प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के टोल कलेक्शन से जुड़े कथित फर्जीवाड़े के मामले में बुधवार को बड़ी कार्रवाई की। धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत की गई इस कार्रवाई में जांच एजेंसी ने उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर और पश्चिम बंगाल के कोलकाता में कुल 14 ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया। एजेंसी की कार्रवाई का केंद्र कथित तौर पर टोल संग्रह में अनियमितता, फर्जी सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल और उससे जुड़े धन के लेनदेन की जांच है।
जांच के अनुसार, कुछ लोगों पर आरोप है कि उन्होंने NHAI की आधिकारिक टोल कलेक्शन व्यवस्था के समानांतर एक अनधिकृत सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया। कथित तौर पर इस सॉफ्टवेयर के माध्यम से टोल प्लाजा पर वाहन चालकों से शुल्क वसूला जाता था, लेकिन सभी लेनदेन NHAI के आधिकारिक सिस्टम में दर्ज नहीं किए जाते थे। इस तरह वास्तविक टोल संग्रह और आधिकारिक रिकॉर्ड के बीच अंतर पैदा किए जाने का आरोप है। ED अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस व्यवस्था को किस तरह संचालित किया गया और इससे हासिल रकम का इस्तेमाल या हस्तांतरण किन लोगों और संस्थाओं के जरिए हुआ।
मामले की शुरुआती कड़ी उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (UP STF) की कार्रवाई से जुड़ी बताई जा रही है। जनवरी 2025 में मिर्जापुर जिले के अतरैला शिव गुलाम टोल प्लाजा पर जांच के दौरान कथित समानांतर सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल का मामला सामने आया था। इसके बाद पुलिस स्तर पर एफआईआर दर्ज की गई और जांच आगे बढ़ाई गई। जांच में अन्य टोल प्लाजा पर भी इसी तरह की व्यवस्था के इस्तेमाल की आशंका सामने आई, जिसके बाद मामला व्यापक जांच के दायरे में आया।
टोल वसूली में कथित अनियमितताओं के सामने आने के बाद NHAI ने भी कार्रवाई की थी। मार्च 2025 में प्राधिकरण ने 14 टोल शुल्क संग्रह एजेंसियों को प्रतिबंधित किया था। इन एजेंसियों के खिलाफ अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन और टोल संग्रह से संबंधित कथित अनियमित गतिविधियों के आधार पर कार्रवाई की गई। NHAI ने संबंधित एजेंसियों की 100 करोड़ रुपये से अधिक की प्रदर्शन प्रतिभूतियां जब्त करने और उन्हें भुनाने की प्रक्रिया भी शुरू की थी।
जांच एजेंसियों के मुताबिक, फोरेंसिक जांच और NHAI के उपलब्ध रिकॉर्ड के विश्लेषण में अनधिकृत सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से जुड़े संकेत मिले हैं। जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू डिजिटल रिकॉर्ड और वास्तविक टोल लेनदेन के बीच संभावित अंतर को समझना है। इसी कारण ED की ताजा तलाशी में डिजिटल उपकरणों, कंप्यूटर सिस्टम, दस्तावेजों और वित्तीय लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड को अहम माना जा रहा है। एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित सॉफ्टवेयर किसने विकसित या उपलब्ध कराया और अलग-अलग टोल प्लाजा पर इसे किस नेटवर्क के जरिए संचालित किया गया।
मामले से जुड़ी कुछ रिपोर्टों में जांच के हवाले से यह दावा भी किया गया है कि कथित व्यवस्था में टोल से प्राप्त रकम का बहुत छोटा हिस्सा आधिकारिक रिकॉर्ड में दिखाया जाता था, जबकि बड़ी रकम को कथित तौर पर आधिकारिक सिस्टम से बाहर रखा जाता था। हालांकि, इस तरह के प्रतिशत या कथित वित्तीय नुकसान को फिलहाल जांच का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। ED की जांच जारी है और कथित तौर पर अपराध से अर्जित रकम की वास्तविक मात्रा तथा उससे जुड़े लोगों की भूमिका जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
ED की ताजा कार्रवाई का उद्देश्य केवल टोल संग्रह में हुई कथित हेराफेरी का पता लगाना ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े धन के पूरे वित्तीय नेटवर्क की पड़ताल करना भी है। एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि कथित तौर पर टोल से वसूली गई रकम किन बैंक खातों, कंपनियों या अन्य माध्यमों तक पहुंची। इसके साथ ही जांच में यह भी देखा जा रहा है कि इस पूरे नेटवर्क को संचालित करने में टोल एजेंसियों, कर्मचारियों, तकनीकी सेवा प्रदाताओं या अन्य लोगों की क्या भूमिका रही।
NHAI की टोल व्यवस्था में डिजिटल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन व्यवस्था का उद्देश्य टोल वसूली को तेज, पारदर्शी और रिकॉर्ड आधारित बनाना है। ऐसे में यदि किसी अनधिकृत सॉफ्टवेयर के जरिए आधिकारिक डिजिटल सिस्टम को दरकिनार किए जाने के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह टोल कलेक्शन की निगरानी और साइबर सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।
फिलहाल ED की ओर से की गई 14 ठिकानों की तलाशी के बाद जांच जारी है। छापेमारी के दौरान मिले दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों की जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। जांच एजेंसी कथित फर्जी टोल नेटवर्क के संचालन, उससे जुड़े व्यक्तियों और संस्थाओं तथा धन के प्रवाह का पता लगाने की कोशिश कर रही है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि फिलहाल मामला जांच के चरण में है और जिन लोगों या संस्थाओं पर आरोप हैं, उनकी आपराधिक जिम्मेदारी अंतिम रूप से अदालत के निर्णय के बाद ही तय होगी।




