भारत की अध्यक्षता में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन से पहले आर्थिक और व्यापारिक सहयोग को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने BRICS देशों से आपसी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए बाजारों को अधिक खुला बनाने, व्यापार से जुड़ी गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने और सीमा पार भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने की अपील की है। उन्होंने जोर दिया कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में BRICS देशों के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध, भरोसेमंद सप्लाई चेन और सुगम भुगतान व्यवस्था आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
BRICS बिजनेस फोरम में अपने संबोधन के दौरान पीयूष गोयल ने कहा कि सदस्य देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए केवल आयात शुल्क में कमी करना पर्याप्त नहीं है। कारोबारियों को अलग-अलग देशों के नियमों, तकनीकी मानकों, प्रमाणन प्रक्रियाओं और अन्य नियामकीय अड़चनों का भी सामना करना पड़ता है। इन गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने और नियमों को अधिक पारदर्शी तथा पूर्वानुमान योग्य बनाने से कंपनियों के लिए दूसरे BRICS बाजारों में कारोबार करना आसान हो सकता है। भारत का जोर ऐसे माहौल पर है जिसमें सदस्य देशों के कारोबारी बिना अनावश्यक रुकावट के वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान कर सकें।
गोयल ने सीमा पार भुगतान व्यवस्था को बेहतर बनाने की जरूरत पर भी विशेष जोर दिया। उनका मानना है कि BRICS देशों के बीच भुगतान प्रणालियों को अधिक प्रभावी तरीके से जोड़ने से कारोबारियों के लिए अंतरराष्ट्रीय लेनदेन आसान और तेज हो सकता है। भारत अपने डिजिटल भुगतान ढांचे, खासकर UPI के अनुभव को इस दिशा में उपयोगी मॉडल के रूप में देखता है। स्थानीय भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी से छोटे और मध्यम कारोबारियों को भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भाग लेने के नए अवसर मिल सकते हैं।
BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान बढ़ाने की संभावना भी लगातार चर्चा में रही है। इसका उद्देश्य कारोबारियों को हर लेनदेन में किसी तीसरी मुद्रा पर निर्भर रहने की आवश्यकता को कम करना और भुगतान की लागत तथा समय को घटाना है। भारत की प्राथमिकता किसी एक नई साझा मुद्रा को तत्काल लागू करने के बजाय ऐसी भुगतान व्यवस्था विकसित करने की है, जिससे अलग-अलग देशों की मौजूदा वित्तीय प्रणालियों के बीच लेनदेन अधिक सुगम बनाया जा सके। हालांकि अलग-अलग देशों की आर्थिक नीतियों, वित्तीय ढांचे और नियामकीय व्यवस्थाओं में अंतर के कारण इस दिशा में कई व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं।
भारत BRICS देशों के बीच डिजिटल वित्तीय सहयोग को भी आगे बढ़ाना चाहता है। केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC के क्षेत्र में अलग-अलग देशों के अनुभवों और प्रणालियों के बीच संभावित कनेक्टिविटी पर भी चर्चा हो रही है। यदि ऐसी व्यवस्था विकसित होती है तो भविष्य में सीमा पार भुगतान को अधिक तेज, सुरक्षित और कम लागत वाला बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि इसके लिए तकनीकी मानकों, वित्तीय नियमों, डेटा सुरक्षा और केंद्रीय बैंकों के बीच समन्वय जैसे कई मुद्दों पर सहमति आवश्यक होगी।
पीयूष गोयल ने BRICS आर्थिक सहयोग को केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित रखने के बजाय स्टार्टअप, छोटे कारोबार और महिला उद्यमियों की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि यदि छोटे और नए उद्यमों को वित्त, बाजार और अंतरराष्ट्रीय कारोबार से जुड़ी जानकारी तक आसान पहुंच मिले तो BRICS देशों के बीच व्यापार का दायरा और व्यापक हो सकता है। इससे रोजगार, निवेश और नए कारोबारी अवसरों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
BRICS देशों के साथ भारत का व्यापार लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है, लेकिन इसके साथ व्यापार असंतुलन भी एक चुनौती है। कुछ प्रमुख BRICS देशों से भारत का आयात उसके निर्यात की तुलना में काफी अधिक है। ऐसे में भारत के लिए केवल व्यापार की मात्रा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि भारतीय उत्पादों और सेवाओं के लिए BRICS बाजारों में बेहतर पहुंच हासिल करना भी जरूरी है। बाजार खोलने और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने की मांग को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। यदि भारतीय कंपनियों को सदस्य देशों में बेहतर बाजार पहुंच मिलती है तो निर्यात बढ़ाने और व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिल सकती है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ते संरक्षणवाद, बदलती टैरिफ नीतियों और सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों के बीच BRICS देशों के बीच आर्थिक सहयोग का महत्व और बढ़ गया है। अलग-अलग देशों की कंपनियां अब उत्पादन और कच्चे माल के लिए वैकल्पिक बाजार तथा आपूर्ति स्रोत तलाश रही हैं। ऐसे में BRICS देशों के बीच मजबूत सप्लाई चेन नेटवर्क विकसित होने से उद्योगों को नए अवसर मिल सकते हैं और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
भारत 2026 में BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और नई दिल्ली में होने वाला शिखर सम्मेलन इस दौरान सबसे महत्वपूर्ण बैठकों में से एक है। सम्मेलन में आर्थिक सहयोग, व्यापार, डिजिटल भुगतान, निवेश, वैश्विक आर्थिक व्यवस्था और विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। ऐसे में पीयूष गोयल की अपील को भारत की व्यापक आर्थिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देखा जा रहा है। भारत BRICS को केवल राजनीतिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन के क्षेत्र में व्यावहारिक सहयोग का प्रभावी मंच बनाने पर जोर दे रहा है।
हालांकि BRICS देशों के आर्थिक हित और नीतियां एक-दूसरे से पूरी तरह समान नहीं हैं। बाजार खोलने, व्यापार बाधाएं हटाने और भुगतान प्रणालियों को जोड़ने जैसे मुद्दों पर सभी देशों की सहमति हासिल करना आसान नहीं होगा। इसके बावजूद भारत की पहल का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कारोबार करने की लागत और जटिलताओं को कम करना है। यदि इन प्रस्तावों पर व्यापक सहमति बनती है तो इससे BRICS के भीतर व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ भारतीय कंपनियों के लिए नए अंतरराष्ट्रीय बाजार भी खुल सकते हैं।




