भारत के Supreme Court of India ने दुष्कर्म मामलों में पीड़िताओं की पहचान उजागर किए जाने पर कड़ा रुख अपनाते हुए देशभर की अदालतों, विशेषकर हाईकोर्ट्स को सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी न्यायिक आदेश, रिकॉर्ड या दस्तावेज में पीड़िता की पहचान उजागर नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि यह उसकी निजता और गरिमा का गंभीर उल्लंघन है। शीर्ष अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि कई मामलों में फैसलों और दस्तावेजों में पीड़िताओं के नाम या पहचान से जुड़ी जानकारी दर्ज की जा रही है, जो पूरी तरह से अवैध है और इसे तत्काल रोका जाना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे इस संबंध में लागू कानूनी प्रावधानों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें और यह भी ध्यान रखें कि लंबित मामलों में भी पीड़िताओं की पहचान गोपनीय रखी जाए। अदालत ने दोहराया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 228A के तहत दुष्कर्म पीड़िता की पहचान उजागर करना दंडनीय अपराध है और किसी भी माध्यम—चाहे वह मीडिया हो या न्यायिक दस्तावेज—में ऐसी जानकारी प्रकाशित नहीं की जा सकती जिससे पीड़िता की पहचान सामने आए।
अदालत ने यह भी कहा कि यह कोई नया नियम नहीं है, बल्कि लंबे समय से लागू है, लेकिन इसके बावजूद इसका पालन सही तरीके से नहीं हो रहा है, जो एक गंभीर चूक है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि पीड़िता को किसी सामान्य गवाह की तरह रिकॉर्ड में दर्ज करना बेहद चिंताजनक है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए। साथ ही, यह निर्देश केवल नए मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी लंबित मामलों पर भी लागू होगा। सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता-केंद्रित न्याय व्यवस्था पर बल देते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़िताओं की गरिमा, सुरक्षा और निजता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।




