संकट चाहे कहीं भी हो, मदद को तैयार भारत; मानवीय सहायता में बढ़ी देश की ताकत

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प्राकृतिक आपदा जब किसी देश को अपनी चपेट में लेती है, तो शुरुआती कुछ घंटे राहत और बचाव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। भूकंप, बाढ़, चक्रवात या सुनामी जैसी आपदाओं के बाद प्रभावित देशों को केवल आर्थिक मदद की जरूरत नहीं होती, बल्कि प्रशिक्षित बचाव दल, मेडिकल टीम, दवाइयां, भोजन, पानी, अस्थायी अस्पताल, परिवहन और संचार जैसी सुविधाओं की भी तत्काल आवश्यकता होती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई देशों की ऐसी मुश्किल घड़ी में तेजी से सहायता पहुंचाकर खुद को एक जिम्मेदार और भरोसेमंद मानवीय साझेदार के रूप में स्थापित किया है। भारत की यह भूमिका Humanitarian Assistance and Disaster Relief यानी HADR के तहत सामने आती है, जिसमें भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना, NDRF और विदेश मंत्रालय समेत कई संस्थाएं मिलकर काम करती हैं। भारत सरकार के अनुसार, देश ने विदेशों में राहत और बचाव अभियानों के लिए अपनी क्षमताओं को लगातार मजबूत किया है।

भारत की अंतरराष्ट्रीय आपदा राहत क्षमता की सबसे बड़ी मिसालों में वर्ष 2015 का नेपाल भूकंप शामिल है। 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में आए 7.8 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप ने बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान किया था। इसके बाद भारत ने ‘ऑपरेशन मैत्री’ शुरू करते हुए बेहद कम समय में राहत और बचाव दल नेपाल भेजे। भारतीय वायुसेना ने राहत सामग्री पहुंचाने के साथ-साथ बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में मदद की। भारतीय दलों ने मलबे में फंसे लोगों की तलाश, चिकित्सा सहायता और राहत सामग्री के वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इस अभियान के दौरान लगभग 11,200 लोगों को सुरक्षित निकाला गया।

नेपाल के बाद वर्ष 2023 में तुर्किये और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप ने भारत की आपदा प्रतिक्रिया क्षमता को एक बार फिर दुनिया के सामने रखा। 6 फरवरी 2023 को आए भूकंप के बाद भारत ने ‘ऑपरेशन दोस्त’ शुरू किया। भारतीय वायुसेना के परिवहन विमानों के जरिए NDRF की खोज एवं बचाव टीमें, प्रशिक्षित डॉग स्क्वॉड, जरूरी उपकरण और राहत सामग्री तुर्किये पहुंचाई गई। इसके साथ ही भारतीय सेना की मेडिकल टीम को भी भेजा गया, जिसने प्रभावित क्षेत्र में फील्ड अस्पताल स्थापित कर घायलों का उपचार किया। भारत के विदेश मंत्रालय ने उस समय इस अभियान को देश की ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया था।

‘ऑपरेशन दोस्त’ की खासियत यह थी कि भारत ने केवल राहत सामग्री भेजकर अपनी भूमिका समाप्त नहीं की। भारतीय टीमों ने मलबे में खोज-बचाव अभियान चलाया और मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराईं। भारतीय फील्ड मेडिकल टीम में विशेषज्ञ डॉक्टरों और पैरामेडिकल कर्मियों के साथ एक्स-रे, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन और अन्य जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध थीं। इस तरह भारत ने यह दिखाया कि वह किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट में केवल सहायता सामग्री भेजने के बजाय अपनी विशेषज्ञ मानवशक्ति और तकनीकी संसाधनों को भी तेजी से प्रभावित क्षेत्र में तैनात कर सकता है।

मार्च 2025 में म्यांमार में आए शक्तिशाली भूकंप के बाद भारत ने एक बार फिर बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता अभियान चलाया। इस अभियान को ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’ नाम दिया गया। भारतीय वायुसेना और नौसेना के माध्यम से राहत सामग्री म्यांमार पहुंचाई गई, जबकि NDRF की टीमों को खोज एवं बचाव अभियान में लगाया गया। भारतीय सेना ने म्यांमार में फील्ड अस्पताल स्थापित किया, जहां भूकंप से प्रभावित लोगों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई। राहत सामग्री में दवाइयां, भोजन, चिकित्सा उपकरण और अन्य जरूरी वस्तुएं शामिल थीं। अभियान के दौरान भारत ने अपनी सैन्य और मानवीय क्षमताओं का एक साथ इस्तेमाल किया, जिससे राहत को तेजी से प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सका।

म्यांमार में भारत की भूमिका केवल तत्काल राहत तक सीमित नहीं रही। भारतीय नौसेना के जहाजों और वायुसेना के विमानों के जरिए अलग-अलग खेपों में राहत सामग्री भेजी गई, जबकि भारतीय चिकित्सा दलों ने बड़ी संख्या में मरीजों का उपचार किया। इस तरह ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’ ने भारत की उस रणनीति को सामने रखा जिसमें आपदा के बाद खोज एवं बचाव, चिकित्सा सहायता और राहत सामग्री की आपूर्ति को एक साथ संचालित किया जाता है। इससे प्रभावित देश को अलग-अलग स्तरों पर सहायता मिलती है और राहत अभियान ज्यादा प्रभावी बनता है।

भारत ने चक्रवात और बाढ़ जैसी आपदाओं के दौरान भी पड़ोसी देशों की मदद की है। म्यांमार में चक्रवात मोचा के बाद भारत ने ‘ऑपरेशन करुणा’ के तहत राहत सामग्री और चिकित्सा सहायता पहुंचाई थी। इसी तरह बाढ़ और प्राकृतिक आपदा से प्रभावित क्षेत्रों में भारत ने समुद्री और हवाई मार्गों के जरिए राहत सामग्री पहुंचाने की क्षमता का इस्तेमाल किया। यह भारत की उस नीति का हिस्सा है, जिसमें हिंद महासागर क्षेत्र और पड़ोसी देशों में संकट के समय तेजी से सहायता उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाता है।

श्रीलंका के साथ भी भारत की आपदा राहत साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। चक्रवात के बाद श्रीलंका में पैदा हुई मानवीय स्थिति के दौरान भारत ने ‘ऑपरेशन सागर बंधु’ के जरिए राहत और बचाव अभियान चलाया। भारतीय नौसेना, वायुसेना और अन्य एजेंसियों ने मिलकर राहत सामग्री पहुंचाने, लोगों को सुरक्षित निकालने और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने का काम किया। इस तरह के अभियानों में भारत की समुद्री क्षमता विशेष रूप से महत्वपूर्ण साबित होती है, क्योंकि बड़े जहाजों के जरिए एक साथ बड़ी मात्रा में भोजन, पानी, दवाइयां और अन्य आवश्यक सामग्री प्रभावित देश तक पहुंचाई जा सकती है।

भारत की HADR क्षमता का एक महत्वपूर्ण पहलू उसकी सैन्य ताकत और मानवीय सहायता के बीच तालमेल है। भारतीय वायुसेना के परिवहन विमान कम समय में लंबी दूरी तय कर भारी मात्रा में राहत सामग्री पहुंचा सकते हैं, जबकि नौसेना के जहाज समुद्री रास्ते से बड़ी खेप ले जाने में सक्षम हैं। भारतीय सेना के पास इंजीनियरिंग और मेडिकल टीमें हैं, जो आपदा प्रभावित इलाकों में अस्थायी अस्पताल, पुल और अन्य जरूरी सुविधाएं स्थापित करने में मदद कर सकती हैं। वहीं NDRF की विशेष टीमें मलबे में फंसे लोगों की खोज और बचाव के लिए प्रशिक्षित हैं। यही संयुक्त क्षमता भारत को संकट के समय तेजी से प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाती है।

भारत की इस भूमिका को केवल राहत अभियान के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह उसकी व्यापक क्षेत्रीय कूटनीति का भी हिस्सा बन चुकी है। भारत अक्सर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना और हिंद महासागर क्षेत्र में ‘SAGAR’ यानी Security and Growth for All in the Region के दृष्टिकोण के साथ मानवीय सहायता को जोड़ता है। इसका अर्थ है कि पड़ोसी और साझेदार देशों की सुरक्षा एवं समृद्धि को क्षेत्रीय स्थिरता से अलग करके नहीं देखा जा सकता। आपदा के समय सहायता पहुंचाना इसी सोच का व्यावहारिक रूप माना जाता है।

भारत की विश्वसनीयता का एक बड़ा कारण उसकी प्रतिक्रिया की गति भी है। हाल ही में अगस्त 2026 में नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड के बाद भी भारत ने तेजी से राहत सामग्री भेजी। भारतीय वायुसेना ने कुछ ही समय में C-130 परिवहन विमान के जरिए लगभग 10 टन राहत और चिकित्सा सामग्री नेपाल पहुंचाई। यह घटना बताती है कि भारत की आपदा प्रतिक्रिया व्यवस्था अब केवल बड़े भूकंप या चक्रवात जैसी घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पड़ोसी देशों में अचानक पैदा होने वाली आपात स्थितियों के लिए भी तेजी से सक्रिय हो सकती है। हालांकि नेपाल ने बाद में विदेशी खोज एवं बचाव टीमों की आवश्यकता नहीं होने की बात कही, लेकिन भारत की ओर से शुरुआती सहायता की पेशकश और राहत सामग्री भेजने की तत्परता उसकी ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ भूमिका को दर्शाती है।

दरअसल, संकट के समय किसी देश की वास्तविक क्षमता का पता केवल उसके पास मौजूद संसाधनों से नहीं चलता, बल्कि इस बात से चलता है कि वह उन संसाधनों को कितनी तेजी से जरूरतमंद लोगों तक पहुंचा सकता है। भारत ने नेपाल, तुर्किये, सीरिया, म्यांमार, श्रीलंका और हिंद महासागर क्षेत्र के अन्य देशों में राहत अभियानों के जरिए इसी क्षमता को प्रदर्शित किया है। कई अभियानों में भारत ने राहत सामग्री के साथ डॉक्टर, इंजीनियर, खोज एवं बचाव विशेषज्ञ, मेडिकल उपकरण और परिवहन साधन भी भेजे। इस वजह से भारत की मदद केवल सामान पहुंचाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने प्रभावित देशों को संकट से बाहर निकलने की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष सहयोग दिया।

आज जब जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, चक्रवात, अत्यधिक बारिश और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है, तब अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायता का महत्व भी बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में भारत का HADR मॉडल उसे क्षेत्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ के रूप में स्थापित कर रहा है। नेपाल में ‘ऑपरेशन मैत्री’ से लेकर तुर्किये में ‘ऑपरेशन दोस्त’ और म्यांमार में ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’ तक भारत ने यह दिखाया है कि संकट की घड़ी में उसकी भूमिका केवल एक पड़ोसी या साझेदार देश की नहीं, बल्कि जरूरत के समय साथ खड़े होने वाले भरोसेमंद मित्र की भी है।

भारत की यह मानवीय कूटनीति आने वाले समय में उसकी वैश्विक भूमिका को और मजबूत कर सकती है। आपदा के बाद तत्काल राहत, चिकित्सा उपचार, खोज एवं बचाव, परिवहन, इंजीनियरिंग सहायता और पुनर्बहाली में योगदान देकर भारत अपनी सैन्य और तकनीकी क्षमताओं का इस्तेमाल मानवीय उद्देश्य के लिए कर रहा है। यही वजह है कि दुनिया के कई हिस्सों में संकट के समय भारत की ओर उम्मीद की नजर से देखा जाने लगा है। प्राकृतिक आपदा की घड़ी में भारत का संदेश स्पष्ट है—संकट चाहे सीमा के भीतर हो या सीमा के बाहर, मानव जीवन की रक्षा और जरूरतमंदों की मदद सबसे महत्वपूर्ण है।

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