प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद माननीय नरेन्द्र मोदी जी का पांचवां वर्ष 2005 से 2006 के बीच आया। इस समय तक शासन की प्राथमिकताएं कई स्तरों पर आकार ले चुकी थीं। अब ध्यान उन व्यवस्थाओं पर था जिनका सीधा असर गांवों के जीवन पर पड़ना था। बिजली, खेती, सिंचाई, कृषि तकनीक और बाजार को अलग अलग विषयों के बजाय एक दूसरे से जोड़कर देखने की शुरुआत हुई। इसी दौर में ज्योतिग्राम योजना ने गुजरात के ग्रामीण इलाकों में बिजली की व्यवस्था को एक नए ढांचे में बदल दिया और आने वाले वर्षों के लिए एक अलग प्रशासनिक मॉडल की नींव रखी।
ज्योतिग्राम योजना की शुरुआत 2003 में पायलट परियोजना के रूप में हुई थी और 2004 तक इसे पूरे गुजरात में विस्तार दिया जा चुका था। पांचवें वर्ष में इसकी वास्तविक उपयोगिता गांवों में अधिक स्पष्ट होने लगी। योजना का मूल विचार था कि कृषि के लिए इस्तेमाल होने वाले बिजली फीडरों को घरेलू और गैर कृषि उपयोग के फीडरों से अलग किया जाए। इससे कृषि पंपों के लिए बिजली की आपूर्ति निर्धारित समय के अनुसार की जा सकी और गांवों के घरों तथा अन्य गैर कृषि उपभोक्ताओं को अधिक नियमित बिजली उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनी।यह बदलाव साधारण बिजली आपूर्ति सुधार से कहीं आगे था। गांव में नियमित बिजली का अर्थ था कि किसान अपनी सिंचाई की योजना पहले से बना सकता है। छोटे कारोबारियों को बिजली की अनिश्चितता से कम जूझना पड़ता था। डेयरी, आटा चक्की और दूसरे ग्रामीण कारोबार अपने काम के घंटे बढ़ा सकते थे। घरों में बच्चों के लिए शाम को पढ़ाई का समय बढ़ा। पंचायत भवन, स्कूल और दूसरी सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज में भी बिजली की उपलब्धता का सीधा लाभ मिला।
ज्योतिग्राम की खासियत उसका प्रशासनिक ढांचा भी था। कृषि और घरेलू बिजली की जरूरतों को अलग करने से आपूर्ति की निगरानी और खपत का आकलन अधिक व्यवस्थित तरीके से किया जा सकता था। कृषि क्षेत्र को निर्धारित समय पर बिजली मिलने से किसानों के लिए अनिश्चितता कम हुई। दूसरी ओर घरेलू उपभोक्ताओं के लिए नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने का रास्ता खुला। बिजली व्यवस्था को इस तरह व्यवस्थित करना उस समय राज्य के लिए एक बड़ा प्रशासनिक और तकनीकी काम था।
ग्रामीण बिजली में बदलाव के साथ खेती को लेकर भी सरकार की कार्यशैली में नई सक्रियता दिखाई दी। कृषि महोत्सव के जरिए अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को गांवों तक पहुंचाया गया। किसानों से सीधे संवाद किया गया और मिट्टी की जांच, सिंचाई की बेहतर तकनीक, बीज, फसल पद्धति तथा आधुनिक कृषि उपकरणों के बारे में जानकारी दी गई। इससे किसान और कृषि विशेषज्ञ के बीच दूरी कम करने का प्रयास हुआ।
गुजरात की भौगोलिक परिस्थितियों में इसका विशेष महत्व था। राज्य के कई हिस्सों में पानी की उपलब्धता सीमित रही है। ऐसे में केवल सिंचाई का विस्तार पर्याप्त नहीं था। पानी का बेहतर इस्तेमाल, सूक्ष्म सिंचाई और फसल के चुनाव जैसी चीजें भी उतनी ही महत्वपूर्ण थीं। कृषि महोत्सव के माध्यम से इन विषयों को सरकारी दफ्तरों से निकालकर सीधे खेतों तक ले जाने की कोशिश की गई।कृषि को बाजार से जोड़ने के स्तर पर भी इस दौर में नए प्रयोग हुए। किसानों और निजी कंपनियों के बीच पहले से तय व्यवस्था के तहत फसल खरीद की संभावनाओं को बढ़ावा देने के लिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की दिशा में कदम उठाए गए। इससे किसानों के लिए बाजार तक पहुंच और खरीदार के साथ सीधे संबंध की संभावना बनी। खेती को केवल उत्पादन की प्रक्रिया मानने के बजाय उसे बाजार, मूल्य और मांग से जोड़ने की सोच मजबूत हुई।
इन सभी पहलों को एक साथ देखें तो पांचवें वर्ष की प्रशासनिक तस्वीर अधिक स्पष्ट होती है। बिजली की व्यवस्था में सुधार ने खेती और ग्रामीण कारोबार के लिए आधार तैयार किया। कृषि महोत्सव ने किसानों तक विशेषज्ञता पहुंचाई। सिंचाई और कृषि तकनीक पर जोर ने सीमित संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा दिखाई और बाजार से जुड़े प्रयोगों ने किसान को उत्पादन के साथ बिक्री की चिंता से भी जोड़ना शुरू किया।इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि सरकारी योजनाओं को गांव तक पहुंचाने के लिए प्रशासनिक मशीनरी को भी सक्रिय किया गया। अधिकारियों की भूमिका केवल आदेश जारी करने तक सीमित नहीं रही। उन्हें गांवों में जाकर किसानों और स्थानीय समुदायों से संवाद करना पड़ा। योजनाओं के परिणाम को जमीन पर देखना और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार काम करना शासन की कार्यशैली का हिस्सा बनने लगा।
ज्योतिग्राम का असर बिजली के खंभों और तारों से कहीं आगे गया। नियमित बिजली ने ग्रामीण परिवारों की दिनचर्या बदली। खेती में समय की निश्चितता आई। छोटे कारोबारों को काम करने के लिए बेहतर परिस्थितियां मिलीं और गांवों में शाम के बाद भी आर्थिक तथा सामाजिक गतिविधियों की गुंजाइश बढ़ी। ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की उपलब्धता को केवल सुविधा के बजाय आर्थिक गतिविधि की बुनियादी जरूरत के रूप में देखने की सोच मजबूत हुई।
नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री के रूप में 2005 से 2006 का पांचवां वर्ष इसी व्यापक बदलाव का समय था। गुजरात में प्रशासन अब केवल शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित प्राथमिकताओं के साथ नहीं चल रहा था। गांव, किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी शासन की केंद्रीय चिंता में आ रहे थे। बिजली से लेकर खेत और खेत से बाजार तक की पूरी श्रृंखला को एक साथ देखने की कोशिश इस दौर की विशेषता बनी।
पांचवें वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि किसी एक घोषणा में नहीं थी। इसकी पहचान उन व्यवस्थाओं में थी जिनका असर आने वाले वर्षों में लगातार दिखाई देता रहा। ज्योतिग्राम ने ग्रामीण बिजली व्यवस्था को नई संरचना दी, कृषि महोत्सव ने ज्ञान को किसान तक पहुंचाने का रास्ता बनाया और कृषि तथा बाजार से जुड़े प्रयोगों ने गांव की अर्थव्यवस्था को बदलती जरूरतों के साथ जोड़ने की कोशिश की।
नरेन्द्र मोदी के 25 वर्षों के कार्यकारी सफर में 2005-06 का यह पड़ाव इसलिए उल्लेखनीय है कि इस दौरान शासन की पहुंच गांव के भीतर तक और अधिक गहरी हुई। बिजली, खेती और बाजार जैसे रोजमर्रा के विषयों को प्रशासनिक प्राथमिकता देकर गुजरात में ग्रामीण जीवन की कई पुरानी चुनौतियों से अलग तरीके से निपटने का प्रयास हुआ। ज्योतिग्राम इस पूरी सोच का सबसे स्पष्ट प्रतीक बनकर सामने आया।




