RBI ने बदला मौद्रिक नीति का रुख, बढ़ाया रेपो रेट; महंगाई को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?

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नई दिल्ली, 7 अक्टूबर 2026। महंगाई के बढ़ते दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति के मोर्चे पर बड़ा कदम उठाया है। RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने फरवरी 2023 के बाद पहली बार रेपो रेट में बढ़ोतरी की है। 5 से 7 अक्टूबर 2026 के बीच हुई MPC बैठक में समिति ने रेपो रेट को 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत से 5.50 प्रतिशत कर दिया। इस फैसले को सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई। RBI का यह कदम ऐसे समय आया है, जब महंगाई के दबाव और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को लेकर केंद्रीय बैंक की चिंता बढ़ी है।

रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्प अवधि के लिए पैसा उपलब्ध कराता है। जब केंद्रीय बैंक इस दर को बढ़ाता है तो बैंकों के लिए RBI से मिलने वाला धन महंगा हो सकता है। इसका असर बैंक की लोन दरों पर पड़ सकता है और खासकर फ्लोटिंग ब्याज दर वाले होम लोन, कार लोन तथा दूसरे कर्ज महंगे हो सकते हैं। हालांकि ग्राहकों की EMI पर वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित बैंक अपनी ब्याज दरों में कितनी और कितनी जल्दी बढ़ोतरी करते हैं।

इस फैसले की सबसे अहम बात यह है कि RBI ने फरवरी 2023 के बाद पहली बार ब्याज दर बढ़ाई है। फरवरी 2023 में रेपो रेट बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत किया गया था। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने लंबे समय तक दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखा और बाद में आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार दरों में कटौती का दौर भी आया। वर्ष 2026 में अब तक हुई MPC बैठकों में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया था, लेकिन अक्टूबर की बैठक में RBI ने अपना रुख बदलते हुए महंगाई के जोखिम को प्राथमिकता दी है।

रेपो रेट बढ़ाने के साथ RBI ने मौद्रिक नीति के रुख में भी बदलाव किया है। केंद्रीय बैंक ने पहले के ‘न्यूट्रल’ रुख से आगे बढ़कर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ यानी चरणबद्ध और सोच-समझकर मौद्रिक सख्ती का संकेत दिया है। इससे बाजार को यह संदेश मिला है कि फिलहाल RBI का मुख्य फोकस महंगाई को नियंत्रित करने पर है। आने वाले समय में ब्याज दरों को लेकर होने वाले फैसले महंगाई, आर्थिक गतिविधियों और वैश्विक परिस्थितियों के आंकड़ों पर निर्भर करेंगे।

महंगाई के मोर्चे पर हाल के आंकड़ों ने RBI की चिंता बढ़ाई है। अगस्त 2026 में खुदरा महंगाई बढ़कर करीब 4.8 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई में यह लगभग 4.5 प्रतिशत थी। खाद्य और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ कोर महंगाई में भी दबाव देखने को मिला। RBI के आकलन में महंगाई का दबाव अब केवल कुछ चुनिंदा वस्तुओं तक सीमित रहने के बजाय व्यापक रूप लेता दिखाई दे रहा है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी आने वाले महीनों के लिए महत्वपूर्ण जोखिम बना हुआ है।

केंद्रीय बैंक ने मानसून और मौसम से जुड़े जोखिमों को भी महंगाई के लिए महत्वपूर्ण माना है। कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून और अल नीनो जैसी परिस्थितियां कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। यदि कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ता है तो खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी भारत के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। महंगा तेल परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ाकर अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में भी महंगाई का दबाव पैदा कर सकता है।

महंगाई को लेकर सख्त कदम उठाने के बावजूद RBI ने आर्थिक विकास को लेकर सकारात्मक तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक GDP वृद्धि का अनुमान 7.1 प्रतिशत रखा है। RBI के मुताबिक घरेलू खपत, निवेश, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की गतिविधियां भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रही हैं। पहली तिमाही में वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रहने को भी घरेलू अर्थव्यवस्था की मजबूती के संकेत के तौर पर देखा गया है।

RBI ने आने वाले महीनों में महंगाई के औसत स्तर को लेकर भी सावधानी बरती है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए CPI महंगाई का अनुमान करीब 5.2 प्रतिशत रखा गया है। इसका मतलब है कि केंद्रीय बैंक को आने वाले समय में महंगाई को अपने 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य के करीब लाने के लिए लगातार निगरानी रखनी होगी। इसी वजह से फिलहाल ब्याज दरों में तत्काल कटौती की उम्मीद कमजोर हुई है। हालांकि RBI ने आगे कितनी दर बढ़ोतरी होगी, इसकी कोई निश्चित संख्या घोषित नहीं की है।

वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां भी RBI के फैसले में अहम भूमिका निभा रही हैं। पश्चिम एशिया में तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक बॉन्ड यील्ड और दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंकों की नीतियां भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं। कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई का दबाव बने रहने के कारण वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां भी अपेक्षाकृत सख्त बनी हुई हैं। ऐसे माहौल में RBI के लिए घरेलू विकास और कीमतों की स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण हो गया है।

भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति में हालांकि कुछ सकारात्मक संकेत भी हैं। RBI के मुताबिक देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत बना हुआ है और यह करीब 11 महीने की आयात जरूरतों के बराबर है। इसके साथ ही वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती चार महीनों में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी FDI बढ़कर करीब 13.8 अरब डॉलर हो गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह लगभग 9.6 अरब डॉलर था। विदेशी निवेश और मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सहारा प्रदान कर सकते हैं।

RBI के रेपो रेट बढ़ाने का सीधा असर कर्ज लेने वाले लोगों पर पड़ सकता है। यदि बैंक इस बढ़ोतरी को ग्राहकों तक पहुंचाते हैं तो फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन, ऑटो लोन और अन्य कर्ज की ब्याज दर बढ़ सकती है। इससे कुछ ग्राहकों की EMI बढ़ सकती है, जबकि कुछ मामलों में EMI को समान रखते हुए लोन की अवधि बढ़ सकती है। दूसरी तरफ ऊंची ब्याज दरों का फायदा बैंक जमा और फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज पाने वाले ग्राहकों को मिल सकता है, हालांकि जमा दरों में बदलाव पूरी तरह बैंकों के फैसले पर निर्भर करेगा।

कुल मिलाकर अक्टूबर 2026 की MPC बैठक का संदेश स्पष्ट है कि RBI अब महंगाई के जोखिम को लेकर अधिक सतर्क हो गया है। एक ओर केंद्रीय बैंक ने 7.1 प्रतिशत GDP वृद्धि का अनुमान रखते हुए अर्थव्यवस्था की मजबूती पर भरोसा जताया है, वहीं दूसरी ओर बढ़ती महंगाई, मौसम संबंधी जोखिम, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक अस्थिरता को देखते हुए मौद्रिक नीति को सख्त किया है। फरवरी 2023 के बाद पहली रेपो रेट बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि RBI फिलहाल कीमतों की स्थिरता को लेकर किसी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं है।

अब बाजार और आम लोगों की नजर RBI की अगली MPC बैठक पर होगी। अगली बैठक 2 से 4 दिसंबर 2026 के बीच प्रस्तावित है। तब तक खुदरा महंगाई, खाद्य कीमतों, कच्चे तेल, मानसून के प्रभाव, घरेलू मांग और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के नए आंकड़े सामने आ चुके होंगे। इन्हीं संकेतकों के आधार पर यह तय होगा कि RBI मौजूदा 5.50 प्रतिशत रेपो रेट को बरकरार रखता है या महंगाई को नियंत्रित करने के लिए आगे भी सख्ती करता है।

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