नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम मामला सामने आया है। अदालत ने केंद्र सरकार से इस बात पर विचार करने को कहा है कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट को नियंत्रित करने और उनकी ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा कानूनों के तहत प्रभावी वैधानिक व्यवस्था कैसे तैयार की जा सकती है। 28 सितंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। यह मामला ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस’ की ओर से दायर जनहित याचिका से संबंधित है।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या नाबालिगों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्वतंत्र रूप से अकाउंट बनाने और प्लेटफॉर्म की शर्तों को स्वीकार करने की अनुमति दी जानी चाहिए। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका ने अदालत के सामने दलील दी कि सोशल मीडिया अकाउंट बनाते समय उपयोगकर्ता प्लेटफॉर्म के नियमों और शर्तों को स्वीकार करता है। ऐसे में नाबालिगों की संविदात्मक क्षमता को देखते हुए यह सवाल उठता है कि क्या वे इस तरह की शर्तों को कानूनी रूप से स्वीकार करने की स्थिति में हैं। याचिका में इसी कानूनी स्थिति को आधार बनाकर नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की मांग की गई है।
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 11 इस मामले में महत्वपूर्ण है। इस प्रावधान के मुताबिक किसी व्यक्ति की अनुबंध करने की क्षमता उसकी उम्र, मानसिक क्षमता और लागू कानूनों के तहत उसकी पात्रता पर निर्भर करती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाना केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें प्लेटफॉर्म की शर्तों और नीतियों को स्वीकार करना भी शामिल होता है। इसलिए नाबालिगों के सोशल मीडिया अकाउंट से जुड़े नियमों को भारतीय संविदा कानून और बच्चों की सुरक्षा से संबंधित अन्य कानूनों के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह संकेत दिया कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए केवल स्वैच्छिक दिशा-निर्देश पर्याप्त नहीं हो सकते और इस संबंध में वैधानिक व्यवस्था की संभावना पर विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने केंद्र से यह देखने को कहा कि क्या सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े इंटरमीडियरी नियमों के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए नाबालिगों की सुरक्षा संबंधी स्पष्ट प्रावधान बनाए जा सकते हैं। अदालत की ओर से यह भी सवाल उठाया गया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और उनके सॉफ्टवेयर को भारतीय कानूनों के अनुरूप किस तरह संचालित कराया जा सकता है। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले में सरकार की ओर से आवश्यक पहलुओं की जांच करने की बात कही।
याचिका में नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल को पूरी तरह रोकने के बजाय कई तरह के सुरक्षा उपायों पर भी जोर दिया गया है। इनमें माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति, उम्र की पुष्टि और कुछ परिस्थितियों में पहचान सत्यापन जैसे उपाय शामिल हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि बच्चों को इंटरनेट या शैक्षणिक सामग्री से पूरी तरह दूर करने के बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है जिसमें नाबालिगों के डिजिटल अकाउंट पर अभिभावकीय नियंत्रण और निगरानी सुनिश्चित हो।
मामले में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल से जुड़े संभावित खतरों को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना गया है। ऑनलाइन ग्रूमिंग, साइबरबुलिंग, यौन शोषण, व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग, उम्र के अनुरूप नहीं होने वाली सामग्री और बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की प्रोफाइलिंग जैसे जोखिमों का उल्लेख किया गया है। याचिका में कहा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों की बढ़ती मौजूदगी के बीच उनकी व्यक्तिगत जानकारी और डिजिटल गतिविधियों की सुरक्षा के लिए मजबूत व्यवस्था जरूरी है।
केंद्र सरकार के पास बच्चों की डिजिटल सुरक्षा से संबंधित कुछ मौजूदा कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 डिजिटल प्लेटफॉर्म और इंटरमीडियरी की जिम्मेदारियों का ढांचा उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन से संबंधित कानून और नियम भी मौजूद हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मौजूदा कानूनी ढांचे को नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए और अधिक प्रभावी तरीके से कैसे लागू किया जा सकता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा सुनवाई का अर्थ यह नहीं है कि देश में 18 वर्ष से कम उम्र के सभी लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया गया है। अभी अदालत ने ऐसा कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है कि सभी नाबालिगों के अकाउंट बंद कर दिए जाएं या उन्हें सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से रोक दिया जाए। फिलहाल केंद्र सरकार को कानूनी और नियामकीय विकल्पों की जांच करने तथा नाबालिगों की डिजिटल सुरक्षा के लिए वैधानिक व्यवस्था की संभावना पर विचार करना है।
आगे की कार्रवाई में उम्र की पुष्टि, अभिभावकीय सहमति, डेटा सुरक्षा, अकाउंट की निगरानी और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं। यदि सरकार मौजूदा नियमों में बदलाव करती है या नए प्रावधान लाती है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को नाबालिग उपयोगकर्ताओं से जुड़े अकाउंट बनाने और संचालित करने की प्रक्रिया में नए नियमों का पालन करना पड़ सकता है। हालांकि, इन प्रावधानों का अंतिम स्वरूप केंद्र सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों और सुप्रीम कोर्ट में आगे होने वाली सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगा।
इस मामले ने भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी से जुड़ी बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है। एक तरफ बच्चों और किशोरों के लिए इंटरनेट शिक्षा, जानकारी और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है, वहीं दूसरी तरफ ऑनलाइन सुरक्षा, निजी डेटा और अनुचित सामग्री तक पहुंच जैसे मुद्दे भी लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद अब निगाहें केंद्र सरकार के अगले कदम पर हैं कि वह नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर मौजूदा कानूनों के भीतर समाधान तलाशती है या इसके लिए कोई अलग वैधानिक व्यवस्था तैयार करती है।




