भारत सरकार ने घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने और बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण पाने के उद्देश्य से चीनी के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार यह प्रतिबंध 30 सितंबर 2026 तक प्रभावी रहेगा या अगले आदेश तक लागू रह सकता है। सरकार ने कच्ची, सफेद और रिफाइंड चीनी को “प्रतिबंधित” श्रेणी में डालते हुए साफ किया है कि देश के भीतर उपभोक्ताओं के लिए चीनी की आपूर्ति और कीमतों को संतुलित रखना फिलहाल उसकी प्राथमिकता है। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है, क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है।
सरकार का यह निर्णय ऐसे समय आया है जब देश में चीनी उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ रही है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में कमजोर उत्पादन के संकेत मिले हैं, जबकि मौसम विशेषज्ञों ने एल-नीनो के प्रभाव के कारण मानसून प्रभावित होने की आशंका जताई है। माना जा रहा है कि इन परिस्थितियों का असर गन्ने की फसल और आगामी चीनी उत्पादन पर पड़ सकता है। इसी संभावना को देखते हुए केंद्र सरकार ने निर्यात रोककर घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देने का फैसला किया है ताकि आने वाले महीनों में बाजार में किसी प्रकार की कमी या कीमतों में तेज उछाल की स्थिति पैदा न हो।
हालांकि सरकार ने कुछ विशेष मामलों में राहत भी दी है। यूरोपीय संघ और अमेरिका को विशेष कोटा व्यवस्था के तहत होने वाला निर्यात जारी रहेगा। इसके अलावा एडवांस ऑथराइजेशन स्कीम के अंतर्गत आने वाले निर्यात और वे खेपें जो पहले से बंदरगाहों तक पहुंच चुकी हैं या जिनकी लोडिंग प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, उन्हें भी अनुमति दी जाएगी। इससे उन व्यापारियों और निर्यातकों को आंशिक राहत मिलने की उम्मीद है जिन्होंने पहले ही अंतरराष्ट्रीय सौदे कर लिए थे।
रिपोर्ट्स के अनुसार भारत ने इससे पहले लगभग 15.9 लाख मीट्रिक टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी, जिसमें से बड़ी मात्रा पहले ही विदेश भेजी जा चुकी है। अब अचानक लगाए गए प्रतिबंध से कई निर्यातकों के सामने अनुबंध पूरा करने की चुनौती खड़ी हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ऊर्जा कीमतों में उछाल और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव के बीच सरकार खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए सतर्क रुख अपना रही है। भारत के इस फैसले का असर वैश्विक चीनी बाजार पर भी पड़ सकता है और ब्राजील तथा थाईलैंड जैसे देशों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक अवसर मिल सकते।




