20वां वर्ष: 2020-21 बंद देश से टीके तक, कोरोना के साये में शासन की अग्निपरीक्षा

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प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस

24 मार्च 2020 की रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को संबोधित किया और अगले दिन से पूरे भारत में लॉकडाउन लागू करने की घोषणा कर दी। रेलें रुक गईं, हवाई सेवाएं बंद हो गईं, बाजारों के शटर गिर गए और करोड़ों लोग अपने घरों में सिमट गए। सरकार के सामने तत्काल लक्ष्य संक्रमण की रफ्तार को रोकना और स्वास्थ्य व्यवस्था को तैयारी का समय देना था। केंद्र सरकार के आदेश के अनुसार 25 मार्च से देशव्यापी लॉकडाउन लागू हुआ। भारत ने इससे पहले ऐसी स्थिति नहीं देखी थी। यह केवल स्वास्थ्य संकट नहीं था। कुछ ही दिनों में यह रोजगार, भोजन, आवागमन, शिक्षा, कारोबार और प्रशासन, सभी का संकट बन गया। नरेन्द्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला वर्ष विकास और सुधार के एजेंडे के साथ आगे बढ़ रहा था, लेकिन मार्च आते आते शासन की प्राथमिकताओं की पूरी सूची बदल चुकी थी। कोरोना ने सबसे पहले भारत के शहरों की उस अर्थव्यवस्था को झटका दिया, जो करोड़ों असंगठित श्रमिकों के श्रम पर चलती थी। निर्माण स्थल बंद हुए तो मजदूरों की दिहाड़ी गई। होटल और रेस्तरां बंद हुए तो काम गया। कारखाने रुके तो ठेका श्रमिकों के सामने संकट खड़ा हुआ। परिवहन बंद हुआ तो रोज कमाकर रोज खाने वाले लोगों की आय रुक गई। सबसे बड़ी परेशानी उन प्रवासी श्रमिकों के सामने थी जिनका रोजगार शहर में था, लेकिन परिवार और घर गांव में। कुछ ही समय में शहरों से गांवों की ओर लौटते श्रमिक कोरोना काल की सबसे बड़ी मानवीय तस्वीर बन गए। बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और राजमार्गों पर जमा भीड़ ने बता दिया कि अर्थव्यवस्था का वह हिस्सा, जिसे सामान्य समय में आंकड़ों के पीछे देखना मुश्किल होता है, संकट के समय कितना बड़ा है।

सरकार के लिए पहली चुनौती संक्रमण रोकने के साथ यह सुनिश्चित करना था कि लॉकडाउन भूख में न बदल जाए। 26 मार्च को 1.70 लाख करोड़ रुपये के प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज की घोषणा की गई। इसमें गरीब परिवारों, महिलाओं, किसानों, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए आर्थिक सहायता के साथ मुफ्त खाद्यान्न की व्यवस्था की गई। केंद्र ने राज्यों को भी राहत और प्रवासी श्रमिकों के लिए अस्थायी आवास तथा भोजन की व्यवस्था करने के लिए आपदा राहत कोष के इस्तेमाल की अनुमति दी। इस दौर में पिछले वर्षों में तैयार किया गया डिजिटल और वित्तीय ढांचा पहली बार इतनी बड़ी परीक्षा में उतरा। बैंक खाते, आधार आधारित पहचान और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की व्यवस्थाएं अब कागजी योजनाओं से निकलकर संकट के समय सहायता पहुंचाने के औजार बन रही थीं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की किस्तों से लेकर जनधन खातों में सहायता तक, सरकार के सामने यह साबित करने की चुनौती थी कि लाभार्थी तक पैसा और अनाज वास्तव में पहुंचे। फिर भी प्रवासी संकट ने एक दूसरी सच्चाई सामने रखी। सरकारी योजनाओं की पहुंच और नागरिक की वास्तविक जरूरत के बीच दूरी केवल डिजिटल व्यवस्था से खत्म नहीं होती। जिस श्रमिक के पास शहर में काम नहीं था, उसके लिए खाते में आने वाली छोटी सहायता पर्याप्त नहीं थी। उसे घर जाना था, रास्ते में भोजन चाहिए था और गांव पहुंचने के बाद रोजगार चाहिए था। इसीलिए मई और जून तक आते आते राहत का फोकस केवल तत्काल सहायता से आगे बढ़कर रोजगार पर गया। 20 जून 2020 को गरीब कल्याण रोजगार अभियान शुरू किया गया। छह राज्यों के 116 जिलों में 125 दिनों का यह अभियान उन जिलों पर केंद्रित था जहां बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक लौटे थे। इसके लिए 50 हजार करोड़ रुपये के संसाधन निर्धारित किए गए। उद्देश्य स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के साथ गांवों में स्थायी परिसंपत्तियां तैयार करना था। कोरोना ने इस तरह सरकार के सामने एक साथ दो प्रश्न रख दिए थे। लोगों को आज बचाना था और उनकी आजीविका को कल के लिए बचाना था। इसी बीच अर्थव्यवस्था को लगा झटका आंकड़ों में दिखाई देने लगा। वित्त वर्ष 2020 21 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी में 23.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। पूरे वित्त वर्ष में वास्तविक जीडीपी 7.3 प्रतिशत सिकुड़ी। यह स्वतंत्र भारत की अर्थव्यवस्था के लिए असाधारण गिरावट थी। कारखाने बंद थे, बाजार बंद थे और उपभोक्ता खर्च रुक गया था। लेकिन इसी संकट ने आर्थिक नीति के सामने एक बड़ा प्रश्न भी रखा। कोरोना के बाद की दुनिया में भारत किस तरह की अर्थव्यवस्था बनना चाहता है।

12 मई 2020 को नरेन्द्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत अभियान की घोषणा की। 20 लाख करोड़ रुपये के व्यापक पैकेज के साथ अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचा, व्यवस्था, जीवंत जनसांख्यिकी और मांग को इसके पांच आधार बताया गया। इस घोषणा का अर्थ केवल तत्काल राहत नहीं था। कोरोना के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हुई थीं। दवाओं से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक सामान तक कई क्षेत्रों में दूसरे देशों पर निर्भरता का प्रश्न सामने आया। भारत के लिए चुनौती यह थी कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग हुए बिना अपनी उत्पादन क्षमता को कैसे मजबूत करे। इसी सोच के तहत उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना का विस्तार हुआ। मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा, दूरसंचार, ऑटोमोबाइल, विशेष इस्पात, सौर उपकरण और बैटरी जैसे क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन का ढांचा तैयार किया गया। 2020 में 13 क्षेत्रों के लिए लगभग 1.97 लाख करोड़ रुपये के प्रोत्साहन का प्रावधान किया गया। इस नीति का उद्देश्य भारत में उत्पादन बढ़ाना, निवेश आकर्षित करना और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में देश की भूमिका मजबूत करना था। लेकिन कोरोना काल की कहानी केवल अर्थव्यवस्था की नहीं थी। देश बंद था, स्कूल बंद थे और करोड़ों बच्चों की पढ़ाई रुक गई थी। इसी असाधारण परिस्थिति में 29 जुलाई 2020 को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को मंजूरी दी गई। यह 1986 की शिक्षा नीति के 34 वर्ष बाद आई। इसमें 5+3+3+4 की नई शैक्षिक संरचना, बुनियादी साक्षरता और संख्याज्ञान, व्यावसायिक शिक्षा, भारतीय भाषाओं और बहुविषयक उच्च शिक्षा को महत्व दिया गया। यह उस वर्ष की एक दिलचस्प प्रशासनिक तस्वीर थी। देश तत्काल कोरोना से जूझ रहा था, लेकिन सरकार की नजर केवल अगले कुछ महीनों पर नहीं थी। शिक्षा नीति जैसी दीर्घकालिक व्यवस्था पर भी निर्णय लिया जा रहा था। महामारी ने शिक्षा को रोक दिया था, लेकिन शिक्षा सुधार का एजेंडा नहीं रुका। इसी वर्ष कृषि क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव लाने की कोशिश हुई। जून में तीन अध्यादेश लाए गए और सितंबर में संसद ने तीन कृषि कानून पारित किए। सरकार ने इन्हें कृषि विपणन में विकल्प बढ़ाने, निजी निवेश आकर्षित करने और किसानों को अपनी उपज के लिए व्यापक बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में सुधार बताया।

लेकिन कानूनों के साथ किसानों की आशंकाएं भी बढ़ती गईं। पंजाब, हरियाणा और दूसरे राज्यों के किसान संगठनों ने मंडी व्यवस्था, न्यूनतम समर्थन मूल्य और निजी क्षेत्र की भूमिका को लेकर विरोध शुरू किया। वर्ष के अंत तक यह विरोध दिल्ली की सीमाओं पर बड़े किसान आंदोलन में बदल चुका था। इस घटनाक्रम ने कोरोना काल के शासन की एक दूसरी चुनौती सामने रखी। संकट के बीच सरकार निर्णय जल्दी लेना चाहती थी, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में बड़े सुधारों की सफलता केवल निर्णय की गति से तय नहीं होती। उनसे प्रभावित लोगों का विश्वास और संवाद भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। इसी दौरान देश की सुरक्षा के मोर्चे पर भी गंभीर घटनाक्रम हुआ। 15 जून 2020 को गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें 20 भारतीय सैनिकों की जान गई। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव बढ़ा और सरकार के सामने महामारी के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती भी खड़ी हो गई। इस तरह 2020 धीरे धीरे एक ऐसे वर्ष में बदल रहा था जिसमें सरकार के सामने किसी एक मंत्रालय या किसी एक क्षेत्र की समस्या नहीं थी। स्वास्थ्य संकट के साथ आर्थिक संकट था। आर्थिक संकट के साथ रोजगार का संकट था। रोजगार संकट के साथ प्रवासी संकट था। सीमा पर तनाव था और भीतर कृषि सुधारों को लेकर असहमति बढ़ रही थी।

फिर गर्मियों के बाद देश ने धीरे धीरे अनलॉक की ओर कदम बढ़ाया। आर्थिक गतिविधियां वापस आने लगीं। बाजार खुले। उद्योगों ने काम शुरू किया। आवाजाही धीरे धीरे बहाल हुई। संक्रमण की पहली लहर की तीव्रता कम हुई तो देश में यह उम्मीद बनने लगी कि शायद सबसे कठिन दौर पीछे छूट गया है। लेकिन कोरोना का अंतिम अध्याय अभी बाकी था। जनवरी 2021 में भारत ने उस हथियार का इस्तेमाल शुरू किया जिसका इंतजार पूरी दुनिया कर रही थी। 16 जनवरी को देशव्यापी कोरोना टीकाकरण अभियान शुरू हुआ। पहले स्वास्थ्यकर्मियों और अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को टीका लगाया गया। कोविशील्ड और कोवैक्सीन के साथ कोविन डिजिटल मंच को टीके के पंजीकरण, उपलब्धता और लाभार्थियों के रिकॉर्ड से जोड़ा गया। शुरुआत में देशभर के 3006 टीकाकरण केंद्रों को अभियान से जोड़ा गया था। टीका केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं था। भारत जैसे विशाल देश में टीके को करोड़ों लोगों तक पहुंचाना अपने आप में प्रशासनिक अभियान था। उत्पादन से लेकर भंडारण, परिवहन, प्राथमिकता तय करने, पंजीकरण और दूसरी खुराक तक पूरी व्यवस्था को एक साथ चलाना था। लेकिन मार्च और अप्रैल 2021 ने फिर तस्वीर बदल दी। दूसरी लहर ने संक्रमण को ऐसी गति दी जिसकी तीव्रता ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर अभूतपूर्व दबाव डाला। अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ने लगे। ऑक्सीजन की मांग अचानक बढ़ गई। दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की आपूर्ति पर दबाव आया। देश ने कोरोना का सबसे भयावह दौर देखा। पहली लहर में सरकार ने देश को बंद करके संक्रमण की रफ्तार रोकने की कोशिश की थी। दूसरी लहर में वही रणनीति दोहराना संभव नहीं था। देश की अर्थव्यवस्था खुल चुकी थी और समाज भी लंबे समय तक बंद रहने की कीमत चुका चुका था। इसलिए चुनौती अब संक्रमण रोकने के साथ स्वास्थ्य व्यवस्था को तत्काल विस्तार देने की थी। ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाने, अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने, राज्यों को चिकित्सा सहायता देने और टीकाकरण की गति बढ़ाने के प्रयास तेज किए गए। जून 2021 में टीकाकरण नीति में बड़ा बदलाव करते हुए केंद्र ने 18 वर्ष से अधिक आयु की आबादी के लिए राज्यों को मुफ्त टीका उपलब्ध कराने की व्यवस्था को केंद्रीय रूप से संभालने की घोषणा की। बाद के महीनों में टीकाकरण का विस्तार तेजी से हुआ। यहीं 20वें वर्ष की कहानी अपने सबसे महत्वपूर्ण बिंदु पर पहुंचती है। मार्च 2020 में सरकार का सबसे बड़ा हथियार था लोगों की आवाजाही रोकना। मार्च 2021 में सबसे बड़ा हथियार था टीकाकरण। इन दोनों के बीच एक पूरा साल था जिसमें शासन ने राहत बांटी, प्रवासी श्रमिकों को संभाला, गांवों में रोजगार पैदा करने की कोशिश की, अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, आत्मनिर्भरता का नया आर्थिक ढांचा रखा, शिक्षा की दिशा बदली, कृषि सुधारों को आगे बढ़ाया और सीमा पर पैदा हुए संकट का सामना किया। कोरोना ने इस पूरे दौर में सरकार की क्षमता को भी परखा और उसकी सीमाओं को भी सामने रखा।

लॉकडाउन ने संक्रमण को रोकने के लिए समय उपलब्ध कराया, लेकिन प्रवासी संकट ने दिखाया कि करोड़ों असंगठित कामगारों तक सुरक्षा की व्यवस्था अभी भी कितनी कठिन है। खाद्यान्न और नकद सहायता ने तत्काल राहत दी, लेकिन रोजगार की जरूरत ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाला। आत्मनिर्भर भारत ने उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला को नई दिशा देने की कोशिश की, लेकिन उसके परिणाम तत्काल नहीं आने थे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने दीर्घकालिक सुधार का रास्ता खोला, लेकिन उसी समय करोड़ों बच्चों की शिक्षा डिजिटल असमानता से जूझ रही थी। कृषि कानूनों ने संरचनात्मक बदलाव का प्रयास किया, लेकिन किसानों का विरोध इस बात का प्रमाण बना कि नीति का आर्थिक तर्क और सामाजिक स्वीकार्यता दो अलग कसौटियां हो सकती हैं और अंततः टीकाकरण ने यह दिखाया कि महामारी से बाहर निकलने के लिए केवल प्रशासनिक आदेश पर्याप्त नहीं हैं। विज्ञान, उद्योग, डिजिटल व्यवस्था, स्वास्थ्य तंत्र और नागरिक भागीदारी, सभी को एक साथ काम करना पड़ता है। नरेन्द्र मोदी के शासन के बीसवें वर्ष को इसलिए केवल कोरोना के कारण आया व्यवधान कहना भी पर्याप्त नहीं होगा। यह वह वर्ष था जिसने शासन की प्राथमिकताओं को जड़ से बदल दिया। 2019 में दूसरे कार्यकाल के साथ सरकार के सामने विकास, सुधार और आर्थिक विस्तार का एजेंडा था। 2020 में अचानक जीवन बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गया। इसके बाद आजीविका बचाने की चुनौती आई। फिर अर्थव्यवस्था को वापस खड़ा करने और भविष्य की उत्पादन क्षमता मजबूत करने का प्रश्न सामने आया। 2021 की दूसरी लहर ने स्वास्थ्य सुरक्षा को फिर सबसे ऊपर ला दिया।

इस पूरे वर्ष ने भारत को एक ऐसी प्रशासनिक वास्तविकता से परिचित कराया जिसमें विकास और संकट प्रबंधन अलग अलग विषय नहीं रह जाते। भोजन की आपूर्ति भी आर्थिक नीति है। प्रवासी श्रमिकों की आवाजाही भी प्रशासनिक चुनौती है। डिजिटल भुगतान और डिजिटल पहचान भी संकट प्रबंधन का हिस्सा बन सकते हैं। अस्पतालों की क्षमता भी राष्ट्रीय अवसंरचना है। वैक्सीन उत्पादन भी आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रश्न है। यही कारण है कि 2020 21 नरेन्द्र मोदी की शासन यात्रा में एक अलग तरह का पड़ाव है। पहले के वर्षों में प्रशासन का मूल्यांकन मुख्यतः इस आधार पर किया जा सकता था कि उसने विकास को कितनी गति दी और संस्थाओं को कितना बदला। कोरोना के वर्ष में कसौटी बदल गई। अब प्रश्न था कि राज्य कितनी तेजी से असाधारण परिस्थिति में निर्णय ले सकता है, कितनी दूर तक राहत पहुंचा सकता है और संकट समाप्त होने के बाद अर्थव्यवस्था तथा समाज को फिर से खड़ा करने के लिए कितनी जल्दी दिशा बदल सकता है। 24 मार्च 2020 को बंद हुई सड़कों से लेकर 16 जनवरी 2021 को शुरू हुए टीकाकरण और अप्रैल 2021 की दूसरी लहर तक भारत ने एक पूरा चक्र देखा। भय से बंदी तक, बंदी से राहत तक, राहत से पुनर्निर्माण तक और पुनर्निर्माण से फिर स्वास्थ्य संकट तक। बीसवें वर्ष की सबसे बड़ी पहचान इसी असाधारण अनुभव में है। कोरोना ने भारत की अर्थव्यवस्था को रोका, समाज की कमजोरियों को उजागर किया और शासन को उसकी सबसे कठिन परीक्षा में उतारा। लेकिन उसी संकट ने यह भी तय कर दिया कि आने वाले वर्षों में भारत की नीतियों में स्वास्थ्य सुरक्षा, डिजिटल प्रशासन, घरेलू उत्पादन, आपूर्ति श्रृंखला, सामाजिक सुरक्षा और संकट से निपटने की क्षमता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहने वाली है।

2020-21 इसलिए केवल महामारी का वर्ष नहीं था। यह वह वर्ष था जिसमें नरेन्द्र मोदी सरकार को पहली बार विकास के सामान्य एजेंडे से बाहर निकलकर एक ऐसे संकट का सामना करना पड़ा, जिसका कोई तैयार खाका नहीं था। बंद देश से टीके तक की यह यात्रा केवल कोरोना की कहानी नहीं थी। यह भारतीय शासन के लिए एक ऐसी अग्निपरीक्षा थी जिसने आने वाले वर्षों की प्राथमिकताओं को भी बदल दिया।

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