लखनऊ में आयोजित एक प्रबुद्धजन संवाद कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी चुनौती हिंदू समाज को संगठित और जागरूक बनाना है। उन्होंने कहा कि समाज के भीतर चेतना, एकता और जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किए बिना व्यापक परिवर्तन संभव नहीं है। उनका यह वक्तव्य लखनऊ स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान विभिन्न सवालों के जवाब में सामने आया, जहां सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक विषयों पर खुलकर चर्चा हुई।
मंदिरों की आय के मुद्दे पर भागवत ने स्पष्ट रूप से कहा कि देश के मंदिरों में आने वाली धनराशि का उपयोग व्यापक जनकल्याण के लिए किया जाना चाहिए। उनके अनुसार यह धन केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा कार्यों और सामाजिक उत्थान जैसे क्षेत्रों में लगाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिरों के संसाधनों का प्रबंधन पारदर्शी और जिम्मेदार तरीके से होना चाहिए तथा इसमें श्रद्धालुओं और समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए, न कि इसे पूर्ण रूप से सरकारी नियंत्रण में रखा जाए।
राजनीतिक संबंधों को लेकर उठे सवाल पर उन्होंने कहा कि संघ किसी भी सरकार को ‘रिमोट कंट्रोल’ से संचालित नहीं करता। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय जनता पार्टी सहित किसी भी दल की सरकार स्वतंत्र रूप से कार्य करती है और संघ केवल वैचारिक सुझाव दे सकता है, शासन संचालन उसका कार्य नहीं है। भागवत ने यह भी माना कि जब किसी दल की सरकार बनती है तो कुछ अवसरवादी लोग लाभ के उद्देश्य से संगठन से जुड़ने का प्रयास करते हैं, जिससे समर्पित कार्यकर्ताओं को असहजता होती है। उन्होंने ऐसे लोगों को आत्ममंथन करने और संगठन के मूल उद्देश्यों के प्रति निष्ठा रखने की सलाह दी।
अपने वक्तव्य में उन्होंने समाज की जनसंख्या और पारिवारिक संरचना जैसे विषयों पर भी विचार रखे और कहा कि सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए परिवार और समाज दोनों को दीर्घकालिक दृष्टि से सोचने की आवश्यकता है। कुल मिलाकर उनका संबोधन संघ की सामाजिक भूमिका, मंदिर संसाधनों के उपयोग और राजनीतिक संबंधों को लेकर संगठन की आधिकारिक सोच को स्पष्ट करने वाला रहा।




