धर्म पर मोहन भागवत की युवाओं को सीख, बोले- सत्य और आचरण से जुड़ा है धर्म

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उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने धर्म, रिलीजन और भारतीय जीवन-दृष्टि के बीच अंतर को लेकर युवाओं के सामने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारतीय संदर्भ में धर्म को केवल अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ के समान समझना उचित नहीं है। उनके अनुसार धर्म का दायरा रिलीजन से कहीं व्यापक है और इसका संबंध व्यक्ति के जीवन, आचरण, कर्तव्य तथा समाज के प्रति जिम्मेदारियों से है। भागवत ने कहा कि धर्म व्यक्ति को किसी बंधन में जकड़ने के बजाय उसे सही मार्ग पर चलने और अंततः मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाता है।

मोहन भागवत ने धर्म और रिलीजन के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि अंग्रेजी में ‘धर्म’ का ऐसा कोई एक शब्द नहीं है, जो भारतीय अवधारणा के पूरे अर्थ को व्यक्त कर सके। उन्होंने रिलीजन को एक विशेष मत, पंथ या धार्मिक परंपरा से जुड़ी व्यवस्था के रूप में समझाया, जबकि धर्म को जीवन को धारण करने वाले सिद्धांतों से जोड़ा। अपने संबोधन में उन्होंने संस्कृत की ‘धृ’ धातु का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म का अर्थ उस व्यवस्था से है जो जीवन और समाज को धारण करती है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य व्यक्ति को बांधना नहीं बल्कि उसे मुक्त करना है।

संघ प्रमुख ने युवाओं से धर्म को केवल पूजा-पद्धति, धार्मिक पहचान या कर्मकांड के सीमित अर्थ में नहीं देखने की अपील की। उन्होंने कहा कि धर्म का संबंध व्यक्ति के व्यवहार और उसके दैनिक जीवन से भी है। उनके अनुसार किसी दूसरे व्यक्ति को पीड़ा न पहुंचाना धर्म के महत्वपूर्ण सिद्धांतों में शामिल है। उन्होंने सत्य, जिम्मेदारी, आत्मसंयम और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता जैसे मूल्यों को भी धर्म के व्यावहारिक पक्ष से जोड़कर देखा। इस दौरान उन्होंने युवाओं को धर्म के विषय में सवाल करने, उसे समझने और अपनी धारणाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।

भागवत ने यह भी कहा कि किसी नए विचार को समझने के लिए मन को पूर्वाग्रहों और पहले से बनी धारणाओं से मुक्त रखना जरूरी है। जब व्यक्ति किसी विषय को पहले से तय निष्कर्षों के आधार पर देखता है तो उसके वास्तविक अर्थ को समझने में कठिनाई हो सकती है। उनके संबोधन में धर्म को जीवन की शुरुआत से जुड़ा विषय बताते हुए इस बात पर जोर दिया गया कि इसे केवल बुजुर्गों या जीवन के अंतिम पड़ाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। युवाओं के जीवन में भी धर्म और नैतिक मूल्यों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने धर्म और अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के संबंध पर भी बात की। उन्होंने कहा कि विभिन्न रिलीजन जब धर्म के व्यापक सिद्धांतों के अनुरूप चलते हैं तो वे मनुष्य के लिए मुक्ति का माध्यम बन सकते हैं। वहीं जब धार्मिक पहचान संकीर्णता या टकराव का कारण बनती है, तब विवाद की स्थिति पैदा हो सकती है। इस संदर्भ में उन्होंने धर्म को सत्य, आचरण और जीवन के मूल सिद्धांतों से जोड़ते हुए कहा कि परिस्थितियों के दबाव, भय या व्यक्तिगत लाभ के कारण व्यक्ति को अपने धर्म से विचलित नहीं होना चाहिए।

उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद का आयोजन 17 से 19 सितंबर तक देवास रोड स्थित गीता भवन में किया जा रहा है। सेवाज्ञ संस्थानम् की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में देश के अलग-अलग हिस्सों से युवा, विद्यार्थी, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य शामिल हो रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार कार्यक्रम में 24 से अधिक राज्यों के करीब 1,500 से 1,700 प्रतिभागियों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है। कार्यक्रम के दौरान धर्म, राष्ट्र, समाज, युवा शक्ति, शिक्षा, विज्ञान और तकनीक सहित विभिन्न विषयों पर संवाद और विचार-विमर्श किया जा रहा है।

युवा धर्म संसद के विभिन्न सत्रों में धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा, व्यक्ति के चारित्रिक उत्तरदायित्व और समकालीन सामाजिक विषयों पर चर्चा की जा रही है। आयोजन का उद्देश्य युवाओं को धर्म, संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़े विषयों पर संवाद का मंच उपलब्ध कराना बताया गया है। कार्यक्रम में वक्ताओं की ओर से युवा शक्ति को सकारात्मक दिशा देने और समाज तथा देश के विकास में उनकी भूमिका पर भी विचार रखे जा रहे हैं।

मोहन भागवत का उज्जैन संबोधन इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा रहा। उनके भाषण में धर्म को केवल किसी विशेष धार्मिक पहचान या पूजा-पद्धति के बजाय व्यापक नैतिक और दार्शनिक अवधारणा के रूप में समझाने पर जोर रहा। उन्होंने युवाओं को यह संदेश देने की कोशिश की कि धर्म का संबंध व्यक्ति के जीवन, उसके आचरण, कर्तव्य और समाज के प्रति जिम्मेदारी से है। इसी आधार पर उन्होंने धर्म और रिलीजन के बीच अंतर को समझाते हुए कहा कि धर्म का अंतिम उद्देश्य व्यक्ति को बांधना नहीं, बल्कि उसे सही आचरण के जरिए मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ाना है।

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