असम में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति से जुड़ा करीब नौ साल पुराना विवाद एक बार फिर चर्चा में है। मामला वर्ष 2017 में ‘Strengthening Elementary Education of Assam’ योजना के तहत हुई शिक्षक भर्ती से जुड़ा है। इस भर्ती में कुल 11,319 सहायक शिक्षकों की नियुक्ति की गई थी, जबकि शुरुआती विज्ञापन में 7,042 पदों का उल्लेख किया गया था। इसी अंतर को आधार बनाकर कुछ याचिकाकर्ताओं ने भर्ती प्रक्रिया को चुनौती दी थी। हालांकि, उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार इस मामले में फैसला सुप्रीम कोर्ट ने नहीं, बल्कि गौहाटी हाईकोर्ट ने 10 अगस्त 2026 को सुनाया और नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया।
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब असम के सर्व शिक्षा अभियान मिशन ने 30 जून 2017 को प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर सहायक शिक्षकों के 7,042 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया। विज्ञापन में यह भी प्रावधान था कि विभागीय मंजूरी के आधार पर रिक्त पदों की संख्या बढ़ाई या घटाई जा सकती है। इसके बाद चयन प्रक्रिया आगे बढ़ी और 1 सितंबर 2017 को परिणाम जारी किया गया। 6 सितंबर 2017 की अधिसूचना में 11,319 टीईटी-योग्य उम्मीदवारों को सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्त करने की बात सामने आई। मूल विज्ञापन में बताए गए पदों की तुलना में नियुक्तियों की यह संख्या काफी अधिक थी और यहीं से कानूनी विवाद पैदा हुआ।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में मुख्य रूप से यह दलील दी कि 7,042 पदों के लिए जारी विज्ञापन के आधार पर 11,319 लोगों की नियुक्ति नहीं की जा सकती थी। उनके मुताबिक अतिरिक्त 4,277 पदों के लिए अलग से सार्वजनिक विज्ञापन जारी किया जाना चाहिए था, ताकि उन पदों के लिए भी सभी योग्य उम्मीदवारों को आवेदन करने और चयन प्रक्रिया में शामिल होने का समान अवसर मिलता। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि बिना अलग विज्ञापन के अतिरिक्त नियुक्तियां करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में दिए गए समानता और सरकारी रोजगार में समान अवसर के सिद्धांतों को प्रभावित करता है।
राज्य सरकार ने इन आरोपों का विरोध करते हुए अदालत में कहा कि मूल विज्ञापन में ही रिक्तियों की संख्या बढ़ने या घटने की संभावना का उल्लेख किया गया था। सरकार के अनुसार, भर्ती प्रक्रिया के दौरान उपलब्ध रिक्तियों और राज्य की शिक्षक आवश्यकता को देखते हुए अधिक उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया। सरकार ने यह भी बताया कि चयनित टीईटी-योग्य उम्मीदवारों को ‘State Pool of Teachers’ में शामिल किया गया था। उस समय प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता और शिक्षकों को आवश्यक पेशेवर प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी चल रही थी। सरकार ने इस पूरी व्यवस्था को राज्य के स्कूलों में शिक्षकों की जरूरत और छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखने से जोड़कर अदालत के सामने अपना पक्ष रखा।
मामले की सुनवाई के दौरान गौहाटी हाईकोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया से जुड़े कई कानूनी पहलुओं पर विचार किया। अदालत ने यह भी देखा कि मूल विज्ञापन में रिक्तियों की संख्या बढ़ने की संभावना पहले से दर्ज थी और राज्य सरकार ने अतिरिक्त नियुक्तियों के लिए प्रशासनिक तथा शैक्षणिक जरूरतों का हवाला दिया था। अदालत ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील पर भी विचार किया कि अतिरिक्त पदों के लिए नया विज्ञापन जरूरी था। इसके अलावा, अदालत के सामने यह सवाल भी था कि वर्ष 2017 की नियुक्तियों को कई साल बाद चुनौती देने का क्या प्रभाव पड़ेगा।
इस मामले में याचिकाएं दायर करने में हुई देरी भी महत्वपूर्ण मुद्दा रही। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, 6 सितंबर 2017 की नियुक्ति अधिसूचना को चुनौती देने में अलग-अलग मामलों में लगभग 19 महीने से लेकर 76 महीने तक की देरी हुई। अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई देरी की वजहों पर विचार किया, लेकिन उन्हें पर्याप्त नहीं माना। इस बीच नियुक्त शिक्षक लंबे समय से सेवा में थे और उनकी सेवा से जुड़े अधिकार भी विकसित हो चुके थे। सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि बाद की प्रक्रियाओं में बड़ी संख्या में संविदा शिक्षकों को नियमित किया गया था। ऐसे में इतने लंबे समय बाद नियुक्तियों को चुनौती देने से पहले से स्थापित सेवा अधिकार प्रभावित हो सकते थे।
10 अगस्त 2026 को गौहाटी हाईकोर्ट ने पांच संबंधित रिट याचिकाओं पर अपना साझा फैसला सुनाया। अदालत ने याचिकाओं को खारिज कर दिया और नियुक्तियों को चुनौती देने वाली दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने पक्षकारों को अपना-अपना खर्च वहन करने का निर्देश भी दिया। इस फैसले के बाद उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर 11,319 शिक्षकों की वर्ष 2017 में हुई नियुक्तियों को रद्द करने का कोई आदेश सामने नहीं आया है।
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसे ‘सुप्रीम कोर्ट की ओर से शिक्षकों की नियुक्ति पर रोक’ के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित फैसला गौहाटी हाईकोर्ट का है और अदालत ने 11,319 शिक्षकों की नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज की हैं। इसलिए खबर प्रकाशित करते समय अदालत के स्तर और फैसले की प्रकृति को स्पष्ट रखना जरूरी है।
असम का यह मामला सरकारी भर्ती में विज्ञापित पदों की संख्या, बाद में रिक्तियों में बदलाव, समान अवसर और लंबे समय बाद भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देने जैसे महत्वपूर्ण कानूनी सवालों को सामने लाता है। खास तौर पर सरकारी नौकरियों में पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और सभी योग्य उम्मीदवारों को समान अवसर देने का मुद्दा ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण रहता है। फिलहाल 10 अगस्त 2026 के गौहाटी हाईकोर्ट के फैसले के बाद 2017 की इन 11,319 शिक्षक नियुक्तियों को चुनौती देने वाली संबंधित याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं।




