प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
वर्ष 2014 में दिल्ली ने केवल एक नई सरकार का स्वागत नहीं किया था। देश की राजनीति में सत्ता का एक नया अध्याय खुलने के साथ शासन के सामने अपेक्षाओं का स्तर भी बदल गया था। गुजरात में लगभग तेरह वर्षों तक प्रशासन चलाने के बाद नरेन्द्र मोदी अब ऐसे देश की जिम्मेदारी संभाल रहे थे जहां हर निर्णय के पीछे केवल मंत्रालय और अधिकारी नहीं, बल्कि राज्यों की अपनी सरकारें, अलग सामाजिक परिस्थितियां और करोड़ों नागरिकों की अलग-अलग जरूरतें खड़ी थीं। गुजरात में जो प्रशासनिक अनुभव एक राज्य की सीमा में काम करता था, उसे अब पूरे भारत की जटिलता के बीच रास्ता बनाना था।
यही कारण है कि 2014 से 2015 के बीच का वर्ष केवल नई योजनाओं की शुरुआत का वर्ष नहीं था। इस वर्ष सरकार ने एक बुनियादी प्रश्न को सामने रखा। राज्य नागरिक तक कितनी दूर तक पहुंच सकता है और अपने निर्णय को जमीन पर परिणाम में कितनी जल्दी बदल सकता है।उस समय भारत की अर्थव्यवस्था भी एक मोड़ पर थी। निवेश की गति कमजोर हुई थी, बड़ी परियोजनाएं अटकी थीं और बैंकिंग व्यवस्था पर पुराने ऋणों का दबाव बढ़ रहा था। 2014 15 के आर्थिक सर्वेक्षण ने अटकी परियोजनाओं, कमजोर निजी निवेश, बैंकिंग क्षेत्र की कठिनाइयों और विनिर्माण को गति देने की आवश्यकता को प्रमुख आर्थिक चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया। ऐसे समय में सरकार की पहल बड़ी पहल उस नागरिक तक पहुंचने की थी जो औपचारिक आर्थिक व्यवस्था से ही बाहर था। 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री जन धन योजना शुरू हुई। इसका लक्ष्य उन परिवारों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना था जिनके पास बैंक खाता नहीं था। पहले वर्ष में लगभग 18 करोड़ खाते खोले गए। यह संख्या अपने आप में बड़ी थी, लेकिन इस पहल का महत्व उससे भी आगे था। पहली बार इतनी बड़ी संख्या में गरीब परिवारों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था के भीतर लाने का प्रयास हुआ। गरीबी के साथ भारत की एक पुरानी समस्या यह भी थी कि गरीब व्यक्ति सरकारी व्यवस्था का लाभार्थी तो बन जाता था, लेकिन वित्तीय व्यवस्था का नियमित हिस्सा नहीं बन पाता था। बैंक खाता इस दूरी को कम करने का माध्यम बन सकता था। बचत, बीमा, पेंशन और सरकारी सहायता जैसी व्यवस्थाओं के लिए एक औपचारिक रास्ता तैयार होने लगा।
उस समय के आर्थिक सर्वेक्षण ने बैंक खाते, पहचान और मोबाइल संपर्क को सरकारी सहायता की पहुंच बढ़ाने की एक व्यापक संभावना के रूप में देखा। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और आधार की व्यवस्था पहले से मौजूद थी, लेकिन जन धन ने बैंकिंग पहुंच का आधार बहुत विस्तृत कर दिया था। यानी सरकार के सामने गरीबी का प्रश्न धीरे धीरे केवल यह नहीं रह रहा था कि गरीब को सहायता कितनी दी जाए। प्रश्न यह भी बन रहा था कि सहायता उसके हाथ तक किस रास्ते से पहुंचे। इसी वर्ष सरकार ने एक दूसरे सवाल को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। दो अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ। उस समय ग्रामीण स्वच्छता कवरेज लगभग 39 प्रतिशत थी और 2019 तक पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया।
स्वच्छता के लिए योजनाएं पहले भी थीं। इसलिए 2014 की पहल का महत्व केवल एक नए कार्यक्रम में नहीं था। फर्क यह था कि स्वच्छता को पहली बार इतने व्यापक स्तर पर सामाजिक व्यवहार, स्वास्थ्य और नागरिक गरिमा से जोड़ा गया। शौचालय बनाना प्रशासन का काम हो सकता है, लेकिन उसका इस्तेमाल सुनिश्चित करना केवल प्रशासन का काम नहीं है। वहां समाज को साथ लेना पड़ता है। यही कारण था कि स्वच्छ भारत के साथ जनभागीदारी और व्यवहार परिवर्तन को भी महत्व दिया गया। शासन के लिए यह एक अलग तरह की चुनौती थी। सड़क और भवन की तरह स्वच्छता की उपलब्धि केवल निर्माण की संख्या से तय नहीं होती। इस वर्ष सरकार ने अर्थव्यवस्था के दूसरे छोर पर भी एक बड़ा प्रश्न उठाया। 25 सितंबर 2014 को मेक इन इंडिया अभियान शुरू किया गया। विनिर्माण को रोजगार, निवेश और आर्थिक विस्तार के महत्वपूर्ण आधार के रूप में सामने रखा गया। 25 क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई और विनिर्माण की हिस्सेदारी को अर्थव्यवस्था में 25 प्रतिशत तक ले जाने की महत्वाकांक्षा व्यक्त की गई। भारत को बड़ा बाजार तो माना जाता था। चुनौती यह थी कि उसे उत्पादन का बड़ा केंद्र कैसे बनाया जाए। किसी कारखाने के लिए केवल निवेशक की इच्छा पर्याप्त नहीं होती। जमीन चाहिए, बिजली चाहिए, सड़क चाहिए, कुशल श्रमिक चाहिए, वित्त चाहिए और सरकारी मंजूरियों की ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें अनिश्चितता कम हो। इसलिए विनिर्माण बढ़ाने की चर्चा अंततः प्रशासन की क्षमता की चर्चा भी थी। यही वह जगह थी जहां 2014 की नई सरकार के सामने सबसे कठिन प्रश्न आया। नई परियोजनाएं घोषित करना आसान था, लेकिन वर्षों से अटकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाना कठिन। 2014-15 के आर्थिक सर्वेक्षण में अटकी परियोजनाओं और बैंकिंग क्षेत्र की कठिनाइयों का विस्तृत उल्लेख हुआ। अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए केवल नई पूंजी लाना पर्याप्त नहीं था। पहले से लगी पूंजी को भी काम में लाना जरूरी था। सरकार ने इसी पृष्ठभूमि में निर्णय प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिश की। मंत्रियों के समूह और अधिकारप्राप्त मंत्रियों के समूह की व्यवस्था को समाप्त कर संबंधित मंत्रालयों को अधिक सीधे निर्णय लेने की जिम्मेदारी देने का फैसला किया गया। इसका उद्देश्य निर्णयों में देरी कम करना और जवाबदेही को स्पष्ट करना था। लेकिन निर्णय लेना ही पर्याप्त नहीं था। निर्णय के बाद उसकी निगरानी भी चाहिए थी।
25 मार्च 2015 को प्रगति व्यवस्था शुरू हुई। प्रधानमंत्री, केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और राज्यों के मुख्य सचिवों को एक ही डिजिटल मंच पर लाकर परियोजनाओं, जनशिकायतों और केंद्र तथा राज्यों से जुड़े लंबित मामलों की समीक्षा की जाने लगी। आंकड़ों, वीडियो संवाद और भौगोलिक सूचना तकनीक के इस्तेमाल ने इसे सामान्य सरकारी समीक्षा से अलग स्वरूप दिया। इस व्यवस्था का महत्व केवल तकनीक में नहीं था। भारत के प्रशासन में एक समस्या हमेशा से रही थी। किसी परियोजना में देरी के लिए जिम्मेदारी कई संस्थाओं में बंट जाती है। केंद्र अपनी जगह सही होता है, राज्य अपनी जगह सही होता है और किसी तीसरे विभाग की अनुमति बाकी रह जाती है। अंत में परियोजना वहीं खड़ी रहती है। प्रगति ने इस बिखरी हुई जिम्मेदारी को एक ही समीक्षा मंच पर लाने की कोशिश की।
गुजरात में प्रत्यक्ष समीक्षा और प्रशासनिक निगरानी की जिस कार्यशैली का अनुभव नरेन्द्र मोदी को मिला था, उसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना सरल नहीं था। गुजरात एक राज्य था। भारत एक संघीय गणराज्य है। यहां राज्यों की अपनी सरकारें हैं और अनेक विषयों पर अधिकार संवैधानिक रूप से बंटे हुए हैं। इसलिए गुजरात की कार्यशैली की हूबहू प्रतिकृति संभव नहीं थी। उसे राष्ट्रीय संस्थागत व्यवस्था का रूप देना जरूरी था। 2014-15 में केंद्र और राज्यों के वित्तीय संबंधों में भी बड़ा बदलाव आया। चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिश स्वीकार करते हुए राज्यों को केंद्रीय करों में मिलने वाला हिस्सा 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत कर दिया गया। इससे राज्यों को अपने विकास कार्यक्रमों के लिए अधिक संसाधन और अधिक वित्तीय गुंजाइश मिली।
इस निर्णय का महत्व इसलिए था क्योंकि भारत का विकास केवल दिल्ली की योजनाओं से नहीं हो सकता। देश के अलग-अलग हिस्सों की जरूरतें अलग हैं। कहीं सिंचाई प्राथमिकता है, कहीं सड़क, कहीं स्वास्थ्य और कहीं शिक्षा। राज्यों को अधिक संसाधन देकर उन्हें अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार निर्णय लेने की गुंजाइश देना संघीय शासन की एक महत्वपूर्ण शर्त है। यहीं 2014-15 का शासन मॉडल अपनी पूरी तस्वीर में दिखाई देता है। एक तरफ सरकार नागरिक को बैंकिंग व्यवस्था में ला रही थी। दूसरी तरफ स्वच्छता को घर और गांव की प्राथमिकता बना रही थी। तीसरी तरफ उत्पादन और रोजगार के लिए विनिर्माण को आगे बढ़ाने की कोशिश थी। चौथी तरफ वर्षों से अटकी परियोजनाओं को गति देने के लिए प्रशासनिक समीक्षा का नया ढांचा तैयार किया जा रहा था। और उसी समय राज्यों को अधिक वित्तीय संसाधन दिए जा रहे थे।
इन पहलों को अलग अलग योजनाओं की तरह देखना आसान है। लेकिन इन्हें साथ रखकर देखने पर एक बड़ी प्रशासनिक सोच दिखाई देती है। सरकार नागरिक तक पहुंचे। अर्थव्यवस्था में रास्ते खोले जाएं। निर्णय अटकें नहीं। और विकास की जिम्मेदारी केवल दिल्ली पर निर्भर न रहे। प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी का पहला वर्ष इसी सोच की प्रारंभिक रचना का वर्ष था। यह कहना जल्दबाजी होगी कि एक वर्ष में इन सभी क्षेत्रों की समस्याएं समाप्त हो गईं। आर्थिक सर्वेक्षण स्वयं बैंकिंग क्षेत्र की कमजोरी, निजी निवेश की सुस्ती और परियोजनाओं की रुकावट जैसी संरचनात्मक चुनौतियों को दर्ज कर रहा था। लेकिन इतिहास में किसी सरकार के पहले वर्ष का महत्व केवल तत्काल परिणामों से तय नहीं होता। उतना ही महत्वपूर्ण यह होता है कि सरकार ने समस्याओं को किस रूप में देखा और उन्हें हल करने के लिए कैसी संस्थाएं बनानी शुरू कीं। 2014-15 में शासन की भाषा में यही परिवर्तन दिखाई दिया। गरीब केवल सहायता पाने वाला व्यक्ति नहीं रहा, उसे औपचारिक वित्तीय व्यवस्था में जोड़ने की कोशिश हुई। स्वच्छता केवल स्थानीय निकाय का काम नहीं रही, उसे राष्ट्रीय जनभागीदारी का विषय बनाया गया। उद्योग केवल निवेश मांगने वाला क्षेत्र नहीं रहा, उसे रोजगार और उत्पादन की व्यापक रणनीति से जोड़ा गया। परियोजना केवल स्वीकृत फाइल नहीं रही, उसके परिणाम की निगरानी को भी प्रशासन का हिस्सा बनाया गया। और राज्य केवल केंद्र की योजनाओं को लागू करने वाली इकाई नहीं रहे, उन्हें अधिक वित्तीय स्थान देने की कोशिश हुई। यही 2014-15 की असली कहानी थी। गुजरात में लंबे समय तक विकसित हुई प्रशासनिक सोच अब दिल्ली की विशाल व्यवस्था के सामने थी। यहां गति को संस्थागत बनाना था, निगरानी को संघीय ढांचे के भीतर चलाना था और योजनाओं को करोड़ों लोगों के जीवन से जोड़ना था। 14वें वर्ष ने इस नई यात्रा का पहला संकेत दिया। सत्ता दिल्ली में आई थी, लेकिन असली बदलाव शासन की पहुंच में दिखाई देना शुरू हुआ था।




