भारत और पाकिस्तान के बीच गुजरात के कच्छ से लगे सर क्रीक क्षेत्र में एक बार फिर सुरक्षा और सैन्य गतिविधियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने सिंध से सटे तटीय और दलदली इलाकों में अपनी सैन्य तैयारियों को बढ़ाया है। इन रिपोर्टों में ड्रोन, होवरक्राफ्ट, तेज गश्ती नौकाओं और समुद्री कमांडो जैसी क्षमताओं का उल्लेख किया गया है। पाकिस्तान की इन गतिविधियों को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब सर क्रीक पहले से ही दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद का संवेदनशील क्षेत्र है।
सर क्रीक करीब 96 किलोमीटर लंबा ज्वारीय मुहाना है, जो गुजरात के कच्छ क्षेत्र और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच अरब सागर में स्थित है। यह क्षेत्र भारत और पाकिस्तान के बीच समुद्री सीमा विवाद का महत्वपूर्ण केंद्र है। भारत का कहना है कि सीमा क्रीक के मध्य से गुजरनी चाहिए, जबकि पाकिस्तान पूरे क्रीक पर अपने दावे की बात करता है। इस विवाद का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि सर क्रीक में सीमा का निर्धारण आगे समुद्री सीमा और दोनों देशों के विशेष आर्थिक क्षेत्रों यानी Exclusive Economic Zones के निर्धारण को भी प्रभावित करता है।
पाकिस्तान की तैयारियों में सबसे ज्यादा चर्चा होवरक्राफ्ट को लेकर है। पाकिस्तान नौसेना ने अक्टूबर 2025 में तीन 2400 TD होवरक्राफ्ट अपने मरीन बेड़े में शामिल किए थे। पाकिस्तान नौसेना के अनुसार ये प्लेटफॉर्म उथले पानी, रेत, दलदली और कीचड़ वाले तटीय इलाकों में काम कर सकते हैं, जहां पारंपरिक नौकाओं की आवाजाही मुश्किल होती है। सर क्रीक जैसे इलाके में ज्वार-भाटे के कारण पानी की गहराई और जमीन की स्थिति लगातार बदलती रहती है, इसलिए इस तरह के प्लेटफॉर्म सैन्य गतिशीलता के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
हालिया रिपोर्टों में पाकिस्तान के कथित ‘अबाबील’ कार्यक्रम का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्टों के अनुसार इस गतिविधि के तहत सर क्रीक क्षेत्र में तेज नौकाओं, होवरक्राफ्ट, ड्रोन और विशेष बलों से जुड़ी क्षमताओं पर जोर दिया जा रहा है। कुछ रिपोर्टों में पाकिस्तानी मरीन कमांडो द्वारा समुद्र से तट पर उतरने और लक्ष्य आधारित प्रशिक्षण का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि इन दावों में बताए गए प्रत्येक प्लेटफॉर्म और उसकी वास्तविक तैनाती की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है, इसलिए इन सूचनाओं को रिपोर्टों के दावे के रूप में देखना जरूरी है।
ड्रोन इस पूरे घटनाक्रम का एक अहम हिस्सा बन गए हैं। सर क्रीक का भूगोल सामान्य सीमा क्षेत्रों से काफी अलग है। यहां दलदली जमीन, कीचड़, ज्वारीय जलधाराएं और छोटे-छोटे जलमार्ग हैं। ऐसे इलाके में ड्रोन से निगरानी करने पर बड़े क्षेत्र को अपेक्षाकृत तेजी से देखा जा सकता है। ड्रोन का इस्तेमाल संभावित गतिविधियों की निगरानी, इलाके की तस्वीरें जुटाने और समुद्री या जमीनी टीमों को स्थिति की जानकारी देने के लिए किया जा सकता है। कुछ रिपोर्टों में पाकिस्तान की इस क्षमता में तुर्किये से जुड़े ड्रोन और चीनी तकनीक के इस्तेमाल का दावा किया गया है, हालांकि इन दावों की पूरी स्वतंत्र पुष्टि सीमित है।
सर क्रीक की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए भी एक विशेष चुनौती पैदा करती है। सामान्य गश्ती नौकाएं कम ज्वार के समय उथले हिस्सों में फंस सकती हैं, जबकि सामान्य पहिए वाले वाहन दलदली जमीन में धंस सकते हैं। इसी समस्या को देखते हुए भारत ने भी हाई-स्पीड उभयचर कॉम्बैट बोट की खरीद की प्रक्रिया शुरू की है। रक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2026 में ‘Buy (Indian)’ श्रेणी के तहत करीब 11 ऐसी नौकाओं के लिए Request for Proposal जारी किया था। इनमें सात नौकाएं गुजरात के कच्छ क्षेत्र में सेना के लिए और चार नौसेना के लिए प्रस्तावित हैं।
प्रस्तावित भारतीय उभयचर नौकाओं की खासियत यह है कि वे पानी और जमीन दोनों पर काम कर सकेंगी। रिपोर्टों के अनुसार इन नौकाओं को पानी में 40 नॉट से अधिक की गति से चलने तथा जमीन पर करीब 10 से 15 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ने के लिए डिजाइन किया जाना है। इनमें निगरानी और संचार उपकरणों के साथ रडार, GPS, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सिस्टम जैसी क्षमताएं शामिल किए जाने की योजना है। नौकाएं हथियार लगाने की सुविधा और बैलिस्टिक सुरक्षा से भी लैस होने की उम्मीद है।
इन प्लेटफॉर्मों का उद्देश्य केवल सैनिकों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना नहीं है। कठिन दलदली क्षेत्र में इनका इस्तेमाल निगरानी, गश्त, संदिग्ध गतिविधियों को रोकने और जरूरत पड़ने पर छोटी टीमों की तेज तैनाती के लिए किया जा सकता है। रिपोर्टों के अनुसार प्रत्येक नाव कम से कम 12 पूरी तरह सुसज्जित जवानों को ले जाने में सक्षम होगी। इससे ऐसे क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की गतिशीलता बढ़ सकती है, जहां पारंपरिक वाहनों और नौकाओं की सीमाएं सामने आती हैं।
भारत के लिए चुनौती केवल पाकिस्तान की संभावित सैन्य तैनाती नहीं है, बल्कि सर क्रीक का जटिल भूगोल भी है। कच्छ के इस हिस्से में जमीन और पानी की सीमाएं कई स्थानों पर स्पष्ट रूप से अलग दिखाई नहीं देतीं। ज्वार के साथ रास्ते और जलमार्ग बदलते रहते हैं। ऐसे में लगातार निगरानी के लिए समुद्री गश्ती नौकाओं, ड्रोन, रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और अन्य निगरानी प्रणालियों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण हो जाता है। भारतीय सुरक्षा ढांचे में पहले से बीएसएफ की फ्लोटिंग बॉर्डर आउटपोस्ट, तेज गश्ती नौकाएं और विशेष प्रशिक्षित कर्मियों की मौजूदगी बताई गई है।
सर क्रीक की रणनीतिक अहमियत का एक और पहलू इसका अरब सागर से सीधा संबंध है। यह क्षेत्र समुद्री सीमा, तटीय सुरक्षा और संभावित घुसपैठ के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। अतीत में समुद्री रास्ते से होने वाली घुसपैठ और तस्करी की घटनाओं ने भी इस इलाके की निगरानी की जरूरत को बढ़ाया है। इसी कारण भारत के लिए सर क्रीक केवल सीमा विवाद का मुद्दा नहीं, बल्कि व्यापक समुद्री सुरक्षा का विषय भी है।
पाकिस्तान की ओर से होवरक्राफ्ट और ड्रोन जैसी आधुनिक क्षमताओं पर जोर दिए जाने की रिपोर्टों के बीच भारत द्वारा उभयचर नौकाओं की खरीद की प्रक्रिया को भी इसी व्यापक सुरक्षा जरूरत के संदर्भ में देखा जा रहा है। भारत की प्रस्तावित नौकाएं विशेष रूप से ऐसे इलाके में काम करने के लिए तैयार की जा रही हैं जहां पानी और जमीन के बीच लगातार बदलती परिस्थितियां पारंपरिक सुरक्षा साधनों के लिए मुश्किल पैदा करती हैं। इससे भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को सर क्रीक में तेज निगरानी और प्रतिक्रिया क्षमता विकसित करने में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर, सर क्रीक में दोनों देशों की सैन्य और निगरानी क्षमताओं का आधुनिकीकरण इस क्षेत्र की रणनीतिक अहमियत को दिखाता है। पाकिस्तान की ओर से होवरक्राफ्ट, ड्रोन और समुद्री अभियानों से जुड़ी तैयारियों की रिपोर्ट सामने आ रही हैं, जबकि भारत ने भी उभयचर कॉम्बैट बोट और आधुनिक निगरानी क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए हैं। हालांकि पाकिस्तान की कथित नई तैनाती से जुड़े सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन दोनों पक्षों की गतिविधियों से यह स्पष्ट है कि सर क्रीक आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान के बीच समुद्री सीमा और तटीय सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण क्षेत्र बना रहेगा।




