अमेरिका-ईरान गतिरोध गहराया, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ा खतरा

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अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान की ओर से भेजे गए युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिसके बाद पश्चिम एशिया में हालात और अधिक संवेदनशील हो गए हैं। बताया जा रहा है कि ईरान ने पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका को अपना जवाब भेजा था, जिसमें उसने युद्ध समाप्त करने, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने और होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी दबाव कम करने जैसी शर्तें रखी थीं। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने इन मांगों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और साफ संकेत दिए कि यदि बातचीत सफल नहीं हुई तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई का रास्ता अपना सकता है। इस घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है और वैश्विक तेल बाजार में भी हलचल तेज हो गई है।

अमेरिका लगातार ईरान पर अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने का दबाव बना रहा है। वॉशिंगटन चाहता है कि तेहरान उच्च स्तर के यूरेनियम संवर्धन को रोके और अपने परमाणु ठिकानों को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में दे। दूसरी ओर ईरान का कहना है कि वह अपनी संप्रभुता और परमाणु अधिकारों से समझौता नहीं करेगा। दोनों देशों के बीच जारी इस टकराव का सबसे बड़ा असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर दिखाई दे रहा है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में गिना जाता है। हाल के दिनों में इस क्षेत्र में ड्रोन हमलों, समुद्री गतिविधियों और जहाजों पर बढ़ते खतरों ने वैश्विक समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने क्षेत्र में अपनी नौसैनिक गतिविधियां तेज कर दी हैं, जबकि ईरान ने चेतावनी दी है कि किसी भी सैन्य हस्तक्षेप का कड़ा जवाब दिया जाएगा।

इसी बीच Israel के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने भी ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि जब तक ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह नियंत्रित नहीं होता, तब तक संघर्ष समाप्त नहीं माना जा सकता। इजराइल ने लेबनान में हिज्बुल्लाह से जुड़े ठिकानों पर कार्रवाई बढ़ा दी है, जिससे पूरे क्षेत्र में संघर्ष फैलने की आशंका और बढ़ गई है। कुछ समय पहले अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच अस्थायी युद्धविराम की चर्चा जरूर हुई थी, लेकिन लगातार हो रहे हमलों और आरोप-प्रत्यारोप ने शांति प्रयासों को कमजोर कर दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में हालात और बिगड़ते हैं तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। भारत, चीन, जापान और यूरोप के कई देश इसी समुद्री मार्ग के जरिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करते हैं। ऐसे में यदि क्षेत्र में लंबा सैन्य संघर्ष या समुद्री नाकेबंदी होती है तो वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और महंगाई का दबाव भी तेज हो सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता यह तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक और सामरिक स्थिरता के लिए भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

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