E20 पेट्रोल को लेकर देश में चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने माइलेज कम होने की शिकायतों पर अपना पक्ष स्पष्ट किया है। सरकार का कहना है कि वाहन की ईंधन दक्षता केवल पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा पर निर्भर नहीं करती। वाहन चलाने का तरीका, सड़क और ट्रैफिक की स्थिति, टायरों में हवा का दबाव, समय पर सर्विसिंग, एयर कंडीशनर का इस्तेमाल और वाहन की तकनीकी स्थिति जैसे कई कारक पेट्रोल की खपत को प्रभावित करते हैं। ऐसे में माइलेज में होने वाली पूरी कमी का जिम्मेदार केवल E20 पेट्रोल को बताना सही नहीं होगा।
सरकार ने यह जरूर स्वीकार किया है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से कुछ वाहनों में ईंधन दक्षता में मामूली गिरावट हो सकती है। पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, अलग-अलग परिस्थितियों और वाहन श्रेणियों के आधार पर माइलेज में करीब 3 से 5 प्रतिशत तक कमी संभव है। वहीं केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में वाहन की उम्र और श्रेणी के आधार पर E20 के कारण लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक ईंधन दक्षता कम होने की संभावना बताई थी। इसका अर्थ यह है कि सरकार E20 के माइलेज पर पड़ने वाले प्रभाव को पूरी तरह नकार नहीं रही है, बल्कि इसे सीमित प्रभाव के रूप में देख रही है।
E20 को लेकर सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता रहा है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाए जाने से माइलेज करीब 20 से 30 प्रतिशत तक कम हो सकता है। सरकार ने ऐसे दावों को स्पष्ट करते हुए कहा है कि पेट्रोल और एथेनॉल की कैलोरिफिक वैल्यू में अंतर के आधार पर निकाला गया सैद्धांतिक आंकड़ा वास्तविक सड़क परिस्थितियों में माइलेज में उतनी ही प्रतिशत गिरावट के बराबर नहीं माना जा सकता। यानी ईंधन की ऊर्जा सामग्री और वाहन के वास्तविक माइलेज के बीच कई अन्य तकनीकी और व्यवहारिक कारक भी काम करते हैं।
सरकार के मुताबिक, ड्राइविंग स्टाइल माइलेज को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारण है। बार-बार तेज एक्सेलरेशन करना, अचानक ब्रेक लगाना, बहुत अधिक गति से वाहन चलाना और गलत गियर में गाड़ी चलाने से इंजन को अधिक ईंधन खर्च करना पड़ सकता है। इसके विपरीत, स्थिर गति बनाए रखना, सही समय पर गियर बदलना और धीरे-धीरे एक्सेलरेट करना ईंधन की खपत को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। इसी कारण एक ही मॉडल की दो गाड़ियां समान ईंधन का इस्तेमाल करने के बावजूद अलग-अलग माइलेज दे सकती हैं।
वाहन का रखरखाव भी माइलेज पर सीधा असर डालता है। टायरों में निर्धारित मात्रा से कम हवा होने पर सड़क पर रोलिंग रेजिस्टेंस बढ़ जाता है और इंजन को वाहन चलाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इसी तरह गंदा एयर फिल्टर, खराब स्पार्क प्लग, इंजन की खराब ट्यूनिंग या समय पर सर्विसिंग न कराने से भी ईंधन की खपत बढ़ सकती है। गर्म मौसम में लगातार एयर कंडीशनर चलाने से भी इंजन पर अतिरिक्त भार पड़ता है और इसका असर माइलेज पर दिखाई दे सकता है।
सरकार ने E20 के प्रभाव को समझाने के लिए 20 किलोमीटर प्रति लीटर माइलेज वाली कार का उदाहरण भी दिया है। उपलब्ध सरकारी जानकारी में ऑटो उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के हवाले से बताया गया कि E20 की कैलोरिफिक वैल्यू E10 की तुलना में लगभग 3 से 3.5 प्रतिशत कम है। ऐसे में 20 किलोमीटर प्रति लीटर माइलेज देने वाली कार में इसका संभावित प्रभाव लगभग 0.6 किलोमीटर प्रति लीटर के आसपास हो सकता है। हालांकि वास्तविक माइलेज पर ड्राइविंग पैटर्न, ट्रैफिक, टायर प्रेशर और वाहन की स्थिति जैसे कारकों का असर इससे काफी अधिक हो सकता है।
E20 को लेकर सिर्फ माइलेज ही नहीं, बल्कि इंजन की सुरक्षा और पुराने वाहनों पर इसके असर को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। सरकार का कहना है कि E20-अनुकूल वाहनों की व्यापक स्तर पर टेस्टिंग की गई है। भारतीय ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन यानी ARAI की ओर से E20-संगत वाहनों के लंबे समय तक परीक्षण किए जाने की जानकारी दी गई है। इन परीक्षणों में ईंधन दक्षता के साथ इंजन के दीर्घकालिक प्रदर्शन और स्वास्थ्य का भी आकलन किया गया।
सरकार ने वाहन निर्माताओं के सर्विस डेटा का भी हवाला दिया है। उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार, मारुति सुजुकी ने वित्त वर्ष 2025-26 में करोड़ों वाहनों की सर्विसिंग की। कंपनी के अनुसार, बड़ी संख्या में पुराने और E20 के लिए प्रमाणित नहीं किए गए वाहनों की सर्विसिंग के दौरान E20 से जुड़ी असामान्य क्षति, जंग या अत्यधिक घिसावट का कोई स्पष्ट पैटर्न सामने नहीं आया। सरकार का तर्क है कि इन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि E20 को लेकर इंजन खराब होने की व्यापक समस्या का कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है।
हालांकि दूसरी तरफ E20 को लेकर उपभोक्ताओं की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। कुछ वाहन मालिकों, खासकर पुराने पेट्रोल वाहनों के उपयोगकर्ताओं ने माइलेज में अपेक्षाकृत अधिक गिरावट की बात कही है। कुछ उपभोक्ता सर्वेक्षणों में भी पुराने वाहनों के मालिकों की ओर से 10 प्रतिशत से अधिक माइलेज गिरने की शिकायतें दर्ज की गई हैं। हालांकि ऐसे सर्वेक्षण उपभोक्ता अनुभव को दर्शाते हैं और इन्हें नियंत्रित वैज्ञानिक परीक्षणों के आंकड़ों के साथ अलग संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
E20 पर बहस के बीच ईंधन की गुणवत्ता और संभावित मिलावट का मुद्दा भी चर्चा में आया है। कुछ वाहन निर्माताओं की ओर से ईंधन के नमूनों में नमी और क्लोराइड जैसे तत्वों को लेकर चिंताएं सामने आने की रिपोर्टें प्रकाशित हुईं। हालांकि ऑटो उद्योग संगठन SIAM की ओर से बाद में संबंधित पत्र को वापस लेने और आंकड़ों के अतिरिक्त सत्यापन की जरूरत की बात सामने आई। इसलिए इस पहलू पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जांच और प्रमाणित आंकड़ों का इंतजार करना जरूरी है।
E20 नीति को केंद्र सरकार केवल माइलेज के नजरिये से नहीं देखती। सरकार के अनुसार पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का उद्देश्य देश की कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना, पेट्रोलियम आयात पर खर्च घटाना, घरेलू एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है। एथेनॉल के बेहतर ऑक्टेन गुणों और इसके संभावित पर्यावरणीय लाभों को भी सरकार E20 नीति के पक्ष में महत्वपूर्ण कारणों के रूप में बताती रही है।
कुल मिलाकर केंद्र सरकार का कहना है कि E20 से माइलेज में कुछ कमी संभव है, लेकिन वाहन के वास्तविक प्रदर्शन को केवल ईंधन की संरचना से जोड़ना उचित नहीं होगा। ड्राइविंग की आदत, टायर प्रेशर, वाहन की सर्विसिंग, ट्रैफिक, AC का इस्तेमाल और वाहन की उम्र जैसे कई कारक मिलकर वास्तविक माइलेज तय करते हैं। इसलिए वाहन मालिकों के लिए नियमित सर्विसिंग, सही टायर प्रेशर और संतुलित ड्राइविंग पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। वहीं E20 को लेकर जारी सार्वजनिक बहस में सरकारी परीक्षणों के साथ वास्तविक उपभोक्ता अनुभवों को भी वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीके से सामने रखना जरूरी होगा।




