प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि 21वीं सदी में डेटा, ज्ञान, तकनीक और नवाचार किसी भी देश की असली ताकत बनकर उभरे हैं। हालांकि, इन संसाधनों का महत्व केवल इन्हें हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी मायने रखता है कि इनका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है और इनके माध्यम से समाज को कितना लाभ मिल रहा है। प्रधानमंत्री ने शक्ति की पारंपरिक अवधारणा से आगे बढ़ते हुए दूसरों को सशक्त बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक दुनिया में वास्तविक प्रगति का आकलन इस बात से किया जाना चाहिए कि उपलब्ध संसाधनों और तकनीकी क्षमताओं का इस्तेमाल लोगों के जीवन को बेहतर बनाने तथा उनके लिए नए अवसर पैदा करने में किस हद तक हो रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम को संबोधित करते हुए ये विचार रखे। अपने संबोधन में उन्होंने बदलती वैश्विक परिस्थितियों, तकनीकी विकास, भारत की डिजिटल प्रगति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज की दुनिया में शक्ति का अर्थ केवल आर्थिक या सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं रह गया है। डेटा, ज्ञान, डिजिटल तकनीक और नए विचार भी देशों की विकास क्षमता तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में इन संसाधनों का उपयोग मानव कल्याण और व्यापक विकास के लिए करना महत्वपूर्ण हो गया है।
प्रधानमंत्री के संबोधन का प्रमुख विचार ‘पावर टू एम्पावर’ यानी दूसरों को सशक्त बनाने की अवधारणा रहा। इसका अर्थ है कि शक्ति का इस्तेमाल केवल अपना प्रभाव बढ़ाने या दूसरों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इससे दूसरे लोगों की क्षमताओं को विकसित करने और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देने का प्रयास होना चाहिए। प्रधानमंत्री के विचारों के अनुसार, तकनीक और ज्ञान का वास्तविक लाभ तभी सामने आता है, जब उनका इस्तेमाल समाज के अधिक से अधिक लोगों की समस्याओं को हल करने में किया जाए। इससे विकास के अवसरों का विस्तार हो सकता है और आर्थिक तथा सामाजिक प्रगति को व्यापक आधार मिल सकता है।
आज के समय में डेटा और तकनीक का महत्व तेजी से बढ़ा है। कारोबार से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और सरकारी सेवाओं तक, लगभग हर क्षेत्र में डिजिटल संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भी काम करने के तरीकों में बदलाव लाने की संभावनाएं पैदा की हैं। इन तकनीकों की मदद से सूचनाओं का विश्लेषण करना, जटिल समस्याओं का समाधान खोजना और सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाना आसान हो सकता है। हालांकि, इन संसाधनों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब तकनीक तक पहुंच व्यापक हो, लोगों के पास जरूरी डिजिटल कौशल हों और नई सुविधाओं का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ किया जाए।
प्रधानमंत्री ने भारत में डिजिटल कनेक्टिविटी के विस्तार और इसके माध्यम से पैदा हुए अवसरों की भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि पिछले वर्षों में मोबाइल इंटरनेट को अधिक सुलभ बनाने और डिजिटल सेवाओं का दायरा बढ़ाने पर जोर दिया गया है। प्रधानमंत्री के मुताबिक, वर्ष 2014 में केंद्र सरकार के गठन के बाद मोबाइल डेटा की उपलब्धता और डिजिटल सेवाओं के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया। इंटरनेट की बढ़ती पहुंच ने लोगों को सूचना हासिल करने, ऑनलाइन सेवाओं का उपयोग करने और डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़ने के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। इसका प्रभाव केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कारोबारियों के लिए भी डिजिटल माध्यमों का महत्व बढ़ा है।
डिजिटल कनेक्टिविटी के प्रभाव को समझाने के लिए छोटे कारोबारियों का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। आज एक छोटा दुकानदार डिजिटल भुगतान के माध्यम से ग्राहकों से पैसे प्राप्त कर सकता है और इंटरनेट की मदद से अपने उत्पादों तथा सेवाओं की जानकारी अधिक लोगों तक पहुंचा सकता है। इसी तरह, छोटे उद्यमी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए अपने कारोबार का विस्तार करने की संभावनाएं तलाश सकते हैं। पहले जिन बाजारों तक पहुंच बनाना छोटे व्यवसायियों के लिए मुश्किल होता था, डिजिटल तकनीक ने वहां तक पहुंचने के कुछ नए रास्ते खोले हैं। हालांकि, इन अवसरों का पूरा लाभ उठाने के लिए डिजिटल साक्षरता, सुरक्षित लेनदेन और इंटरनेट की विश्वसनीय उपलब्धता भी आवश्यक है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं और विविधता का उल्लेख करते हुए देश में विचारों के आदान-प्रदान तथा सार्वजनिक चर्चाओं के महत्व पर भी ध्यान दिलाया। भारत में अलग-अलग भाषाओं, विचारों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग रहते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने लोगों को अपनी बात रखने, सूचनाएं साझा करने और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा में हिस्सा लेने के नए अवसर दिए हैं। प्रधानमंत्री ने देश की मीडिया व्यवस्था और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भारतीयों की व्यापक भागीदारी का भी जिक्र किया। उनके संबोधन का यह पहलू इस बात को रेखांकित करता है कि तकनीक केवल आर्थिक गतिविधियों का माध्यम नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल सामाजिक संवाद और सार्वजनिक भागीदारी बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ता प्रभाव भी प्रधानमंत्री के संबोधन के महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रहा। एआई आधारित तकनीकों का उपयोग उद्योग, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, अनुसंधान और अन्य क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा है। इन तकनीकों से उत्पादकता बढ़ाने, कामकाज को अधिक प्रभावी बनाने और नई समस्याओं के समाधान खोजने की संभावनाएं हैं। दूसरी ओर, एआई के विस्तार के साथ डेटा सुरक्षा, विश्वसनीय जानकारी, रोजगार के बदलते स्वरूप और तकनीकी कौशल विकसित करने जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। ऐसे में नई तकनीकों का इस्तेमाल इस तरह करना जरूरी है, जिससे उनका लाभ अधिक लोगों तक पहुंचे और उनसे पैदा होने वाली चुनौतियों का भी जिम्मेदारी के साथ सामना किया जा सके।
प्रधानमंत्री ने दुनिया के सामने मौजूद कुछ व्यापक चुनौतियों का भी उल्लेख किया। बदलती जनसांख्यिकी, बढ़ती उम्र से संबंधित समस्याएं और विभिन्न देशों के बीच विश्वास की कमी जैसे मुद्दे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत को रेखांकित करते हैं। इन चुनौतियों का समाधान केवल तकनीकी विकास से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए नीतिगत प्रयासों, सामाजिक भागीदारी और देशों के बीच बेहतर समन्वय की भी आवश्यकता होती है। प्रधानमंत्री के संबोधन में सहयोग की भावना पर जोर इस विचार से जुड़ा रहा कि आधुनिक दुनिया में किसी देश की प्रगति और वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए साझा प्रयास महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की विभिन्न पहलों का भी उल्लेख किया। इनमें इंटरनेशनल सोलर अलायंस, बिग कैट अलायंस, बायोफ्यूल अलायंस, मिशन लाइफ और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा यानी आईएमईसी शामिल हैं। इन पहलों का संबंध नवीकरणीय ऊर्जा, जैव ईंधन, पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय संपर्क जैसे क्षेत्रों से है। इनका व्यापक उद्देश्य विभिन्न देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना और साझा चुनौतियों से निपटने के लिए नए अवसर विकसित करना है। प्रधानमंत्री के विचारों में यह संदेश भी शामिल रहा कि उपलब्ध क्षमताओं और संसाधनों का उपयोग केवल राष्ट्रीय हितों तक सीमित रखने के बजाय वैश्विक विकास में योगदान देने के लिए भी किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री ने भारत में आर्थिक सुधारों और सुशासन के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि सुधार सरकार के लिए केवल मजबूरी नहीं, बल्कि एक दृढ़ विश्वास का विषय हैं। उन्होंने वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी और दिवालियापन से संबंधित कानूनों जैसे सुधारों की चर्चा की। भारत में आर्थिक प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित बनाने, कारोबार के लिए प्रक्रियाओं को सरल करने और प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के उद्देश्य से विभिन्न कदम उठाए गए हैं। इन सुधारों का प्रभाव उनके प्रभावी क्रियान्वयन और आम नागरिकों तथा कारोबारियों तक पहुंचने वाले लाभों से जुड़ा है। डिजिटल तकनीक भी सरकारी सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार लाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन का मुख्य संदेश यह रहा कि आधुनिक दुनिया में शक्ति का वास्तविक मूल्य उसके इस्तेमाल से निर्धारित होता है। डेटा, ज्ञान, तकनीक और नवाचार किसी देश को आर्थिक तथा सामाजिक रूप से आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं, लेकिन इनका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि इनके लाभ कितने लोगों तक पहुंचते हैं। यदि इन संसाधनों का उपयोग आम नागरिकों की समस्याओं को हल करने, छोटे कारोबारियों को अवसर देने, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने तथा समाज के विभिन्न वर्गों को सशक्त करने के लिए किया जाता है, तो इनकी उपयोगिता और बढ़ जाती है।
कुल मिलाकर, ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन तकनीक और नवाचार को मानव कल्याण से जोड़ने की सोच पर केंद्रित रहा। उन्होंने यह संदेश दिया कि भविष्य की दुनिया में वही देश अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे, जो अपने ज्ञान, संसाधनों और तकनीकी क्षमताओं का इस्तेमाल व्यापक विकास के लिए करेंगे। ‘पावर टू एम्पावर’ की अवधारणा इसी विचार को सामने रखती है कि वास्तविक ताकत केवल संसाधनों पर अधिकार रखने में नहीं, बल्कि उनके माध्यम से दूसरों को आगे बढ़ने का अवसर देने में भी निहित है।




