जंतर-मंतर पर 36 दिनों तक चले छात्र आंदोलन के बाद केंद्र सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों में राहत देने के संकेत दिए गए हैं, लेकिन सभी एफआईआर वापस नहीं ली जाएंगी। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि केवल वे मामले वापस लेने की प्रक्रिया में शामिल होंगे, जो पुलिस या सरकार की ओर से दर्ज किए गए हैं। वहीं निजी व्यक्तियों की शिकायतों के आधार पर दर्ज मामलों में कानून के अनुसार जांच और न्यायिक कार्रवाई जारी रहेगी।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार आंदोलन और 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान करीब 20 एफआईआर दर्ज की गई थीं। इनमें अधिकांश मामले कानून-व्यवस्था, सरकारी कार्य में बाधा और प्रदर्शन से जुड़े हैं, जबकि कुछ मामलों में महिला पत्रकारों के साथ कथित छेड़छाड़, मारपीट और अन्य आपराधिक आरोप शामिल हैं। चूंकि इन मामलों में शिकायतकर्ता निजी व्यक्ति हैं, इसलिए सरकार या दिल्ली पुलिस इन्हें अपने स्तर पर वापस नहीं ले सकती।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि जिन मामलों में वह स्वयं शिकायतकर्ता है, केवल उन्हीं में मुकदमा वापस लेने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इसके लिए पहले सक्षम प्राधिकारी और उपराज्यपाल की मंजूरी ली जाएगी, जिसके बाद अभियोजन पक्ष अदालत में मुकदमा वापस लेने का आवेदन देगा। हालांकि अंतिम निर्णय अदालत का होगा और न्यायालय की अनुमति के बिना किसी भी मुकदमे को समाप्त नहीं किया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य की ओर से दर्ज मामलों में सरकार अदालत से अभियोजन वापस लेने का अनुरोध कर सकती है, लेकिन निजी शिकायतों वाले मामलों में शिकायतकर्ता के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया सर्वोपरि होती है। ऐसे मामलों में जांच और सुनवाई कानून के निर्धारित प्रावधानों के तहत जारी रहती है।
इस बीच आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संगठन ने सरकार से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों में राहत देने के वादे को पूरी तरह लागू करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि यदि आश्वासन के अनुरूप कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन दोबारा शुरू करने पर विचार किया जाएगा। फिलहाल दिल्ली पुलिस औपचारिक आदेशों का इंतजार कर रही है। आदेश जारी होने के बाद सरकारी शिकायतों वाले मामलों में एफआईआर वापस लेने की कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाएगी, जबकि निजी शिकायतों के आधार पर दर्ज मामलों में जांच और न्यायिक कार्रवाई पहले की तरह जारी रहेगी।




