हिंद-प्रशांत में भारत का बढ़ता प्रभाव, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ रणनीतिक साझेदारी पर जोर

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा को भारत की हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) रणनीति के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस दौरे का उद्देश्य केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स), सुरक्षित वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, स्वच्छ ऊर्जा, रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में साझेदारी को नई गति देना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान के बीच उभरता सहयोग आने वाले वर्षों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की आर्थिक और सामरिक तस्वीर बदल सकता है तथा क्षेत्र में संतुलन और स्थिरता को मजबूत कर सकता है।

ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ के बीच होने वाली वार्षिक शिखर वार्ता में क्रिटिकल मिनरल्स, व्यापार, निवेश, यूरेनियम आपूर्ति, रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और उभरती प्रौद्योगिकियों पर विशेष चर्चा होने की संभावना है। ऑस्ट्रेलिया लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और दुर्लभ खनिजों का प्रमुख उत्पादक देश है, जिनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। भारत अपनी बढ़ती औद्योगिक जरूरतों और हरित ऊर्जा लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए इन खनिजों की दीर्घकालिक और सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग को और मजबूत करना चाहता है।

इस रणनीतिक सहयोग में जापान की भूमिका भी लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। भारत और जापान पहले से ही सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उच्च प्रौद्योगिकी, जहाज निर्माण, डिजिटल अवसंरचना और आर्थिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ा रहे हैं। दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त, समावेशी और नियम-आधारित व्यवस्था के समर्थक हैं। ऐसे में भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान के बीच बढ़ता तालमेल क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों, स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं, बैटरी निर्माण और सेमीकंडक्टर उद्योग के तेजी से विस्तार के कारण क्रिटिकल मिनरल्स की मांग लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा सीमित देशों पर निर्भर है, इसलिए भारत विश्वसनीय साझेदारों के साथ मिलकर वैकल्पिक और मजबूत आपूर्ति नेटवर्क विकसित करने पर जोर दे रहा है। इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि भविष्य में किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता भी कम की जा सकेगी।

प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और ‘महासागर (MAHASAGAR) विजन’ को आगे बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख देशों के साथ व्यापार, रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, निवेश और उन्नत प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर अपनी रणनीतिक उपस्थिति को और सशक्त करना चाहता है। साथ ही हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाले समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखलाओं की मजबूती और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था को भी प्राथमिकता दी जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान के बीच विकसित हो रहा यह रणनीतिक त्रिकोण केवल तीन देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की आर्थिक, सामरिक और भू-राजनीतिक संरचना पर पड़ेगा। महत्वपूर्ण खनिजों, स्वच्छ ऊर्जा, रक्षा सहयोग, उन्नत तकनीक और समुद्री सुरक्षा में बढ़ती साझेदारी आने वाले समय में क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक विकास और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक सुरक्षित, मजबूत और टिकाऊ बनाने में अहम भूमिका निभा सकती

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