पश्चिम एशिया तनाव पर कांग्रेस नेता का बयान, स्वेज संकट से की तुलना

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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी संकट के बीच जयराम रमेश ने 1956 के स्वेज संकट को याद करते हुए भारत की कूटनीतिक भूमिका पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात काफी हद तक उस दौर से मिलते-जुलते हैं, जब दुनिया एक बड़े भू-राजनीतिक टकराव का सामना कर रही थी और भारत ने शांति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रमेश ने बताया कि 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर द्वारा स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के बाद हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए थे, जिसके बाद ब्रिटेन, फ्रांस और इज़राइल ने मिस्र पर सैन्य कार्रवाई की और वैश्विक संकट गहरा गया।

उन्होंने आगे कहा कि उस समय भारत के वरिष्ठ राजनयिक वी.के. कृष्ण मेनन ने संयुक्त राष्ट्र में कूटनीतिक प्रयासों का नेतृत्व किया और संघर्ष को शांत कराने में अहम भूमिका निभाई। संयुक्त राष्ट्र आपातकालीन बल (UNEF) की तैनाती में भी भारत की सक्रिय भागीदारी रही, जहां भारतीय सैन्य अधिकारियों ने शांति स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया। रमेश के अनुसार, यह भारत की संतुलित और प्रभावी कूटनीति का एक प्रमुख उदाहरण था, जिसने वैश्विक स्तर पर देश की साख को मजबूत किया।

वर्तमान संदर्भ में होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ रहा है, क्योंकि यह मार्ग दुनिया के बड़े हिस्से के तेल परिवहन के लिए बेहद अहम माना जाता है। जहाजों की आवाजाही पर असर और तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसी स्थितियां सामने आ रही हैं। ऐसे में जयराम रमेश ने संकेत दिया कि भारत को एक बार फिर संतुलित और सक्रिय कूटनीति अपनाने की जरूरत है, ताकि क्षेत्रीय तनाव को कम किया जा सके और वैश्विक स्तर पर स्थिरता बनाए रखने में योगदान दिया जा सके।

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