प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
शासन की गुणवत्ता की असली परीक्षा केवल बड़ी घोषणाओं या कागजी दावों में नहीं, बल्कि इस बात में होती है कि तय की गई नीति का अंतिम लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितनी तेजी और पारदर्शिता से पहुंचता है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी का वर्ष 2006-07, उनके कार्यकाल का छठा वर्ष, इसी प्रशासनिक जवाबदेही को स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। यह समय नई घोषणाओं का नहीं, बल्कि पहले से बनाई गई व्यवस्थाओं से अधिकतम परिणाम निकालने का था।
सात अक्टूबर 2001 को गुजरात की जिम्मेदारी संभालने के बाद नरेन्द्र मोदी के सामने शुरुआती वर्षों में कई ऐसी चुनौतियां थीं, जिनके लिए अलग-अलग स्तर पर प्रशासनिक हस्तक्षेप की जरूरत थी। लेकिन 2006 तक सरकार के पास योजनाओं और कार्यक्रमों का एक पर्याप्त ढांचा तैयार हो चुका था। अब प्रश्न यह था कि सचिवालय में बनी नीति जिले तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है और जिले की वास्तविक स्थिति मुख्यमंत्री कार्यालय तक कितनी तेजी से वापस आती है। इसी प्रश्न ने गुजरात के प्रशासन में समीक्षा और परिणाम आधारित कार्यशैली को अधिक महत्वपूर्ण बनाया।
इस दौर में शासन की भाषा भी बदलती दिखाई दी। विभागों से केवल यह बताना पर्याप्त नहीं था कि कोई योजना चल रही है। उसकी प्रगति कितनी हुई, लक्ष्य के मुकाबले स्थिति क्या है और आगे क्या किया जाना है, इन सवालों को प्रशासनिक समीक्षा का हिस्सा बनाया गया। आंकड़े इस प्रक्रिया में महज रिपोर्ट तैयार करने का साधन नहीं रहे, बल्कि निर्णय लेने के आधार बनने लगे। इससे शासन की निगरानी अधिक नियमित और परिणाम केंद्रित हुई।
सूचना प्रौद्योगिकी ने इस बदलाव को गति दी। गुजरात में भूमि अभिलेखों के कंप्यूटरीकरण, ई-प्रोक्योरमेंट, स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली और नगरपालिका सेवाओं के डिजिटलीकरण जैसे प्रयोग आगे बढ़ रहे थे। 2006 में गुजरात को डाटाक्वेस्ट ई-गौव समिट में पश्चिमी क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ ई-गवर्न्ड राज्य चुना गया। इसी वर्ष ई-नगरपालिका परियोजना को राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस सम्मेलन में सिल्वर आइकन मिला। 2006-07 के लिए कंप्यूटर सोसाइटी ऑफ इंडिया ने गुजरात को सर्वश्रेष्ठ ई-गवर्न्ड राज्य का सम्मान दिया। ई-प्रोक्योरमेंट और स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली को भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।इन उपलब्धियों का महत्व इस बात में था कि तकनीक को केवल सरकारी कार्यालयों की सुविधा नहीं, बल्कि नागरिक सेवा और प्रशासनिक निगरानी के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। जमीन के रिकॉर्ड से लेकर सरकारी खरीद और स्वास्थ्य सेवाओं तक, सरकारी प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित और सूचना आधारित बनाने की कोशिश हो रही थी। यह उस प्रशासनिक सोच का हिस्सा था जिसमें किसी व्यवस्था की सफलता उसके आकार से नहीं, उसकी पहुंच और परिणाम से तय होती है।
इसी सोच का सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय उदाहरण चिरंजीवी योजना थी। गरीब और ग्रामीण परिवारों की गर्भवती महिलाओं को संस्थागत प्रसव की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने निजी स्त्री रोग विशेषज्ञों को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ा। योजना के शुरुआती पांच जिलों में पहले वर्ष संस्थागत प्रसव की दर 38 प्रतिशत से बढ़कर 59 प्रतिशत हुई। जनवरी 2007 में इसे राज्य की पूरी गरीब आबादी तक विस्तारित किया गया, जो उस समय लगभग 1.265 करोड़ थी। मार्च 2008 तक योजना के अंतर्गत 1,76,293 प्रसव हो चुके थे और 865 निजी स्त्री रोग विशेषज्ञ इससे जुड़े थे।चिरंजीवी योजना की विशेषता केवल उसका विस्तार नहीं था। इसके पीछे प्रशासनिक सोच यह थी कि सार्वजनिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए उपलब्ध निजी विशेषज्ञता का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार ने गरीब परिवारों के लिए सेवा का वित्तीय बोझ अपने ऊपर लिया और निजी चिकित्सकों की क्षमता को इस व्यवस्था से जोड़ा। इस तरह एक ऐसी साझेदारी तैयार हुई जिसमें साधन अलग-अलग हो सकते थे, लेकिन लक्ष्य सार्वजनिक था।
इसी अवधि में गुजरात की औद्योगिक गतिविधियां भी तेजी से विस्तार ले रही थीं। 2006-07 में राज्य के बंदरगाहों से माल ढुलाई 13.24 करोड़ टन से अधिक रही। अहमदाबाद-वडोदरा औद्योगिक क्षेत्र का विस्तार और मुंद्रा जैसे बंदरगाहों के आसपास बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने राज्य की अर्थव्यवस्था को नई गति दी। बड़े निवेशों के साथ सड़क, बिजली, पानी, भूमि और परिवहन जैसी व्यवस्थाओं को भी समान गति से आगे बढ़ाना आवश्यक था। प्रशासन के लिए यह केवल निवेश आकर्षित करने का नहीं, बल्कि उसके अनुरूप पूरा आधार तैयार करने का काम था।
इस पूरे दौर को एक साथ देखें तो 2006-07 की तस्वीर किसी एक योजना से नहीं बनती। इसकी पहचान एक ऐसी कार्यशैली से बनती है जिसमें सरकार अपने ही काम को लगातार परख रही थी। आंकड़े बताते थे कि क्या हुआ, तकनीक सूचना को तेज करती थी, समीक्षा कमियों को सामने लाती थी और प्रशासनिक हस्तक्षेप उन कमियों को दूर करने का माध्यम बनता था।
नरेन्द्र मोदी के कार्यकारी सफर में छठा वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है कि इस समय तक शासन की प्राथमिकता केवल नई योजनाएं शुरू करने से आगे बढ़कर मौजूदा व्यवस्थाओं की क्षमता को पूरी तरह इस्तेमाल करने पर केंद्रित हो चुकी थी। नीति का मूल्य उसकी घोषणा में नहीं, उसके अंतिम परिणाम में देखा जाने लगा था। यही सोच आगे चलकर नरेन्द्र मोदी की प्रशासनिक शैली की एक प्रमुख पहचान बनी।




