पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को गहरे संकट में डाल दिया है, जहां Strait of Hormuz में बाधा के चलते रोजाना 8 से 10 मिलियन बैरल तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञ इसे 1973 के तेल संकट के बाद सबसे गंभीर स्थिति मान रहे हैं, क्योंकि दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरती है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते टकराव के कारण इस महत्वपूर्ण जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर गहरा असर पड़ा है।
हालात ऐसे बन गए हैं कि कई तेल टैंकर समुद्र में ही फंसे हुए हैं और प्रमुख शिपिंग कंपनियों ने सुरक्षा कारणों से अपने संचालन सीमित या बंद कर दिए हैं। इसके चलते वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ गया है और कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से बढ़ते हुए 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं और विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि संकट लंबे समय तक जारी रहा तो यह कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है।
हालांकि कुछ तेल उत्पादक देशों ने वैकल्पिक मार्गों के जरिए आपूर्ति बनाए रखने की कोशिश की है, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है। सामान्य परिस्थितियों में होर्मुज जलडमरूमध्य से लगभग 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल गुजरता है, जबकि पाइपलाइनों जैसे वैकल्पिक साधनों की क्षमता इससे काफी कम है। ऐसे में पूरी तरह से सप्लाई बाधित होने की स्थिति में वैश्विक ऊर्जा संकट और गहरा सकता है।
इस संकट का सबसे अधिक असर एशियाई देशों पर पड़ रहा है, जो खाड़ी क्षेत्र से तेल आयात पर काफी निर्भर हैं। भारत, चीन और जापान जैसे देशों के लिए यह स्थिति ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक स्थिरता के लिए भी चुनौती बनती जा रही है। कई देशों में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हो चुकी है, जिससे महंगाई पर दबाव बढ़ रहा है।
कुल मिलाकर, होर्मुज में उत्पन्न यह संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। यदि जल्द ही कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो तेल की कीमतों में लंबी अवधि तक तेजी बनी रह सकती है और इसका व्यापक असर दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं पर देखने को मिल सकता है।




