महिलाओं के अधिकार और आस्था का संतुलन तय करेगी 9 जजों की बेंच

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नई दिल्ली में स्थित Supreme Court of India ने केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े बहुचर्चित मामले पर सुनवाई के लिए नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ गठित करने का निर्णय लिया है। यह पीठ 7 अप्रैल 2026 से मामले की विस्तृत सुनवाई शुरू करेगी। अदालत का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह मामला धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के समान अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा है, जिस पर देशभर में व्यापक बहस हो चुकी है।

सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लंबे समय से परंपरागत प्रतिबंध लागू था। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में इस आयु-आधारित रोक को असंवैधानिक ठहराते हुए सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। हालांकि, इस निर्णय के बाद कई धार्मिक संगठनों और श्रद्धालुओं ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर कीं, जिसके चलते मामला बड़ी संविधान पीठ को संदर्भित किया गया। अब नौ जजों की यह पीठ न केवल सबरीमाला प्रकरण, बल्कि अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर भी विचार करेगी।

अदालत ने सभी पक्षों को 14 मार्च 2026 तक अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है, ताकि सुनवाई सुव्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ सके। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 7 से 9 अप्रैल तक याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनी जाएंगी, इसके बाद 14 से 16 अप्रैल तक विरोधी पक्ष अपने तर्क प्रस्तुत करेगा। आवश्यकता पड़ने पर 21 अप्रैल को जवाबी दलीलों पर सुनवाई होगी और 22 अप्रैल को एमिकस क्यूरी की सहायता से बहस का समापन किया जाएगा।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का फैसला केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह देशभर में धार्मिक स्वतंत्रता, आस्था, लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश तय करेगा। ऐसे में 7 अप्रैल से शुरू होने वाली यह सुनवाई भारतीय न्यायिक इतिहास की एक अहम कड़ी मानी जा रही है, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।

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