प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
वर्ष 2015 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने को एक वर्ष पूरा हुआ था। दिल्ली की सत्ता को संभालने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि शासन की बनाई नीतियां केवल सरकारी घोषणाएं बनकर न रह जाएं, बल्कि उस व्यक्ति तक पहुंचें जिसकी रोजमर्रा की जिंदगी में बीमारी, दुर्घटना, बुढ़ापा, पूंजी की कमी और शहरों की अव्यवस्था जैसी समस्याएं सीधे आर्थिक संकट में बदल जाती हैं। इसी बिंदु पर 2015 की नीतियों को समझना जरूरी है। इस वर्ष मोदी सरकार ने आर्थिक नीति का दायरा बड़े उद्योग और निवेश से आगे बढ़ाकर सामाजिक सुरक्षा, छोटे उद्यम, राज्यों की भागीदारी और शहरी जीवन तक फैलाया।
उस समय देश की बड़ी आबादी के पास बैंक खाता होने के बावजूद बीमा और पेंशन जैसी सुरक्षा सीमित थी। सरकार के आंकड़ों के अनुसार 47.29 करोड़ के श्रमबल में करीब 88 प्रतिशत कामगार असंगठित क्षेत्र में थे और उनके लिए औपचारिक पेंशन व्यवस्था नहीं थी। समस्या केवल यह नहीं थी कि इन लोगों की आय कम थी। बड़ी समस्या यह थी कि एक दुर्घटना, परिवार के कमाने वाले सदस्य की मृत्यु या बुढ़ापे के बाद आय रुकने पर उनके पास कोई व्यवस्थित सुरक्षा नहीं थी। नरेन्द्र मोदी ने इस समस्या को केवल कल्याणकारी सहायता के रूप में नहीं देखा। उनका जोर ऐसी व्यवस्था बनाने पर था जिसमें व्यक्ति छोटी राशि देकर अपने जीवन के बड़े जोखिमों के विरुद्ध सुरक्षा हासिल कर सके। 9 मई 2015 को कोलकाता से प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और अटल पेंशन योजना की शुरुआत हुई। जीवन ज्योति बीमा योजना में 330 रुपये सालाना प्रीमियम पर दो लाख रुपये का जीवन बीमा और सुरक्षा बीमा योजना में 12 रुपये सालाना पर दुर्घटना मृत्यु या दिव्यांगता का बीमा उपलब्ध कराया गया। अटल पेंशन योजना में योगदान के आधार पर 60 वर्ष की आयु के बाद एक हजार से पांच हजार रुपये तक की न्यूनतम मासिक पेंशन का प्रावधान था। इन योजनाओं को बैंक खाते से जोड़ना उनकी सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक विशेषता थी। यानी बैंकिंग व्यवस्था को केवल धन रखने की सुविधा से आगे ले जाकर उसे सामाजिक सुरक्षा पहुंचाने का माध्यम बनाया गया। मोदी ने इस सोच को एक सरल सूत्र में रखा था। उनके शब्दों में जनधन ने बैंकिंग व्यवस्था से बाहर लोगों को जोड़ा, मुद्रा ने उन लोगों तक ऋण पहुंचाने का प्रयास किया जिन्हें औपचारिक वित्त से पर्याप्त मदद नहीं मिलती थी और जनसुरक्षा ने उन लोगों को सुरक्षा देने की कोशिश की जो बीमा और पेंशन से दूर थे। 9 मई को योजनाओं के शुभारंभ के समय उन्होंने बताया था कि परीक्षण के तौर पर 1 मई से नामांकन शुरू होने के बाद ही करीब पांच करोड़ पांच लाख लोग इन योजनाओं में शामिल हो चुके थे। यह शुरुआती प्रतिक्रिया बताती थी कि कम लागत वाली सामाजिक सुरक्षा की मांग कितनी व्यापक थी।
लेकिन सुरक्षा के साथ मोदी की आर्थिक सोच का दूसरा हिस्सा था स्वावलंबन। भारत में रोजगार का बड़ा आधार बड़ी औद्योगिक इकाइयां नहीं, बल्कि छोटी दुकानें, कारीगर, सेवा इकाइयां, छोटे निर्माता और स्वरोजगार वाले लोग हैं। सरकार ने 2015 में ऐसे करीब 5.77 करोड़ छोटे कारोबारी प्रतिष्ठानों का अनुमान दिया था। इनमें बड़ी संख्या ऐसे उद्यमों की थी जिन्हें औपचारिक ऋण तक पहुंच हासिल करने में कठिनाई होती थी। यही वह समस्या थी जिसके जवाब में 8 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मुद्रा योजना शुरू हुई। मुद्रा के पीछे मोदी सरकार की सोच यह थी कि छोटे कारोबारी को केवल रोजगार मांगने वाला व्यक्ति मानने के बजाय उसे रोजगार पैदा करने वाली आर्थिक इकाई के रूप में देखा जाए। योजना में शिशु, किशोर और तरुण श्रेणियों के जरिए छोटे कारोबार की जरूरत के अनुसार ऋण का ढांचा बनाया गया। इसका उद्देश्य सूक्ष्म और छोटे कारोबारों को संस्थागत वित्त से जोड़ना था। इस दृष्टि से मुद्रा केवल ऋण योजना नहीं थी। यह उस आर्थिक वर्ग को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था में लाने का प्रयास था जिसे लंबे समय तक बैंकिंग व्यवस्था की मुख्यधारा से अलग देखा जाता रहा था। 2015 की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। नरेन्द्र मोदी के सामने भारत की दूसरी बड़ी चुनौती थी तेजी से बदलता शहरी भारत। शहरों में आबादी और आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही थीं, लेकिन जलापूर्ति, सीवरेज, जल निकासी, परिवहन और नगर प्रशासन जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं पर दबाव भी बढ़ रहा था। मोदी ने इस समस्या को केवल निर्माण का प्रश्न नहीं माना। उनके लिए शहरीकरण को एक अवसर के रूप में देखने और शहरों को अपनी जरूरत के अनुसार अपनी विकास योजना तैयार करने की आवश्यकता थी।
25 जून 2015 को स्मार्ट सिटी मिशन और अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन यानी अमृत की शुरुआत हुई। स्मार्ट सिटी के लिए शहरों को अपनी योजनाएं तैयार करनी थीं और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया से उनका चयन होना था। पहले चरण में 98 शहरों को चुना गया और उनमें से 20 शहरों का चयन पहले दौर में किया गया। अमृत के तहत 500 शहरों और कस्बों में जलापूर्ति, सीवरेज, जल निकासी, हरित क्षेत्र और शहरी परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया। स्मार्ट सिटी के शुभारंभ के अवसर पर मोदी ने जिस विचार पर विशेष जोर दिया, वह इस पूरी नीति को समझने की कुंजी है। उनका कहना था कि शहरों को स्मार्ट बनाने का निर्णय केवल सरकार नहीं, बल्कि शहर के लोग और स्थानीय प्रशासन मिलकर करें। यानी दिल्ली में बैठकर हर शहर के लिए एक जैसा खाका बनाने के बजाय स्थानीय जरूरत और स्थानीय प्रशासन की क्षमता को महत्व दिया गया। इसी सोच ने स्मार्ट सिटी मिशन की प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया को जन्म दिया। इसी वर्ष केंद्र और राज्यों के बीच नीति निर्माण का ढांचा भी बदला। 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग अस्तित्व में आया। 8 फरवरी को उसकी पहली शासी परिषद की बैठक में नरेन्द्र मोदी ने मुख्यमंत्रियों से केंद्र और राज्यों को मिलकर काम करने तथा साझा विकास एजेंडा तैयार करने की अपील की। परिषद ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं के पुनर्गठन, कौशल विकास और स्वच्छ भारत पर मुख्यमंत्रियों के समूह बनाने के साथ कृषि विकास और गरीबी उन्मूलन पर राज्यों की कार्यबल व्यवस्था का निर्णय किया।
इसका अर्थ केवल एक नए संस्थान का गठन नहीं था। मोदी सरकार के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण था कि देश जैसे विशाल संघीय ढांचे में दिल्ली में बनाई गई नीति राज्यों की अलग-अलग वास्तविकताओं तक कैसे पहुंचे। इसलिए 2015 में राज्यों को नीति निर्माण की बातचीत में अधिक औपचारिक स्थान देने की कोशिश हुई। जुलाई की दूसरी शासी परिषद बैठक में भी मोदी ने राज्यों को विकास प्रयासों का केंद्र मानते हुए केंद्र और राज्यों को साथ चलने की आवश्यकता दोहराई।.2015 में तकनीक को लेकर भी मोदी की दृष्टि इसी व्यापक बदलाव से जुड़ती दिखाई दी। डिजिटल भारत का उद्देश्य सरकारी सेवाओं और सूचनाओं की पहुंच को डिजिटल माध्यमों से बढ़ाना था। सितंबर में सिलिकॉन वैली की यात्रा के दौरान मोदी ने प्रौद्योगिकी कंपनियों और भारतीय तकनीकी समुदाय के साथ संवाद किया। यहां उनका जोर केवल निवेश आकर्षित करने पर नहीं, बल्कि डिजिटल तकनीक को शासन, सेवाओं और आर्थिक अवसरों से जोड़ने पर भी था। इस तरह 2015 को अलग-अलग योजनाओं की सूची के रूप में देखना उसके मूल अर्थ को सीमित कर देता है। नरेन्द्र मोदी के सामने उस समय तीन अलग-अलग लेकिन परस्पर जुड़े प्रश्न थे। जिस व्यक्ति के पास संकट के समय कोई सुरक्षा नहीं थी, उसे कम लागत वाला बीमा और पेंशन कैसे मिले। जिस छोटे कारोबारी के पास कारोबार की क्षमता थी लेकिन पूंजी नहीं, उसे संस्थागत ऋण तक कैसे पहुंचाया जाए। और जिस शहर में देश की बढ़ती आबादी और अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बसने वाला था, उसकी बुनियादी व्यवस्था को स्थानीय जरूरत और बेहतर प्रशासन के आधार पर कैसे तैयार किया जाए। 2015 में मोदी सरकार ने इन तीनों प्रश्नों के लिए अलग-अलग रास्ते बनाए। जनसुरक्षा योजनाओं ने सामाजिक जोखिम को नीति का विषय बनाया, मुद्रा ने छोटे उद्यम को औपचारिक वित्त से जोड़ने की कोशिश की और स्मार्ट सिटी तथा अमृत ने शहरी भारत को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में सामने रखा। नीति आयोग ने इस पूरी प्रक्रिया में राज्यों की भूमिका को संस्थागत रूप देने का प्रयास किया। यही 2015 की सबसे महत्वपूर्ण पहचान थी। नरेन्द्र मोदी के लिए शासन का अर्थ केवल नई योजनाओं की घोषणा करना नहीं था, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना था जिसमें बैंक खाता सुरक्षा से जुड़े, सुरक्षा आर्थिक आत्मविश्वास से जुड़े, ऋण छोटे उद्यम से जुड़े और शहर अपनी जरूरत के अनुसार अपने भविष्य की योजना बनाएं। इस दृष्टि से 2015 वह वर्ष था जिसमें शासन का दायरा व्यक्ति की आर्थिक सुरक्षा से लेकर देश के बदलते शहरी भूगोल तक एक साथ फैलता दिखाई दिया।




