बिहार की राजधानी पटना में सहायक प्राध्यापक नियुक्ति नियमावली को लेकर आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों का प्रदर्शन शनिवार को उस समय उग्र हो गया, जब वे अपनी मांगों को लेकर लोकभवन की ओर मार्च करने निकले। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की थी। बेली रोड के आसपास मार्च को रोकने के दौरान अभ्यर्थियों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की और झड़प की स्थिति बन गई। प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग पार कर आगे बढ़ने की कोशिश की, जिसके बाद मौके पर तनाव बढ़ गया। प्रदर्शन के कारण आसपास के इलाकों में यातायात भी प्रभावित हुआ।
यह आंदोलन ऑल Ph.D. होल्डर एंड रिसर्च स्कॉलर एसोसिएशन ऑफ बिहार के बैनर तले चल रहा है। संगठन से जुड़े अभ्यर्थियों का कहना है कि वे पिछले कई दिनों से गर्दनीबाग में धरना और अनिश्चितकालीन आमरण अनशन कर रहे हैं। आंदोलनकारियों के मुताबिक, लंबे समय तक अनशन जारी रहने के कारण कुछ शोधार्थियों की तबीयत भी बिगड़ी है और उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि लगातार आंदोलन के बावजूद सरकार की ओर से उनकी मांगों पर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई है।
अभ्यर्थियों के आंदोलन का मुख्य मुद्दा बिहार की नई सहायक प्राध्यापक नियुक्ति नियमावली है। प्रदर्शनकारी नियुक्ति प्रक्रिया में UGC Regulation-2018 के Table 3A को लागू करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षक नियुक्ति में शोध कार्य, रिसर्च पेपर, अकादमिक उपलब्धियों और शिक्षण अनुभव को उचित महत्व मिलना चाहिए। अभ्यर्थियों का दावा है कि नई व्यवस्था में शोध और प्रकाशन से जुड़े अंकों को लेकर किए गए बदलाव से लंबे समय तक शोध कार्य करने वाले उम्मीदवारों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
आंदोलनकारियों की एक प्रमुख मांग सहायक प्राध्यापक पद के लिए अधिकतम आयु सीमा बढ़ाने की भी है। प्रदर्शनकारी इसे 55 वर्ष किए जाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों में वर्षों से अतिथि शिक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे कई लोगों की उम्र 40 वर्ष से अधिक हो चुकी है। यदि आयु सीमा कम रखी जाती है तो अनुभव और योग्यता रखने वाले ऐसे अभ्यर्थियों के लिए नियमित नियुक्ति का अवसर सीमित हो सकता है।
अभ्यर्थी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की स्थायी एवं नियमित नियुक्ति की भी मांग उठा रहे हैं। उनका कहना है कि लंबे समय से बड़ी संख्या में पद खाली हैं, जबकि योग्य शोधार्थी और शिक्षित उम्मीदवार नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने वर्षों से काम कर रहे अतिथि शिक्षकों के हितों को सुरक्षित करने तथा उनके अनुभव को नियुक्ति प्रक्रिया में उचित महत्व देने की मांग भी रखी है।
डोमिसाइल नीति भी आंदोलन की प्रमुख मांगों में शामिल है। प्रदर्शनकारी बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक नियुक्ति के दौरान राज्य के अभ्यर्थियों के हितों को ध्यान में रखने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बनाए रखने और नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग भी उठाई जा रही है। आंदोलनकारियों का कहना है कि उच्च शिक्षा से जुड़े नियमों में बदलाव करते समय शोधार्थियों, शिक्षकों और विश्वविद्यालयों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
सहायक प्राध्यापक नियुक्ति नियमावली को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी आवाजें उठी हैं। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर नियमावली के कुछ प्रावधानों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने UGC Regulation-2018 के Table 3A को लागू करने, अधिकतम आयु सीमा 55 वर्ष करने, स्थायी एवं नियमित नियुक्ति, डोमिसाइल नीति और अतिथि शिक्षकों के हितों से जुड़े मुद्दों पर विचार करने की मांग की है।
पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने भी आंदोलनकारी शोधार्थियों के प्रति समर्थन जताया है। उन्होंने उनकी मांगों को सुनने और सरकार से बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनका उद्देश्य सरकार से टकराव करना नहीं, बल्कि नियुक्ति नियमावली में ऐसे बदलाव करवाना है जिससे योग्य और शोध कार्य कर चुके अभ्यर्थियों को न्यायपूर्ण अवसर मिल सके।
शनिवार को निकाला गया लोकभवन मार्च आंदोलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद अब सरकार पर इस मामले में बातचीत और समाधान निकालने का दबाव बढ़ गया है। आंदोलनकारी अपनी मांगों पर कायम हैं और सरकार से स्पष्ट आश्वासन की मांग कर रहे हैं। वहीं प्रशासन के सामने प्रदर्शन को नियंत्रित करने के साथ-साथ राजधानी में कानून-व्यवस्था और यातायात व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती है।
अब नजर इस बात पर है कि सरकार आंदोलनकारी अभ्यर्थियों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करती है या नहीं। यदि सरकार नियमावली से जुड़े विवादित प्रावधानों पर पुनर्विचार का भरोसा देती है तो आंदोलन को शांत करने का रास्ता निकल सकता है। हालांकि, यदि मांगों पर ठोस पहल नहीं होती है तो आने वाले दिनों में प्रदर्शन और तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। बिहार में सहायक प्राध्यापक नियुक्ति नियमावली से जुड़ा यह विवाद फिलहाल उच्च शिक्षा, रोजगार और शोधार्थियों के भविष्य से जुड़े बड़े मुद्दे के रूप में सामने आया है।




