प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
2023 की शुरुआत भारत ने ऐसी अर्थव्यवस्था के साथ की जो महामारी के झटके से काफी हद तक निकल चुकी थी और ऐसी दुनिया के बीच की जिसमें युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ था। रूस और यूक्रेन का युद्ध जारी था, महंगाई वैश्विक चिंता बनी हुई थी और पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में मंदी की आशंकाएं थीं। भारत के सामने चुनौती अब अर्थव्यवस्था को केवल संकट से निकालने की नहीं थी। उसे तेज विकास के साथ ऐसी उत्पादन क्षमता भी बनानी थी जो बदलती वैश्विक व्यवस्था में देश को अधिक सक्षम बनाए। फरवरी में पेश बजट ने इसी दिशा को आगे बढ़ाया। पूंजीगत व्यय को 37.4 प्रतिशत बढ़ाकर 10 लाख करोड़ रुपये किया गया। रेलवे के लिए 2.40 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान हुआ। राज्यों के पूंजीगत निवेश के लिए भी केंद्र की सहायता बढ़ाई गई। सरकार का आर्थिक तर्क साफ था कि बुनियादी ढांचे पर सार्वजनिक निवेश निजी निवेश, रोजगार और मांग को आगे खींच सकता है।
यह उस आर्थिक दृष्टिकोण का विस्तार था जिसकी शुरुआत पिछले कुछ वर्षों में हो चुकी थी। फर्क यह था कि 2023 तक उसका पैमाना बड़ा हो गया था। सड़क, रेल, बंदरगाह और हवाई अड्डे अब केवल संपर्क की परियोजनाएं नहीं थे। उन्हें विनिर्माण और निवेश की प्रतिस्पर्धा से जोड़ा जा रहा था। पीएम गति शक्ति और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति की पृष्ठभूमि में बुनियादी ढांचे को एक जुड़े हुए आर्थिक तंत्र की तरह देखने की कोशिश हो रही थी। इसी के साथ विकास की एक नई भाषा भी सामने आई। जनवरी में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को मंजूरी मिली। 19,744 करोड़ रुपये के शुरुआती प्रावधान के साथ इसका लक्ष्य 2030 तक सालाना 50 लाख टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन की क्षमता विकसित करना रखा गया। यह उस समय की दुनिया में एक दूर की तैयारी थी। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर था और 2022 के युद्ध ने इस निर्भरता का जोखिम दिखा दिया था। हरित हाइड्रोजन इसलिए केवल पर्यावरण की नीति नहीं थी। उसके पीछे ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और भविष्य के निर्यात बाजार में जगह बनाने की महत्वाकांक्षा भी थी। इसी अवधि में डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार भी अपनी अलग कहानी लिख रहा था। यूपीआई अब किसी सरकारी डिजिटल परियोजना का नाम भर नहीं था। वह बाजार के व्यवहार का हिस्सा बन चुका था। वित्त वर्ष 2022 23 में यूपीआई के जरिए 8375 करोड़ लेनदेन हुए और उनका मूल्य 139 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा। दिसंबर 2023 तक चालू वित्त वर्ष में 8572 करोड़ से अधिक यूपीआई लेनदेन दर्ज हो चुके थे। इस बदलाव का महत्व आंकड़े से अधिक उसके स्वभाव में था। भारत में डिजिटल भुगतान बैंक और ग्राहक के बीच की सुविधा से आगे बढ़कर सड़क किनारे की दुकान, रेहड़ी, टैक्सी, छोटे व्यापारी और सामान्य उपभोक्ता की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुका था। यह वह जगह थी जहां शासन की डिजिटल महत्वाकांक्षा नागरिक के दैनिक व्यवहार में दिखाई देने लगी थी लेकिन 2023 केवल आर्थिक पुनर्रचना का वर्ष नहीं था। इसके भीतर भारत के लोकतांत्रिक और सामाजिक जीवन की कई बेचैनियां भी मौजूद थीं। मई में मणिपुर में हिंसा शुरू हुई और लंबे समय तक बनी रही। केंद्र सरकार ने सर्वदलीय और प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप किए, केंद्रीय गृह मंत्री ने राज्य का दौरा किया और जून में हिंसा के कारणों तथा प्रशासनिक चूकों की जांच के लिए न्यायमूर्ति अजय लांबा की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया गया। यह प्रसंग 2023 की उस दूसरी तस्वीर को सामने रखता है जिसे किसी भी राष्ट्रीय उपलब्धि के पीछे छिपाया नहीं जा सकता। भारत की आर्थिक और तकनीकी क्षमता बढ़ रही थी, लेकिन सामाजिक शांति और संघीय शासन की चुनौतियां अपनी जगह बनी हुई थीं। एक बड़े देश की शासन क्षमता का अर्थ केवल बड़े प्रोजेक्ट पूरे करना नहीं होता। उसमें उन इलाकों में विश्वास और स्थिरता कायम रखना भी शामिल है जहां समाज के भीतर तनाव गहरा हो जाए। इसी वर्ष विपक्षी दलों ने भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन यानी इंडिया का गठन किया। 2024 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक जमीन तैयार होने लगी थी। सत्ता पक्ष ने अपने विकास और कल्याण के रिकॉर्ड को चुनावी विमर्श का आधार बनाया तो विपक्ष ने सरकार के खिलाफ व्यापक राजनीतिक एकजुटता बनाने की कोशिश की। 2023 का उत्तरार्ध इस अर्थ में अगले आम चुनाव की भूमिका लिख रहा था। लेकिन राजनीति से बाहर भारत की एक दूसरी यात्रा कहीं अधिक ऊंचाई पर जा रही थी 14 जुलाई 2023 को श्रीहरिकोटा से चंद्रयान 3 रवाना हुआ। अगले चालीस दिनों में उसकी यात्रा पृथ्वी की कक्षा से चंद्रमा की कक्षा और फिर चंद्र सतह तक पहुंची। 23 अगस्त को विक्रम लैंडर ने चंद्रमा पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग की और प्रज्ञान रोवर सतह पर उतर गया। भारत चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश बना और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट उतरने वाला पहला देश। चंद्रयान 3 की सफलता का अर्थ केवल यह नहीं था कि भारत चांद पर पहुंच गया। उसका बड़ा अर्थ यह था कि भारत ने अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक ऐसी तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया जिसे वर्षों के वैज्ञानिक संस्थागत निर्माण ने संभव बनाया था। इस सफलता का श्रेय किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक कार्यकाल को देना वैज्ञानिक संस्थानों के लंबे इतिहास को छोटा करना होगा। लेकिन यह भी तथ्य है कि उस समय की सरकार ने अंतरिक्ष कार्यक्रम को सार्वजनिक राष्ट्रीय आकांक्षा के एक बड़े प्रतीक के रूप में सामने रखा।
चंद्रमा पर उतरने की शाम देश में जिस तरह विज्ञान एक सार्वजनिक उत्सव में बदल गया, वह अपने आप में महत्वपूर्ण था। बच्चों से लेकर विश्वविद्यालयों तक इस मिशन को लेकर उत्साह था। विज्ञान पहली बार इतने बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय गौरव की रोजमर्रा की भाषा में दिखाई दे रहा था और चंद्रयान के कुछ ही दिनों बाद भारत ने सूर्य की ओर अपनी अगली यात्रा शुरू कर दी। दो सितंबर को आदित्य एल1 का प्रक्षेपण हुआ। यह सूर्य के अध्ययन के लिए भारत का पहला अंतरिक्ष आधारित मिशन था। इसे सूर्य पृथ्वी प्रणाली के एल1 बिंदु के आसपास की कक्षा में स्थापित करने की योजना थी, जहां से सूर्य का लगातार अध्ययन किया जा सके। चंद्रमा की सतह और सूर्य के बीच यह अंतरिक्ष यात्रा भारत की वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा के विस्तार का संकेत थी। चंद्रयान ने दिखाया कि भारत जटिल लैंडिंग कर सकता है। आदित्य एल1 ने यह बताया कि अब लक्ष्य केवल किसी दूसरे खगोलीय पिंड तक पहुंचना नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में दीर्घकालिक वैज्ञानिक अवलोकन की क्षमता बनाना है। इसी बीच पृथ्वी पर भारत के लिए एक और परीक्षा चल रही थी।
सितंबर 2023 में नई दिल्ली में जी20 शिखर सम्मेलन हुआ। दुनिया रूस यूक्रेन युद्ध और उसके कारण पैदा हुए भू राजनीतिक तनाव के बीच विभाजित थी। ऐसे वातावरण में सभी सदस्यों की सहमति से नई दिल्ली घोषणापत्र जारी होना सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक था। घोषणापत्र में यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की बात रखी गई, जबकि युद्ध पर सदस्यों के अलग अलग दृष्टिकोणों के बीच सहमति की भाषा खोजी गई। भारत की अध्यक्षता में अफ्रीकी संघ को जी20 का स्थायी सदस्य बनाया गया। यह कदम वैश्विक दक्षिण की प्रतिनिधित्व संबंधी लंबे समय से चली आ रही मांग को जी20 के औपचारिक ढांचे में जगह देने वाला था।
जी20 की सफलता का मूल्यांकन केवल सम्मेलन के दो दिनों से नहीं किया जा सकता। पूरे वर्ष भारत की अध्यक्षता में विभिन्न विषयों पर बैठकें हुईं और वित्त, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्वास्थ्य, जलवायु, ऊर्जा और विकास जैसे प्रश्नों को वैश्विक एजेंडे से जोड़ने की कोशिश हुई। नई दिल्ली शिखर सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण था कि भारत पहली बार इतने बड़े पैमाने पर वैश्विक आर्थिक कूटनीति के केंद्र में था। चंद्रयान और जी20 देखने में दो बिल्कुल अलग घटनाएं थीं। एक अंतरिक्ष में था, दूसरा अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में। लेकिन दोनों के भीतर एक समानता थी। दोनों में भारत केवल भागीदार की भूमिका में नहीं था। वह अपनी क्षमता का प्रदर्शन और अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहा था। सितंबर का महीना यहीं समाप्त नहीं हुआ।
18 सितंबर को संसद का विशेष सत्र शुरू हुआ और अगले दिन नए संसद भवन में दोनों सदनों की कार्यवाही शुरू हुई। पुरानी संसद के केंद्रीय कक्ष से नए संसद भवन की ओर जाना केवल भवन बदलना नहीं था। सात दशक से अधिक पुराने संसदीय इतिहास के बाद भारतीय गणराज्य ने अपने विधायी कामकाज के लिए एक नया संस्थागत परिसर अपनाया। इसी विशेष सत्र में महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पारित हुआ। नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किया। लोकसभा में विधेयक 454 मतों से पारित हुआ और राज्यसभा में सर्वसम्मति से पारित हुआ। यहां 2023 की एक और परत दिखाई देती है। एक ओर भारत दुनिया को महिला नेतृत्व वाले विकास की भाषा में संबोधित कर रहा था, दूसरी ओर संसद के भीतर महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संवैधानिक प्रश्न फिर केंद्र में आया। यह तत्काल चुनावी परिणाम देने वाला फैसला नहीं था, क्योंकि आरक्षण के लागू होने की प्रक्रिया परिसीमन और जनगणना से जुड़ी थी। फिर भी यह भारतीय प्रतिनिधिक राजनीति के ढांचे में एक दीर्घकालिक परिवर्तन का संकेत था। उसी वर्ष संसद ने औपनिवेशिक दौर से चले आ रहे आपराधिक कानूनों के स्थान पर तीन नए कानून भी पारित किए। भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने क्रमशः भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लेने की दिशा तय की।
इन कानूनों की वास्तविक परीक्षा बाद के वर्षों में उनके क्रियान्वयन से होनी थी, लेकिन 2023 में उनका पारित होना शासन की उस व्यापक कोशिश का हिस्सा था जिसमें प्रशासनिक और कानूनी संस्थाओं को नए ढांचे में ढालने की बात की जा रही थी। दिसंबर में अनुच्छेद 370 से संबंधित सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 2019 में जम्मू कश्मीर की विशेष संवैधानिक व्यवस्था में किए गए बदलावों की वैधानिकता को बरकरार रखा और राज्य का दर्जा जल्द बहाल करने की बात कही। यह फैसला 2019 के राजनीतिक और संवैधानिक निर्णय को न्यायिक परीक्षण के एक महत्वपूर्ण चरण से आगे ले गया। इस तरह 2023 के अंत तक शासन की कई अलग धाराएं एक साथ दिखाई दे रही थीं। अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश, तकनीक में अंतरिक्ष और डिजिटल ढांचा, संसद में नए कानून और प्रतिनिधित्व का विस्तार, विदेश नीति में जी20 और घरेलू राजनीति में अगले आम चुनाव की तैयारी। लेकिन इस पूरे वर्ष का भावनात्मक केंद्र अभी बाकी था।
22 जनवरी 2024 को अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समारोह में मुख्य अनुष्ठान में शामिल हुए। यह आयोजन उस विवाद के बाद आया जिसकी संवैधानिक परिणति नवंबर 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में हुई थी। मंदिर निर्माण के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बनाया गया और इसके बाद निर्माण कार्य आगे बढ़ा। 22 जनवरी 2024 को उसी निर्माणाधीन मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई। राम मंदिर को केवल एक धार्मिक निर्माण के रूप में समझना इस घटना के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव को छोटा कर देगा। स्वतंत्र भारत की राजनीति में राम जन्मभूमि आंदोलन ने तीन दशक से अधिक समय तक एक गहरी भूमिका निभाई थी। भाजपा के राजनीतिक विस्तार, हिंदुत्व की राजनीति और भारतीय सार्वजनिक जीवन में धर्म तथा राज्य के संबंधों की बहस, इन सब पर इस आंदोलन का प्रभाव रहा। 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने विवाद को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से निर्णायक रूप से आगे बढ़ाया। 2024 की प्राण प्रतिष्ठा उस लंबे इतिहास के बाद आया सार्वजनिक क्षण था जिसमें राजनीतिक आंदोलन की मांग एक निर्मित धार्मिक परिसर के रूप में दिखाई देने लगी। इस आयोजन को लेकर राजनीतिक मतभेद भी रहे। आलोचकों ने सरकारी पद और धार्मिक आयोजन के संबंध को लेकर प्रश्न उठाए, जबकि समर्थकों ने इसे लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक आकांक्षा की पूर्ति के रूप में देखा। इसलिए 22 जनवरी को केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि या केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम कहना दोनों ही उसके व्यापक सामाजिक अर्थ को सीमित कर देंगे। अयोध्या के साथ 2024 की शुरुआत में एक और प्रतीकात्मक यात्रा चल रही थी। 6 जनवरी को आदित्य एल1 को सूर्य पृथ्वी प्रणाली के एल1 बिंदु के आसपास की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया। इस तरह 2023 में शुरू हुई अंतरिक्ष यात्रा नए वर्ष में भी भारत की वैज्ञानिक उपलब्धि की निरंतरता बनी रही और 1 फरवरी को पेश अंतरिम बजट ने पिछले दो वर्षों की आर्थिक दिशा को और स्पष्ट कर दिया। 2024 25 के लिए पूंजीगत व्यय 11.11 लाख करोड़ रुपये किया गया, जो सकल घरेलू उत्पाद का 3.4 प्रतिशत था। सरकार के अनुसार 2023 24 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान था। यहां 23वें वर्ष की आर्थिक कहानी अपने निष्कर्ष के करीब आती है। महामारी से निकलने के बाद जिस सार्वजनिक निवेश आधारित विकास मॉडल को गति दी गई थी, वह अब लगातार बड़े आकार में दिखाई दे रहा था। 2022 में 7.5 लाख करोड़ रुपये का केंद्रीय पूंजीगत व्यय, 2023 में 10 लाख करोड़ और 2024 के अंतरिम बजट में 11.11 लाख करोड़। आंकड़ों की यह श्रृंखला केवल बजट की संख्या नहीं थी। यह उस विचार का संकेत थी जिसमें बुनियादी ढांचे को विकास की स्थायी धुरी बनाने की कोशिश की जा रही थी। फिर भी 2023 और शुरुआती 2024 को केवल उपलब्धियों के चश्मे से देखना अधूरा होगा। मणिपुर की हिंसा ने सामाजिक एकता की चुनौती दिखाई। वैश्विक युद्ध और आर्थिक अनिश्चितता ने ऊर्जा और व्यापार की असुरक्षा का स्मरण कराया। नए कानूनों की घोषणा ने उनके वास्तविक क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सामने रखी। महिला आरक्षण का संवैधानिक निर्णय प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में था, लेकिन उसका वास्तविक लाभ भविष्य की परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा था। आर्थिक वृद्धि तेज थी, लेकिन रोजगार और आय की व्यापक गुणवत्ता का प्रश्न अपनी जगह बना हुआ था। यानी 23वां वर्ष केवल उपलब्धियों का वर्ष नहीं था। यह क्षमता और आकांक्षा के बीच की दूरी को पहचानने का भी वर्ष था और शायद इसी कारण इस वर्ष की तीन सबसे चर्चित तस्वीरें इतनी अलग होते हुए भी एक ही कथा कहती हैं। चंद्रयान की तस्वीर में भारत चंद्रमा की सतह पर था। जी20 की मेज पर भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच था। अयोध्या में भारत अपने इतिहास और धार्मिक स्मृति के एक अत्यंत संवेदनशील अध्याय के सामने खड़ा था। इन तीनों में विज्ञान, कूटनीति और संस्कृति की तीन अलग दुनियाएं थीं। लेकिन इनके पीछे एक समान प्रश्न था। क्या भारत अपनी बढ़ती आर्थिक और संस्थागत क्षमता को ऐसी राष्ट्रीय पहचान में बदल सकता है जिसमें आधुनिकता और परंपरा दोनों के लिए जगह हो?
2023-24 में नरेन्द्र मोदी के शासन की यही सबसे बड़ी विशेषता दिखाई देती है। शासन की भाषा केवल कल्याण और बुनियादी ढांचे की भाषा नहीं रह गई थी। उसमें तकनीकी शक्ति, वैश्विक कूटनीति, संस्थागत पुनर्गठन और सांस्कृतिक आकांक्षा एक साथ प्रवेश कर चुके थे। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया था। गुजरात के प्रशासनिक वर्षों से शुरू हुई जिस यात्रा में बिजली, पानी, निवेश, डिजिटल शासन और प्रशासनिक समीक्षा जैसे विषय केंद्र में थे, वह राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचकर कहीं अधिक व्यापक हो चुकी थी। अब सामने 140 करोड़ से अधिक लोगों वाला देश था, जिसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में थी और जिसकी महत्वाकांक्षा 2047 तक विकसित भारत बनने की थी। 2023 ने इस महत्वाकांक्षा को तीन अलग भाषाओं में व्यक्त किया। चंद्रयान ने कहा कि भारत कठिन तकनीकी काम कर सकता है। जी20 ने दिखाया कि भारत वैश्विक मतभेदों के बीच संवाद की जगह बना सकता है। अयोध्या ने बताया कि भारत की आधुनिक राजनीतिक कथा में उसकी सभ्यतागत स्मृति भी अब केंद्रीय स्थान रखती है। इनमें से किसी एक को पूरे वर्ष का अर्थ मान लेना आसान है। लेकिन 23वें वर्ष की वास्तविक कहानी इन तीनों के बीच है। क्योंकि कोई देश केवल अपनी अर्थव्यवस्था से बड़ा नहीं बनता। उसे विज्ञान में क्षमता, संस्थाओं में भरोसा, समाज में स्थिरता, कूटनीति में जगह और अपनी सांस्कृतिक स्मृति के साथ संवाद की क्षमता भी चाहिए। 2023 और शुरुआती 2024 में भारत ने इन सभी दिशाओं में एक साथ आगे बढ़ने की कोशिश की।
यात्रा अभी पूरी नहीं हुई थी। बल्कि उसकी कठिनाई अब बढ़ रही थी। अंतरिक्ष की उपलब्धि को स्थायी वैज्ञानिक क्षमता में बदलना था। जी20 की कूटनीतिक सफलता को दीर्घकालिक वैश्विक प्रभाव में बदलना था। तेज आर्थिक वृद्धि को रोजगार और व्यापक समृद्धि में बदलना था। नए कानूनों को न्याय की बेहतर व्यवस्था में बदलना था। महिला आरक्षण को वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलना था। और अयोध्या की सांस्कृतिक ऊर्जा को सामाजिक समावेशन और आधुनिक विकास के साथ किस तरह जोड़ा जाए, यह भी भविष्य का प्रश्न था। फिर भी 23वें वर्ष के अंत तक एक बात निर्विवाद रूप से बदल चुकी थी। भारत अपने बारे में जिस भाषा में बात करता था, वह बदल रही थी। पहले विकास का अर्थ था पीछे छूटे हुए को आगे लाना। अब विकास के साथ एक दूसरा विचार जुड़ गया था। दुनिया के सामने अपनी क्षमता को साबित करना।
चंद्रमा से लेकर नई दिल्ली की कूटनीतिक मेज तक और वहां से अयोध्या के मंदिर परिसर तक 2023 24 की यात्रा इसी बदलते आत्मविश्वास की यात्रा थी। यह केवल किसी एक सरकार की उपलब्धियों का लेखा जोखा नहीं, बल्कि उस समय की भारतीय राजनीति और शासन में आए उस परिवर्तन का दस्तावेज था जिसमें विकास, तकनीक, राष्ट्र की वैश्विक भूमिका और सभ्यतागत स्मृति एक ही सार्वजनिक कथा के अलग अलग हिस्से बनने लगे थे और शायद इसीलिए 23वां वर्ष अगले आम चुनाव की दहलीज पर पहुंचते पहुंचते अपने साथ केवल चुनावी प्रश्न नहीं लेकर आया था। उसके साथ एक बड़ा प्रश्न भी था। पिछले वर्षों में जिस भारत की क्षमता बनाने की कोशिश हुई, क्या वह क्षमता अब उस भारत को आकार दे पाएगी जिसकी कल्पना 2047 के लिए की जा रही थी? 2024 का चुनाव इस प्रश्न का राजनीतिक उत्तर खोजने वाला था। लेकिन मार्च 2024 तक 23वें वर्ष ने अपना एक अलग उत्तर दे दिया था। भारत अब केवल बदलती दुनिया का सामना नहीं कर रहा था। वह उस बदलती दुनिया में अपने लिए एक अधिक स्पष्ट स्थान और अपनी पहचान की एक अधिक स्पष्ट भाषा तलाश चुका था।




