दुनिया इस समय एक गंभीर रोजगार संकट की ओर बढ़ रही है, जहां आने वाले वर्षों में युवाओं के लिए पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध होना एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। हालिया वैश्विक आकलनों के अनुसार, अगले 10 से 15 वर्षों में लगभग 1.2 अरब (120 करोड़) युवा कामकाजी उम्र में प्रवेश करेंगे, लेकिन मौजूदा रुझानों के आधार पर केवल करीब 40 करोड़ नौकरियां ही सृजित हो पाएंगी। इसका अर्थ है कि लगभग 80 करोड़ नौकरियों का भारी अंतर पैदा होगा, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और सामाजिक संतुलन पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। विश्व बैंक समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इस स्थिति को लेकर चिंता जताई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह संकट खासतौर पर विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अधिक गहरा होगा, जहां युवाओं की आबादी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन रोजगार सृजन की गति उतनी तेज नहीं है। इस असंतुलन के पीछे कई प्रमुख कारण हैं, जिनमें कौशल और उद्योग की मांग के बीच अंतर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन जैसी नई तकनीकों का तेजी से बढ़ता प्रभाव, निवेश की कमी और श्रम बाजार की नीतिगत बाधाएं शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, वर्तमान में भी दुनिया में करोड़ों युवा बेरोजगार हैं और बड़ी संख्या में ऐसे युवा हैं जो न तो शिक्षा में हैं और न ही किसी रोजगार या प्रशिक्षण से जुड़े हुए हैं।
इस बढ़ते संकट का प्रभाव केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके सामाजिक और राजनीतिक परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इससे सामाजिक असंतोष, असमानता, अवैध प्रवासन और अपराध दर में वृद्धि जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। ऐसे में सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे रोजगार सृजन, कौशल विकास, निजी निवेश को बढ़ावा देने और हरित ऊर्जा, स्वास्थ्य एवं बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा करने पर ध्यान दें।
कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि दुनिया एक बड़े “रोजगार संकट” के मुहाने पर खड़ी है। 1.2 अरब युवाओं के सामने सीमित अवसर न केवल आर्थिक विकास के लिए चुनौती हैं, बल्कि यह वैश्विक स्थिरता के लिए भी खतरा बन सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि दुनिया इस चुनौती को अवसर में बदल पाती है या यह संकट और गहराता चला जाता है।




