अमेरिका के नए प्रतिबंधों से बढ़ेगा संकट? ईरान ने दी ‘युद्ध’ जैसी प्रतिक्रिया की चेतावनी

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पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बेहद गंभीर स्थिति में पहुंच गया है। अमेरिका की ओर से ईरान के खिलाफ नए और बेहद कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की तैयारी के बीच तेहरान ने वाशिंगटन को कड़ी चेतावनी दी है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने प्रस्तावित अमेरिकी प्रतिबंधों को केवल आर्थिक दबाव का हिस्सा मानने से इनकार करते हुए इसे दूसरे देशों की संप्रभुता में हस्तक्षेप बताया है। ईरानी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जो देश अमेरिका के आर्थिक अभियान में शामिल होंगे, उन्हें ईरान अपने विरोधी के रूप में देख सकता है।

अमेरिका की तरफ से यह दबाव ऐसे समय बढ़ाया जा रहा है जब दोनों देशों के बीच महीनों से चला आ रहा सैन्य और आर्थिक संकट अभी समाप्त नहीं हुआ है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि वाशिंगटन ईरान पर इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी प्रशासन का उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था पर अधिकतम दबाव बनाकर उसे अपनी रणनीतिक और परमाणु नीतियों में बदलाव के लिए मजबूर करना है। इन प्रतिबंधों का असर ईरान के तेल कारोबार, वित्तीय लेनदेन और उसके साथ व्यापार करने वाले विदेशी नेटवर्क पर पड़ सकता है।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी कदम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि वाशिंगटन दूसरे स्वतंत्र देशों पर अपने कानून और नीतियां थोपने की कोशिश कर रहा है। ईरानी पक्ष के मुताबिक, यदि अमेरिका विदेशी बैंकों, कंपनियों और दूसरे देशों को ईरान के साथ वैध व्यापार रोकने के लिए मजबूर करता है, तो यह केवल द्विपक्षीय आर्थिक विवाद नहीं रहेगा। तेहरान इसे स्वतंत्र देशों की संप्रभुता में हस्तक्षेप और व्यापक आर्थिक युद्ध के रूप में देख रहा है।

ईरान ने अपने पड़ोसी देशों को भी स्पष्ट चेतावनी दी है। ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसिन रेजाई ने कहा कि आसपास के देशों को अमेरिका के आर्थिक अभियान में शामिल नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, यदि कोई देश अमेरिका की इस कार्रवाई में सहयोग करता है तो तेहरान उसे अपने विरोधियों की सूची में रख सकता है। इस बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिका की नई प्रतिबंध नीति का असर केवल वाशिंगटन और तेहरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों पर भी दबाव बढ़ सकता है।

इस पूरे संकट के केंद्र में रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य भी है। फारस की खाड़ी को अरब सागर और हिंद महासागर से जोड़ने वाला यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है। मौजूदा तनाव के बीच इस मार्ग से तेल और गैस की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। रॉयटर्स के अनुसार, हाल के दिनों में होर्मुज से होकर गुजरने वाले जहाजों की संख्या बेहद कम रह गई है और बड़े कच्चे तेल टैंकरों तथा एलएनजी जहाजों की आवाजाही लगभग ठप है।

होर्मुज में यातायात बाधित होने का असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। क्षेत्रीय संघर्ष और अमेरिकी प्रतिबंधों की आशंका के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। बाजार की मुख्य चिंता यह है कि यदि समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित रहा तो वैश्विक तेल आपूर्ति में कमी पैदा हो सकती है। इससे पेट्रोलियम उत्पादों, परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ने के साथ दुनिया के कई देशों में महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है।

अमेरिका की नई रणनीति में ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर दबाव बढ़ाना भी शामिल है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि जो देश ईरान को किसी भी तरह की आर्थिक मदद या जीवनरेखा उपलब्ध कराते हैं, उन्हें आर्थिक परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। इससे चीन पर विशेष दबाव बढ़ने की संभावना है, क्योंकि चीन ईरानी तेल का प्रमुख खरीदार है। रॉयटर्स के अनुसार, 2025 के आंकड़ों के आधार पर चीन ईरान से होने वाले समुद्री तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक खरीदता था।

चीन ने हालांकि अमेरिकी दबाव के बजाय कूटनीति पर जोर दिया है। ईरान के साथ चीन के महत्वपूर्ण ऊर्जा और व्यापारिक संबंध हैं, इसलिए अमेरिकी प्रतिबंधों का विस्तार बीजिंग और वाशिंगटन के बीच एक और विवाद का कारण बन सकता है। यदि अमेरिका ईरान के तेल कारोबार से जुड़े चीनी संस्थानों या कंपनियों को भी प्रतिबंधों के दायरे में लाता है, तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अमेरिका-चीन संबंधों पर पड़ सकता है।

ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही लंबे समय से चले आ रहे अमेरिकी प्रतिबंधों और मौजूदा संघर्ष के कारण दबाव में है। नए प्रतिबंधों से तेल निर्यात, विदेशी मुद्रा, बैंकिंग व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अतिरिक्त असर पड़ सकता है। इसके बावजूद तेहरान ने अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के बजाय जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। ईरानी अधिकारियों ने कहा है कि नए अमेरिकी कदमों का जवाब गंभीर और व्यापक हो सकता है।

हालांकि, सैन्य तनाव के बीच कूटनीतिक रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। मिस्र सहित कुछ देश अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को फिर से शुरू कराने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने भी युद्ध को समाप्त करने और देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति पर ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया है। इससे संकेत मिलता है कि ईरान के भीतर भी संघर्ष जारी रखने और आर्थिक दबाव कम करने के लिए बातचीत की दिशा में बढ़ने को लेकर बहस मौजूद है।

अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा गतिरोध की एक बड़ी वजह दोनों पक्षों की अलग-अलग प्राथमिकताएं हैं। अमेरिका ईरान से व्यापक रणनीतिक समझौता चाहता है और उसके परमाणु कार्यक्रम तथा क्षेत्रीय गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों और बाहरी दबाव को अपनी संप्रभुता के खिलाफ मानता है। यही मतभेद दोनों देशों के बीच किसी स्थायी समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बने हुए हैं।

इस संकट का असर भारत सहित पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है। इससे भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की लागत, परिवहन खर्च और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी। पश्चिम एशिया भारत के लिए व्यापार और समुद्री परिवहन का भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है, इसलिए लंबे समय तक जारी रहने वाला संघर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था और क्षेत्र में रहने वाले भारतीय नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण चुनौती बन सकता है।

फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि आर्थिक प्रतिबंधों की नई लहर कहीं सैन्य तनाव को और न बढ़ा दे। अमेरिका आर्थिक दबाव बढ़ाकर ईरान को बातचीत के लिए मजबूर करना चाहता है, जबकि तेहरान प्रतिबंधों को आर्थिक युद्ध और अपनी संप्रभुता पर हमला मान रहा है। दूसरी तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात की स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। ऐसे में किसी गलत अनुमान, सैन्य घटना या समुद्री टकराव से संकट तेजी से बढ़ सकता है।

कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट केवल अमेरिका और ईरान के बीच आर्थिक विवाद नहीं रह गया है। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था के हित जुड़े हुए हैं। आने वाले दिनों में अमेरिका द्वारा प्रस्तावित नए प्रतिबंधों की वास्तविक सीमा, ईरान की प्रतिक्रिया और होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति यह तय करेगी कि संकट बातचीत की दिशा में जाता है या फिर क्षेत्र में तनाव का एक नया और अधिक खतरनाक दौर शुरू होता है।

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