मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहा विवाद अब पुलिस शिकायत तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा गुरुवार को दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन पहुंचीं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिकायत देने की बात कही और उन पर कथित तौर पर आपराधिक आचरण से जुड़े गंभीर आरोप लगाए। हालांकि, मोइत्रा की ओर से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और शिकायत दर्ज होना अपने आप में आरोपों के सही साबित होने का प्रमाण नहीं है।
महुआ मोइत्रा ने क्या आरोप लगाए?
पुलिस स्टेशन के बाहर महुआ मोइत्रा ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग में तीन आयुक्त हैं और संस्थागत व्यवस्था में सामूहिक निर्णय तथा आपसी नियंत्रण महत्वपूर्ण है। मोइत्रा का आरोप है कि पिछले करीब 10 महीनों के दौरान चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई मौकों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े फैसलों या आदेशों पर आपत्ति जताई थी।
मोइत्रा ने चुनाव आयोग के आईटी सिस्टम और मतदाता सूची के प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठाए। उनका दावा है कि मतदाता सूची से संबंधित कुछ प्रक्रियाओं में स्थानीय स्तर के अधिकारियों की भूमिका और सिस्टम तक उनकी पहुंच को लेकर बदलाव किए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि सॉफ्टवेयर के जरिए मतदाता सूची से संबंधित कामकाज को अधिक केंद्रीकृत किया गया। ये आरोप उन मीडिया रिपोर्टों के बाद सामने आए हैं, जिनमें चुनाव आयोग के भीतर कथित तौर पर अलग-अलग राय और आपत्तियों का उल्लेख किया गया है।
Form-6 को लेकर भी विवाद
महुआ मोइत्रा ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से संबंधित बदलावों पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि Form-6 में कुछ नए सवाल जोड़े गए और इस प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद भी सामने आए। मोइत्रा ने इस बदलाव की प्रक्रिया और उसके अधिकारिक आधार पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा के बाद ही निकाला जा सकता है।
क्या है SIR?
SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची की विशेष समीक्षा और पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। चुनाव आयोग के अनुसार इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और यह सुनिश्चित करना है कि पात्र नागरिकों के नाम सूची में शामिल रहें तथा अपात्र या गलत प्रविष्टियों की पहचान की जा सके। इस प्रक्रिया में मतदाताओं से संबंधित जानकारी का सत्यापन किया जाता है और जरूरत के अनुसार नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
SIR को लेकर विवाद मुख्य रूप से इस बात पर है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान किन लोगों के नाम प्रभावित होंगे और पात्र मतदाताओं को अपना नाम सूची में बनाए रखने के लिए किस प्रकार का सत्यापन करना होगा। विपक्षी दलों ने प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठाए हैं, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव प्रक्रिया का नियमित और आवश्यक हिस्सा है।
13 करोड़ नाम हटाए जाने की चर्चा क्यों?
विवाद के दौरान करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम प्रभावित होने का दावा भी सामने आया है। इस आंकड़े को समझने के लिए यह अंतर करना जरूरी है कि ड्राफ्ट मतदाता सूची से किसी नाम का बाहर होना और अंतिम मतदाता सूची से स्थायी रूप से नाम हट जाना एक ही बात नहीं है। SIR की प्रक्रिया में ड्राफ्ट सूची तैयार होने के बाद दावे और आपत्तियां दाखिल करने का अवसर भी दिया जाता है। इसलिए किसी शुरुआती सूची में नाम नहीं होने को अंतिम रूप से मताधिकार खत्म होने के बराबर नहीं माना जा सकता।
इसी मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि यदि प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में पात्र लोगों के नाम सूची से बाहर होते हैं तो उनके सामने अपने नाम को दोबारा शामिल कराने की चुनौती पैदा हो सकती है। चुनाव आयोग का पक्ष है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाना है।
चुनाव आयोग में कथित मतभेद से बढ़ा विवाद
SIR विवाद के बीच चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की रिपोर्टों ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया। कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कई अवसरों पर आयोग के फैसलों या प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्टों में मतदाता पंजीकरण, नाम जोड़ने और हटाने तथा मतदाता डेटा से जुड़ी प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है।
इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की। महुआ मोइत्रा की पुलिस शिकायत को भी इसी व्यापक विवाद के अगले चरण के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से इस तरह की व्याख्या को स्वीकार नहीं किया गया है कि अलग-अलग राय या टिप्पणियां किसी संस्थागत संकट का प्रमाण हैं।
चुनाव आयोग का पक्ष क्या है?
चुनाव आयोग का कहना है कि आयोग के भीतर किसी मुद्दे पर विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय सामने आना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। आयोग की ओर से यह भी कहा गया है कि अंतिम आदेश पूर्ण आयोग के निर्णय के रूप में जारी किए जाते हैं। इस लिहाज से विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे राजनीतिक आरोपों और आयोग की आधिकारिक स्थिति में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
आयोग की ओर से SIR को मतदाता सूची को अद्यतन और अधिक सटीक बनाने की प्रक्रिया बताया गया है। आयोग की आधिकारिक वेबसाइट और मतदाता सेवा पोर्टल पर SIR से संबंधित प्रक्रियाओं, फॉर्म और मतदाता सूची से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध कराई गई हैं।
पश्चिम बंगाल में SIR क्यों बना बड़ा मुद्दा?
पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर विवाद विशेष रूप से चर्चा में रहा है। यहां मतदाता सूची में नामों को लेकर बड़ी संख्या में दावे, आपत्तियां और अपीलें सामने आई हैं। नाम हटाए जाने या सूची में शामिल नहीं होने की स्थिति में मतदाताओं के पास निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा और आपत्ति दर्ज कराने का विकल्प है। इसी वजह से SIR को लेकर राजनीतिक दलों के बीच लगातार बयानबाजी होती रही है।
विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची में किसी पात्र नागरिक का नाम छूटने से उसके मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि पुनरीक्षण के दौरान पात्र मतदाताओं को शामिल करने और गलत या अपात्र प्रविष्टियों को हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जाती है।
अब आगे क्या होगा?
महुआ मोइत्रा की ओर से पुलिस शिकायत दिए जाने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस इस शिकायत पर किस तरह की कार्रवाई करती है। शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि उनमें आपराधिक कार्रवाई के लिए कोई आधार बनता है या नहीं। फिलहाल शिकायत और आरोपों को जांच के अधीन दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
SIR विवाद में अब मुख्य सवाल मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया, चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े हैं। एक तरफ विपक्ष चुनाव आयोग की प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है, वहीं आयोग अपने संवैधानिक अधिकार और मतदाता सूची के पुनरीक्षण की जिम्मेदारी पर जोर दे रहा है। आने वाले समय में पुलिस कार्रवाई, चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण और अदालतों में चल रही कार्यवाही से इस विवाद की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।




