भारत की दो टूक: आतंकवाद जारी रहा तो सिंधु जल संधि पर सामान्य स्थिति संभव नहीं

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भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान के सामने एक बार फिर अपना स्पष्ट और सख्त रुख दोहराया है। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने कहा कि वर्ष 1960 में हुई सिंधु जल संधि की नींव आपसी विश्वास, सद्भाव और सहयोग पर रखी गई थी, लेकिन पाकिस्तान ने दशकों तक सीमा पार आतंकवाद, शत्रुतापूर्ण गतिविधियों और समझौते के क्रियान्वयन में लगातार बाधाएं उत्पन्न कर इस विश्वास को स्वयं कमजोर किया। उन्होंने कहा कि भारत द्वारा संधि को स्थगित रखने का निर्णय किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि पाकिस्तान के लंबे समय से चले आ रहे व्यवहार का स्वाभाविक परिणाम है।

क्वात्रा ने स्पष्ट कहा कि यदि पाकिस्तान भारत के साथ सामान्य और रचनात्मक संबंध चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपनी धरती पर मौजूद आतंकवादी ढांचे को पूरी तरह खत्म करना होगा। उनका कहना था कि आतंकवाद और द्विपक्षीय सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने वर्षों तक भारत की जलविद्युत परियोजनाओं पर अनावश्यक आपत्तियां उठाईं और संधि में समयानुकूल तकनीकी सुधारों का भी विरोध किया, जिससे संधि की मूल भावना प्रभावित हुई। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान को अपने देश में बढ़ते जल संकट के लिए भारत को दोष देने के बजाय जल प्रबंधन और संसाधनों के बेहतर उपयोग पर ध्यान देना चाहिए।

भारतीय राजदूत ने कहा कि भारत ने हमेशा सिंधु जल संधि का सम्मान किया, लेकिन पाकिस्तान ने युद्धों, सीमा पार आतंकवाद और विभिन्न आतंकी हमलों के जरिए दोनों देशों के बीच विश्वास का माहौल खत्म कर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस रुख का भी उल्लेख किया कि “आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते, आतंक और व्यापार साथ-साथ नहीं चल सकते, और पानी तथा खून एक साथ नहीं बह सकते।” भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक दोनों देशों के बीच सामान्य सहयोग और विश्वास बहाली की उम्मीद करना संभव नहीं है।

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