ने यह चिंता भी जताई कि यदि गोद लेने की प्रक्रिया बेहद जटिल और धीमी बनी रहती है, तो अवैध तौर पर बच्चों के लेन-देन की संभावना बढ़ जाती है, जिससे तस्करी जैसे अपराधों को बल मिलता है।

सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि अलग-अलग वर्षों में बच्चों के लापता होने के आंकड़ों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। उदाहरण के लिए, 2023 के आसपास जारी रिपोर्टों में यह सामने आया था कि देश में एक वर्ष में लगभग एक लाख बच्चे लापता हुए थे। इसमें से कई बच्चे तस्करी, जबरन मजदूरी, यौन शोषण, अवैध गोद लेने और संगठित अपराध नेटवर्क का शिकार बनते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सटीक और अद्यतन आंकड़े उपलब्ध न होने से समस्या की वास्तविक गंभीरता को समझना मुश्किल हो जाता है, इसलिए केंद्र और राज्यों को डेटा प्रबंधन की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए।

अदालत ने आगे कहा कि बच्चों की सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और प्रशासनिक प्राथमिकता का भी मुद्दा है। पुलिस व्यवस्था, सामाजिक संगठनों, चाइल्ड वेलफेयर कमेटियों और बाल संरक्षण एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल होने से कई बच्चों को समय रहते खोजा जा सकता है। इसलिए अदालत ने निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज होते ही डेटा तुरंत पोर्टल पर अपलोड किया जाए और राज्यों को अपनी रिपोर्ट समयबद्ध ढंग से केंद्र को भेजनी चाहिए। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बच्चों के गायब होने के मामलों में देरी किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद उम्मीद है कि केंद्र व राज्य सरकारें अधिक त्वरित और प्रभावी बाल सुरक्षा प्रणाली विकसित करेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक तस्करी के नेटवर्क पर सख्ती नहीं होगी, सामाजिक जागरूकता नहीं बढ़ेगी और पुलिस बल को विशेष प्रशिक्षण नहीं मिलेगा, तब तक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार संभव नहीं है। अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा राष्ट्र की प्राथमिक जिम्मेदारी है और यदि समय रहते निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या आने वाले वर्षों में और गंभीर रूप ले सकती है।

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