अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित परमाणु वार्ता से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के प्रशासन ने ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय के तहत काम करने वाले Office of Foreign Assets Control (OFAC) ने करीब 30 व्यक्तियों, कंपनियों और कुछ जहाजों को प्रतिबंध सूची में शामिल किया है। इन पर आरोप है कि ये ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, ड्रोन नेटवर्क और कथित रूप से गुप्त तेल निर्यात तंत्र को वित्तीय और लॉजिस्टिक सहायता प्रदान कर रहे थे।
अमेरिका का कहना है कि ये प्रतिबंध ईरान की उस “शैडो फ्लीट” को निशाना बनाते हैं, जिसके माध्यम से कथित तौर पर प्रतिबंधों के बावजूद ईरानी तेल का निर्यात जारी रहा। नए कदम के तहत सूचीबद्ध व्यक्तियों और कंपनियों की अमेरिका में मौजूद संपत्तियां फ्रीज की जाएंगी और अमेरिकी संस्थाओं को उनके साथ किसी भी प्रकार का व्यापार या वित्तीय लेन-देन करने से रोका जाएगा। प्रशासन का दावा है कि इस कार्रवाई का उद्देश्य ईरान पर अधिकतम दबाव बनाना और उसे परमाणु कार्यक्रम पर सख्त शर्तें स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना है।
यह निर्णय ऐसे समय लिया गया है जब दोनों देशों के प्रतिनिधि स्विट्जरलैंड के Geneva में परमाणु कार्यक्रम को लेकर वार्ता की तैयारी कर रहे हैं। चर्चा का केंद्र 2015 के परमाणु समझौते, यानी Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA), को लेकर आगे की राह तय करना है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम और मिसाइल गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण स्वीकार करे, जबकि ईरान का कहना है कि प्रतिबंध हटाए बिना किसी भी समझौते की गुंजाइश सीमित रहेगी।
ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों की निंदा करते हुए इसे कूटनीतिक प्रक्रिया को कमजोर करने वाला कदम बताया है। तेहरान का दावा है कि वह वार्ता के लिए तैयार है, लेकिन दबाव की नीति के बीच रचनात्मक संवाद कठिन हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन की यह रणनीति वार्ता से पहले अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश है, जिससे अमेरिका को बातचीत की मेज पर बढ़त मिल सके।
वर्तमान हालात में यह स्पष्ट है कि परमाणु वार्ता से पहले तनाव का स्तर बढ़ा हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या प्रतिबंधों के बावजूद दोनों देश कूटनीतिक समाधान की दिशा में ठोस प्रगति कर पाते हैं या फिर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है।




