किसानों के लिए मुश्किल साल! लू और एल नीनो से प्रभावित होगा उत्पादन

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भारत में इस वर्ष कृषि क्षेत्र के सामने गंभीर चुनौतियां उभरती नजर आ रही हैं। एक ओर भीषण गर्मी और लगातार बढ़ती लू की घटनाएं हैं, तो दूसरी ओर मानसून के सामान्य से कम रहने का अनुमान किसानों की चिंताओं को और गहरा कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी एजेंसियों Food and Agriculture Organization (FAO) और World Meteorological Organization (WMO) की ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ती गर्मी अब वैश्विक खाद्य प्रणाली के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है और भारत जैसे कृषि-निर्भर देशों पर इसका असर ज्यादा गंभीर हो सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, लू की तीव्रता और आवृत्ति में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे फसलों, पशुधन और कृषि कार्यों पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में मामूली वृद्धि भी फसलों की उत्पादकता को प्रभावित करती है, और हर 1 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने पर प्रमुख फसलों की पैदावार में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की जा सकती है। इसका असर विशेष रूप से धान, गेहूं और दालों जैसी जरूरी फसलों पर पड़ सकता है, जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

भारत के संदर्भ में स्थिति और भी चिंताजनक है। गंगा और सिंधु नदी बेसिन जैसे प्रमुख कृषि क्षेत्रों में लू का प्रभाव सबसे अधिक रहने की आशंका जताई गई है। इन इलाकों में अत्यधिक गर्मी के कारण न केवल फसलें प्रभावित होंगी, बल्कि कृषि श्रमिकों की कार्यक्षमता भी घट सकती है, जिससे उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।

इसी बीच, India Meteorological Department ने 2026 के मानसून के सामान्य से कम रहने की संभावना जताई है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे El Niño की सक्रियता एक प्रमुख कारण हो सकती है, जो बारिश के पैटर्न को प्रभावित करती है। भारत में लगभग 70 प्रतिशत खेती मानसून पर निर्भर है, ऐसे में वर्षा में कमी का सीधा असर बुवाई, सिंचाई और मिट्टी की नमी पर पड़ेगा।

कम बारिश के चलते चावल, गेहूं, सोयाबीन और दालों जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका है, जिससे किसानों की आय पर भी असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लू और कमजोर मानसून का संयुक्त प्रभाव कृषि क्षेत्र के लिए ‘रिस्क मल्टीप्लायर’ साबित हो सकता है, जो उत्पादन और खाद्य आपूर्ति दोनों को प्रभावित करेगा।

ऐसे में रिपोर्ट में सरकारों को सलाह दी गई है कि वे समय रहते कदम उठाएं। इसमें मौसम आधारित चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना, जल प्रबंधन में सुधार करना, सूखा-रोधी और जलवायु-लचीली फसलों को बढ़ावा देना तथा नई कृषि तकनीकों को अपनाना शामिल है। कुल मिलाकर, यदि समय रहते प्रभावी रणनीति नहीं अपनाई गई, तो इसका असर न केवल किसानों की आजीविका पर पड़ेगा, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।

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