प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
मई 2019 में चुनाव परिणाम आए तो भारतीय जनता पार्टी पहले से बड़ी संख्या के साथ सत्ता में लौटी। 303 सीटों के साथ नरेन्द्र मोदी के सामने पांच वर्ष का ऐसा राजनीतिक अवसर था जिसमें सरकार को गठबंधन की मजबूरियों से अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता मिली। 30 मई को उन्होंने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन अगले बारह महीनों में यह साफ हो गया कि दूसरा कार्यकाल पहले कार्यकाल की अगली कड़ी भर नहीं होगा। सरकार ने आर्थिक सुस्ती के बीच अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश की, किसान और छोटे कारोबारियों के लिए कल्याणकारी ढांचे का विस्तार किया, जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति बदली, नागरिकता कानून में संशोधन किया और अयोध्या के दशकों पुराने विवाद का न्यायिक समाधान सामने आया। वर्ष समाप्त होते-होते चीन के वुहान से आती एक नई बीमारी की खबर भारत के सामने एक ऐसी चुनौती बनकर खड़ी हो गई, जिसकी कल्पना वर्ष के आरंभ में किसी ने नहीं की थी। यानी 2019–20 एक साथ निर्माण और विघटन, विस्तार और संकट का वर्ष था।
दूसरे कार्यकाल की शुरुआत आर्थिक मोर्चे पर आसान नहीं थी। 2018–19 में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि 6.8 प्रतिशत रही और 2019–20 में यह घटकर लगभग पांच प्रतिशत रह गई। निवेश और मांग दोनों पर दबाव था। बैंकिंग व्यवस्था में पुराने तनाव की छाया बनी हुई थी और उद्योग के कई हिस्सों में गति कमजोर पड़ रही थी।
सरकार ने इसका उत्तर केवल राजकोषीय खर्च बढ़ाने से नहीं दिया। जुलाई 2019 के बजट में 2024–25 तक पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य रखा गया और निवेश, बुनियादी ढांचे, रोजगार तथा उद्यमिता को विकास की धुरी बनाया गया। छोटे उद्योगों, स्टार्टअप, कृषि अवसंरचना और विनिर्माण के लिए कई प्रोत्साहनों की घोषणा हुई। साथ ही लंबे समय से बिखरे श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेटने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। मजदूरी संहिता 2019 में कानून बनी और बाकी तीन संहिताओं की विधायी प्रक्रिया 2020 में पूरी हुई।
यह वह हिस्सा है जो अक्सर 2019–20 की राजनीतिक कहानी में दब जाता है। साल की सुर्खियां संविधान और नागरिकता से बन रही थीं, लेकिन पर्दे के पीछे सरकार अर्थव्यवस्था के संस्थागत ढांचे को भी बदल रही थी।
कॉरपोरेट कर की दरों में बड़ी कटौती की गई। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्गठन और पूंजीकरण की प्रक्रिया जारी रही। दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के जरिए फंसे कर्ज के समाधान को आगे बढ़ाया गया। इन कदमों का उद्देश्य तत्काल सुर्खियां पैदा करना नहीं, बल्कि निवेश और ऋण व्यवस्था के भीतर लंबे समय से जमा जड़ता को कम करना था। सरकार के एक वर्ष के अपने आकलन में भी इन सुधारों को आर्थिक पुनर्गठन के प्रमुख हिस्से के रूप में रेखांकित किया गया था।
ग्रामीण भारत के लिए भी दूसरा कार्यकाल नई प्राथमिकताओं के साथ आया। पीएम-किसान, जिसकी शुरुआत फरवरी 2019 में सीमित दायरे के छोटे और सीमांत किसानों से हुई थी, जून 2019 से सभी पात्र किसान परिवारों तक विस्तारित कर दी गई। साल के अंत तक सरकारी आंकड़ों में 8.12 करोड़ किसान परिवारों के पंजीकरण और 48,937 करोड़ रुपये से अधिक के वितरण की जानकारी दी गई। सितंबर 2019 में छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना भी शुरू हुई, जिसमें 60 वर्ष की आयु के बाद तीन हजार रुपये मासिक पेंशन का प्रावधान था। इस तरह कल्याण की दिशा में एक परिवर्तन दिखाई दे रहा था। सहायता अब केवल सब्सिडी या वस्तु के रूप में नहीं थी। बैंक खाते में सीधे आने वाली राशि, पेंशन और स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे मॉडल राज्य और नागरिक के संबंध को नए तरीके से परिभाषित कर रहे थे। लेकिन 2019 का सबसे बड़ा राजनीतिक अध्याय अर्थव्यवस्था से बाहर लिखा जाना था।
5 अगस्त : कश्मीर का नया संवैधानिक अध्याय
पांच अगस्त 2019 को संसद में जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति बदलने का प्रस्ताव आया। राष्ट्रपति के संवैधानिक आदेशों और संसद की प्रक्रिया के बाद अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान निष्प्रभावी हुए और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत पूर्व राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, में विभाजित किया गया। 31 अक्टूबर 2019 से नई व्यवस्था लागू हुई।
सरकार ने इसे जम्मू-कश्मीर को देश की शेष संवैधानिक व्यवस्था के साथ पूर्ण रूप से जोड़ने और अलगाववाद तथा आतंकवाद की समस्या से निपटने की दिशा में निर्णायक कदम बताया। प्रधानमंत्री ने बाद में भी संसद में कहा कि अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने से जम्मू-कश्मीर का देश के बाकी हिस्सों के साथ पूर्ण एकीकरण संभव हुआ। लेकिन इस परिवर्तन का प्रशासनिक मूल्य भी था। व्यापक सुरक्षा बंदोबस्त किए गए, संचार सेवाओं पर प्रतिबंध लगे और कई राजनीतिक नेताओं को हिरासत में रखा गया। सरकार ने सुरक्षा परिस्थितियों को इसका आधार बताया, जबकि आलोचकों ने नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों पर सवाल उठाए। इस फैसले की संवैधानिक परीक्षा तत्काल समाप्त नहीं हुई। दिसंबर 2023 में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने 2019 के कदम की वैधता बरकरार रखी, साथ ही जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने और विधानसभा चुनाव कराने के संबंध में निर्देश दिए। इस प्रकार 2019 का फैसला बाद में सर्वोच्च न्यायालय की विस्तृत न्यायिक समीक्षा से भी गुजरा।
कश्मीर के बाद सरकार ने नागरिकता के प्रश्न को छुआ। दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन विधेयक संसद में आया और दोनों सदनों से पारित होने के बाद 12 दिसंबर को कानून बना। इसने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लिए नागरिकता पाने की प्रक्रिया में विशेष राहत दी। सरकार ने इसे धार्मिक उत्पीड़न झेलने वाले अल्पसंख्यकों के लिए मानवीय उपाय बताया। लेकिन नागरिकता संशोधन कानून ने देश में तीखा संवैधानिक और सामाजिक विवाद पैदा किया। आलोचकों ने धर्म को नागरिकता के लिए पात्रता के आधार के रूप में इस्तेमाल किए जाने पर संविधान के समानता और धर्मनिरपेक्षता संबंधी सिद्धांतों का प्रश्न उठाया। सरकार का जवाब था कि यह कानून किसी भारतीय नागरिक की नागरिकता नहीं छीनता और इसका उद्देश्य तीन पड़ोसी देशों से आए निर्दिष्ट अल्पसंख्यकों के लिए नागरिकता का रास्ता आसान करना है। देश के अनेक हिस्सों और विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन हुए। दिल्ली का शाहीन बाग आंदोलन इसका सबसे चर्चित प्रतीक बना। 2019 के अंत तक नागरिकता का प्रश्न संसद से निकलकर सड़क और विश्वविद्यालय परिसर तक पहुंच चुका था और फिर 9 नवंबर आया।
अयोध्या का फैसला
सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अयोध्या भूमि विवाद पर सर्वसम्मत फैसला सुनाया। विवादित भूमि रामलला विराजमान के पक्ष में दी गई और केंद्र सरकार को मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया गया। साथ ही सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को अयोध्या में पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि देने का आदेश दिया गया। अदालत ने अपने फैसले में उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड, पुरातात्विक सामग्री और मौखिक साक्ष्यों की समीक्षा की। साथ ही 1949 में मूर्तियां रखे जाने और 1992 में विवादित ढांचे के विध्वंस को कानून के शासन का उल्लंघन माना। अयोध्या का विवाद इसलिए असाधारण था क्योंकि वह केवल भूमि का मुकदमा नहीं था। 1980 और 1990 के दशक से यह भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली मुद्दों में रहा था। 1992 के विध्वंस के बाद इसका कानूनी और राजनीतिक प्रभाव और गहरा हुआ। नवंबर 2019 का फैसला इस लंबे न्यायिक अध्याय का निर्णायक पड़ाव था। कश्मीर में संसद और कार्यपालिका ने संवैधानिक व्यवस्था बदली थी। नागरिकता के मामले में संसद ने नया कानून बनाया। अयोध्या में सर्वोच्च न्यायालय ने दशकों पुराने विवाद का फैसला सुनाया।
तीनों घटनाओं को अलग-अलग देखने पर वे तीन खबरें लगती हैं। साथ रखिए तो 2019–20 की व्यापक तस्वीर सामने आती है। दूसरे कार्यकाल में सरकार ने आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ राज्य की संवैधानिक और राजनीतिक संरचना के उन हिस्सों पर भी हाथ डाला, जिन पर लंबे समय से बहस चल रही थी। लेकिन साल यहीं खत्म नहीं हुआ।
दिसंबर में जब भारत इन फैसलों और उनसे पैदा हुए राजनीतिक-सामाजिक तनावों पर बहस कर रहा था, तब दुनिया के दूसरे छोर पर एक नई बीमारी की खबर सामने आ चुकी थी। जनवरी 2020 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की भारत इकाई ने वुहान में अज्ञात कारणों वाले निमोनिया के प्रकोप की जानकारी भारत को दी। 18 जनवरी से भारत ने प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों की हवाई अड्डों पर जांच शुरू की। 30 जनवरी को देश में कोरोना संक्रमण का पहला मामला सामने आया। अभी देश यह समझ ही रहा था कि यह बीमारी कितनी बड़ी चुनौती बन सकती है कि मार्च तक तस्वीर बदल गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 11 मार्च 2020 को कोविड-19 को महामारी घोषित किया। 24 मार्च को केंद्र सरकार ने देशव्यापी लॉकडाउन के आदेश जारी किए।
यहीं 2019–20 की कहानी अचानक दूसरी दिशा में मुड़ जाती है। जिस सरकार ने वर्ष की शुरुआत में आर्थिक विकास को गति देने, बड़े विधायी बदलाव करने और दूसरे कार्यकाल के राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की योजना बनाई थी, उसे मार्च तक पूरी तरह अलग संकट के सामने खड़ा होना पड़ा। आर्थिक सुधार, नागरिकता, कश्मीर और अयोध्या की बहस के ऊपर अब सार्वजनिक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को एक साथ बचाने का प्रश्न आ गया। वर्ष के शुरुआती महीनों में सरकार आर्थिक सुस्ती से जूझ रही थी। 2019–20 की वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान पांच प्रतिशत रहा। फिर कोरोना और लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था के सामने एक अभूतपूर्व झटका खड़ा कर दिया। इस संकट का शुरुआती उत्तर बाद के महीनों में सामने आया। मई 2020 में सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के आत्मनिर्भर भारत पैकेज की घोषणा की, जिसमें गरीब परिवारों, किसानों, छोटे कारोबारों, श्रमिकों और स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए राहत तथा ऋण और सुधार संबंधी उपाय शामिल थे। इस तरह 19वां वर्ष जिस जगह से शुरू हुआ था, वहां से बहुत दूर पहुंच चुका था। मई 2019 में यह एक मजबूत राजनीतिक बहुमत की कहानी थी। जुलाई में आर्थिक पुनर्गठन की। अगस्त में जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक व्यवस्था के परिवर्तन की। दिसंबर में नागरिकता और अयोध्या की। और मार्च 2020 तक यह सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल और आर्थिक अस्तित्व की कहानी बन चुकी थी। इसीलिए 2019–20 को केवल अनुच्छेद 370, सीएए और अयोध्या के तीन बड़े फैसलों में समेटना इस वर्ष के साथ न्याय नहीं होगा।
यह वह वर्ष था जिसमें नरेन्द्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की पूरी रूपरेखा एक साथ दिखाई दी। एक ओर आर्थिक सुधार और निवेश की चिंता थी। दूसरी ओर प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के जरिए किसान और गरीब परिवार तक पहुंचने वाला कल्याणकारी राज्य। एक ओर संविधान और राष्ट्रीय एकीकरण से जुड़े लंबे समय से लंबित प्रश्न थे। दूसरी ओर नागरिकता और धर्मनिरपेक्षता पर उठती नई बहस। और अंत में एक ऐसी महामारी, जिसने इन सबके ऊपर तत्काल जीवन और अर्थव्यवस्था बचाने की चुनौती रख दी। 2019–20 का महत्व इसी व्यापकता में है। यह केवल बड़े फैसलों का वर्ष नहीं था। यह दूसरे कार्यकाल की दिशा तय होने और उसी दिशा को एक अप्रत्याशित वैश्विक संकट द्वारा अचानक परख दिए जाने का वर्ष था। नरेन्द्र मोदी के शासन की कहानी में यह वह मोड़ था जहां पहले कार्यकाल की प्रशासनिक और आर्थिक नींव के ऊपर दूसरे कार्यकाल का वैचारिक और संवैधानिक एजेंडा तेजी से खड़ा हुआ। लेकिन जैसे ही वह इमारत आकार लेने लगी, दुनिया में एक ऐसा संकट आ गया जिसने सरकार की प्राथमिकताओं की पूरी सूची बदल दी। 19वें वर्ष की यही सबसे बड़ी विडंबना थी। साल की शुरुआत भारत को बदलने के संकल्प से हुई थी, और उसका अंत दुनिया से आए एक वायरस के सामने भारत को बचाने की चिंता में।




