अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर जारी तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई अहम वार्ता के विफल होने के बाद हालात और अधिक संवेदनशील हो गए हैं। इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने दोहराया है कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने इस मुद्दे को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता से जुड़ा बताते हुए कड़ा रुख स्पष्ट किया है।
इस्लामाबाद में आयोजित इस उच्चस्तरीय वार्ता में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों ने कई घंटों तक बातचीत की, लेकिन कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी। अमेरिका की ओर से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर सख्त नियंत्रण या उसे पूरी तरह रोकने का प्रस्ताव रखा गया था, जबकि ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बताते हुए अस्वीकार कर दिया। वार्ता के असफल होने के बाद दोनों देशों के बीच अविश्वास और बढ़ गया है।
वार्ता विफल होते ही अमेरिका ने रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। यह इलाका वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है, जहां किसी भी प्रकार का तनाव अंतरराष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकता है। अमेरिका की ओर से समुद्री नाकाबंदी जैसे कदम उठाए जाने की खबरों ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान ने अपनी नीतियों में बदलाव नहीं किया, तो अमेरिका और भी कड़े कदम उठा सकता है, जिनमें सैन्य विकल्प भी शामिल हो सकते हैं।
हालांकि, इस तनावपूर्ण स्थिति के बीच ट्रंप ने यह भी दावा किया है कि ईरान की ओर से बातचीत के लिए संपर्क किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि कूटनीतिक समाधान की संभावना अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर यूरोपीय देशों ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए दोनों पक्षों से संयम बरतने और वार्ता के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टकराव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, व्यापारिक अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। पाकिस्तान, जिसने इस वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी, अब भी दोनों देशों के बीच संवाद बहाल करने की कोशिश में जुटा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कूटनीतिक प्रयास सफल होते हैं या फिर यह संकट और गहराता ।




