चुनाव आयोग के फॉर्म-6 को लेकर विवाद, जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया

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नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच चल रहा विवाद अब नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 तक पहुंच गया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि फॉर्म-6 की ऑनलाइन प्रक्रिया में ऐसा अतिरिक्त प्रावधान जोड़ा गया, जिससे पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं के सामने अतिरिक्त जानकारी देने की शर्त आ गई। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया और SIR के तहत किए जा रहे बदलावों की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।

फॉर्म-6 का इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है, जिसका नाम पहले मतदाता सूची में दर्ज नहीं है। इसके जरिए आवेदक अपनी व्यक्तिगत जानकारी, जन्मतिथि, पता, पहचान से जुड़ी जानकारी और अन्य आवश्यक विवरण उपलब्ध कराता है। विवाद उस समय बढ़ा जब SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र को फॉर्म-6 की ऑनलाइन प्रक्रिया से जोड़े जाने की जानकारी सामने आई। इस अतिरिक्त घोषणा में आवेदक से पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से संबंधित जानकारी मांगे जाने की बात सामने आई। इसमें यह बताने का प्रावधान था कि आवेदक या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली संबंधित मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं।

इस व्यवस्था को लेकर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि वैधानिक फॉर्म-6 में इस तरह की अतिरिक्त जानकारी जोड़ना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का विषय नहीं है और इसके लिए नियमों में आवश्यक संशोधन किया जाना चाहिए था। रमेश ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने पहली बार मतदान करने वाले युवाओं को मतदाता सूची में जोड़ने की प्रक्रिया के साथ ऐसी अतिरिक्त शर्त जोड़ दी, जो उनके अनुसार आवेदन प्रक्रिया को जटिल बना सकती है।

हालांकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों को लेकर अलग स्थिति स्पष्ट की है। आयोग का कहना है कि मूल वैधानिक फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आयोग के अनुसार SIR के संदर्भ में फॉर्म-6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा यानी Annexure-D जोड़ा गया है। चुनाव आयोग का तर्क है कि यह व्यवस्था SIR से संबंधित पहले जारी किए गए निर्देशों के अनुरूप है। इस तरह विवाद का मुख्य बिंदु यह बन गया है कि अतिरिक्त घोषणा को ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में शामिल करने का तरीका नियमों के अनुरूप था या इसके लिए वैधानिक फॉर्म में औपचारिक संशोधन जरूरी था।

इस बीच चुनाव आयोग के भीतर इस मुद्दे को लेकर कथित मतभेद की खबरों ने विवाद को और बढ़ा दिया। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने SIR से जुड़े कुछ फैसलों पर अपनी आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्टों के अनुसार इनमें फॉर्म-6 से संबंधित बदलाव का मुद्दा भी शामिल था। इन आपत्तियों में कथित तौर पर यह सवाल उठाया गया कि यदि वैधानिक फॉर्म में कोई बदलाव किया जाता है तो संबंधित नियमों में भी आवश्यक संशोधन किया जाना चाहिए। हालांकि चुनाव आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर अंतिम निर्णय निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया के तहत लिया जाता है।

फॉर्म-6 विवाद के साथ ही मामला अब न्यायिक मंच तक भी पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में 25 सितंबर 2026 को दाखिल एक याचिका में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित वैधानिक उल्लंघनों की जांच और कार्रवाई की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ निर्णय और तकनीकी बदलाव अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना किए गए। याचिकाकर्ता ने ऐसे निर्णयों की न्यायिक जांच की मांग करते हुए उन्हें कानून के अनुरूप नहीं होने की स्थिति में रद्द करने का अनुरोध किया है।

याचिका में मूल वैधानिक फॉर्म-6 को बहाल करने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि फॉर्म-6 में अतिरिक्त जानकारी या घोषणा को अनिवार्य रूप से शामिल किया गया है तो इसकी वैधानिकता की जांच की जानी चाहिए। इसके साथ ही याचिका में SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। इसके लिए सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच आयोग या विशेष जांच दल यानी SIT गठित करने का अनुरोध किया गया है।

याचिका में चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम से जुड़े रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की मांग भी की गई है। इसमें ECINet और ERONet से संबंधित सर्वर लॉग, डेटाबेस, संचार रिकॉर्ड और मेटाडेटा को जांच पूरी होने तक संरक्षित रखने का अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि इससे SIR के दौरान हुए कथित तकनीकी और प्रशासनिक बदलावों की स्वतंत्र जांच में मदद मिल सकती है। हालांकि इन सभी दावों और आरोपों पर अभी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं आया है।

याचिका में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने का दावा भी किया गया है। इसमें करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोप की जांच की मांग की गई है। यह आंकड़ा याचिकाकर्ता के दावे का हिस्सा है और इसे फिलहाल किसी न्यायिक निष्कर्ष या चुनाव आयोग द्वारा स्वीकार किए गए तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसी तरह पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े लाखों मामलों और अपीलों को लेकर भी जांच की मांग की गई है।

पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल यह भी है कि चुनाव आयोग अपने निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लेता है। संबंधित कानून के अनुसार आयोग को जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से निर्णय लेने का प्रयास करना होता है। यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी विषय पर मतभेद हो तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में इसी निर्णय प्रक्रिया का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया गया है कि कथित मतभेद की स्थिति में संबंधित फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए।

फिलहाल इस पूरे मामले में दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं। कांग्रेस और जयराम रमेश चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए फॉर्म-6 से जुड़े कथित बदलाव को गंभीर मुद्दा बता रहे हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि मूल फॉर्म-6 में बदलाव नहीं किया गया, बल्कि SIR से संबंधित अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई है। आयोग अपनी निर्णय प्रक्रिया को भी निर्धारित संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था के अनुरूप बताता है।

ऐसे में फॉर्म-6 विवाद का अंतिम निष्कर्ष संबंधित दस्तावेजों, चुनाव आयोग की आधिकारिक प्रक्रिया और अदालत में होने वाली सुनवाई के आधार पर ही स्पष्ट होगा। फिलहाल मामला चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, मतदाता पंजीकरण की व्यवस्था और चुनाव आयोग के अधिकारों से जुड़े कई कानूनी सवालों को सामने ला रहा है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर आगे होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकता है कि फॉर्म-6 से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा और SIR की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए कानूनी सवालों पर अदालत का रुख क्या है।

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