भारत की बढ़ती ताकत के बीच जयशंकर का बड़ा बयान, मिडिल पावर देशों पर कही अहम बात

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विदेश मंत्री एस. जयशंकर की ‘मिडिल पावर’ यानी मध्यम शक्ति वाले देशों को लेकर की गई टिप्पणी ने बदलती वैश्विक राजनीति में भारत की भूमिका पर चर्चा तेज कर दी है। जयशंकर ने संकेत दिया कि किसी देश की ताकत केवल उसकी आबादी, क्षेत्रफल या अर्थव्यवस्था के आकार से तय नहीं होती। किसी विशेष क्षेत्र में तकनीकी क्षमता, रणनीतिक स्थिति, संसाधनों पर पकड़, आर्थिक प्रभाव और कूटनीतिक पहुंच भी किसी देश को प्रभावशाली बना सकती है। इसी संदर्भ में उन्होंने अमेरिका और चीन को सामान्य मध्यम शक्तियों की श्रेणी से अलग रखा, क्योंकि दोनों देशों का वैश्विक आर्थिक, सैन्य, तकनीकी और रणनीतिक प्रभाव कहीं व्यापक है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘मिडिल पावर’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे देशों के लिए किया जाता है जिनके पास पर्याप्त आर्थिक, सैन्य, तकनीकी या कूटनीतिक क्षमता होती है, लेकिन उनका प्रभाव अमेरिका या चीन जैसी वैश्विक महाशक्तियों के स्तर तक नहीं पहुंचता। हालांकि इस श्रेणी की कोई एक निश्चित अंतरराष्ट्रीय परिभाषा नहीं है। किसी देश की शक्ति को समझते समय यह भी देखा जाता है कि वह वैश्विक व्यवस्था में किस क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाता है। उदाहरण के तौर पर कोई देश छोटा होने के बावजूद ऊर्जा, तकनीक, वित्त, व्यापार, रक्षा या लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में इतना महत्वपूर्ण हो सकता है कि बड़ी शक्तियां भी उसके साथ संबंध बनाए रखने को प्राथमिकता दें।

जयशंकर की बात को समझने के लिए नीदरलैंड और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों का उदाहरण महत्वपूर्ण है। नीदरलैंड आकार और आबादी के लिहाज से बहुत बड़ा देश नहीं है, लेकिन सेमीकंडक्टर निर्माण से जुड़ी अत्याधुनिक तकनीक में उसकी कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी तरह संयुक्त अरब अमीरात क्षेत्रफल और जनसंख्या के लिहाज से सीमित है, लेकिन ऊर्जा, व्यापार, वित्त, लॉजिस्टिक्स और पश्चिम एशिया की रणनीतिक राजनीति में उसका प्रभाव काफी बड़ा है। इससे स्पष्ट होता है कि आधुनिक दुनिया में राष्ट्रीय शक्ति केवल क्षेत्रफल या जनसंख्या से नहीं, बल्कि उस देश की विशेष क्षमताओं और वैश्विक उपयोगिता से भी निर्धारित होती है।

अमेरिका और चीन को मध्यम शक्तियों से अलग रखने की वजह भी इसी व्यापक प्रभाव से जुड़ी है। अमेरिका के पास विशाल अर्थव्यवस्था, अत्यधिक शक्तिशाली सैन्य क्षमता, वैश्विक वित्तीय प्रभाव, अत्याधुनिक तकनीक और दुनिया के कई हिस्सों में रणनीतिक साझेदारियों का व्यापक नेटवर्क है। चीन भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और वैश्विक विनिर्माण, व्यापार तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही चीन की सैन्य और तकनीकी क्षमता तथा एशिया सहित कई क्षेत्रों में उसका बढ़ता प्रभाव उसे सामान्य मध्यम शक्ति की श्रेणी से अलग करता है।

हालांकि ‘मिडिल पावर’ की अवधारणा पूरी तरह स्थिर नहीं है। किसी देश को किस श्रेणी में रखा जाए, यह इस बात पर निर्भर कर सकता है कि वैश्विक शक्ति का आकलन किस आधार पर किया जा रहा है। कुछ देशों की सैन्य शक्ति सीमित हो सकती है, लेकिन वे ऊर्जा या तकनीक के कारण अत्यधिक प्रभावशाली हो सकते हैं। इसी तरह कोई देश आर्थिक रूप से बड़ा हो सकता है, लेकिन वैश्विक सैन्य या कूटनीतिक प्रभाव के मामले में उसकी भूमिका अलग हो सकती है। इसलिए आज के दौर में राष्ट्रीय शक्ति को कई अलग-अलग आयामों के आधार पर देखना जरूरी हो गया है।

भारत के लिए जयशंकर की टिप्पणी विशेष महत्व रखती है। भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसके पास विशाल घरेलू बाजार, बड़ी आबादी, परमाणु क्षमता, मजबूत सैन्य ढांचा, तेजी से बढ़ती तकनीकी क्षमता और हिंद महासागर क्षेत्र में महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति है। इसके अलावा भारत ग्लोबल साउथ की आवाज उठाने और विकासशील देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने की कोशिश भी करता रहा है। यही वजह है कि भारत की विदेश नीति को केवल किसी एक शक्ति के साथ गठबंधन के नजरिए से देखना उसके व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण को पूरी तरह नहीं समझाता।

वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती और अवसर दोनों है। भारत एक ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रक्षा, तकनीक, व्यापार और रणनीतिक सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस, पश्चिम एशिया, यूरोप और एशिया के अन्य देशों के साथ भी अपने संबंध बनाए हुए है। इसका उद्देश्य किसी एक खेमे पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग देशों के साथ सहयोग करना है।

जयशंकर की ‘डि-रिस्किंग’ और संबंधों में विविधता की सोच इसी रणनीति से जुड़ी दिखाई देती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत किसी एक देश से संबंध खत्म करना चाहता है। बल्कि इसका उद्देश्य यह है कि रक्षा, ऊर्जा, तकनीक, महत्वपूर्ण खनिज, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत के पास पर्याप्त विकल्प मौजूद रहें। अगर वैश्विक परिस्थितियां बदलती हैं, तो किसी एक देश या एक आपूर्ति स्रोत पर निर्भरता भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को प्रभावित न करे।

दुनिया में बढ़ती अनिश्चितता के बीच मध्यम शक्तियों का महत्व भी बढ़ रहा है। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा के बीच कई देश अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने के लिए अलग-अलग देशों के साथ मुद्दा-आधारित साझेदारी कर रहे हैं। तकनीक, ऊर्जा, रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज और आपूर्ति श्रृंखला जैसे क्षेत्रों में छोटे और मध्यम आकार के देशों की भूमिका भी बढ़ रही है। ऐसे में भविष्य की वैश्विक व्यवस्था केवल दो बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि कई क्षेत्रीय और मध्यम शक्तियां भी फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं।

भारत के लिए इसका सबसे बड़ा संकेत यह है कि नई दिल्ली खुद को केवल अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाने वाले देश के रूप में सीमित नहीं करना चाहती। भारत की विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता, बहु-साझेदारी और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की नीति दिखाई देती है। आने वाले वर्षों में रक्षा, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऊर्जा, अंतरिक्ष, महत्वपूर्ण खनिज और आपूर्ति श्रृंखला जैसे क्षेत्रों में भारत की क्षमता जितनी बढ़ेगी, वैश्विक निर्णयों को प्रभावित करने की उसकी क्षमता भी उतनी ही मजबूत होगी।

इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए जयशंकर की टिप्पणी को भारत की बदलती वैश्विक भूमिका के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। ‘मिडिल पावर’ की श्रेणी में आने वाले देशों की भूमिका निश्चित रूप से बढ़ रही है, लेकिन भारत खुद को केवल इस श्रेणी तक सीमित नहीं रखना चाहता। उसकी कोशिश एक ऐसी स्वतंत्र और प्रभावशाली शक्ति के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने की है, जो अमेरिका और चीन के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा के बावजूद अपने फैसले स्वतंत्र रूप से ले सके और वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने में सक्षम हो।

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