मॉनसून की विदाई के बाद भी सूखे जलाशय, दक्षिण भारत में पेयजल और सिंचाई पर बढ़ सकता है संकट

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देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की विदाई के बाद जलाशयों में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है। इस साल सामान्य से कम बारिश होने के कारण देश के कई प्रमुख जलाशयों में पर्याप्त पानी जमा नहीं हो पाया है। दक्षिण भारत के कई हिस्सों में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक बनी हुई है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी का भंडारण पिछले साल की समान अवधि की तुलना में काफी कम है। इसका असर आने वाले महीनों में पेयजल आपूर्ति, कृषि सिंचाई और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। हालांकि, दक्षिण भारत में उत्तर-पूर्वी मॉनसून की बारिश शुरू होने से जलाशयों में पानी की उपलब्धता सुधरने की उम्मीद भी बनी हुई है।

178 प्रमुख जलाशयों में पिछले साल के मुकाबले कम पानी

केंद्रीय जल आयोग की साप्ताहिक जलाशय भंडारण रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में लगभग 126.717 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है, जबकि इनकी कुल उपयोगी भंडारण क्षमता 184.762 अरब घन मीटर है। इन जलाशयों में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले लगभग 41.193 अरब घन मीटर कम पानी दर्ज किया गया है। वहीं, पिछले दस वर्षों के औसत भंडारण की तुलना में भी पानी की उपलब्धता 16.44 प्रतिशत कम है। देश के प्रमुख जलाशय कृषि, पेयजल आपूर्ति और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इनके जलस्तर में गिरावट का असर विभिन्न राज्यों की जल प्रबंधन व्यवस्था पर पड़ सकता है। हालांकि, किसी क्षेत्र में वास्तविक जल संकट की गंभीरता वहां की आबादी की जरूरतों, भूजल की स्थिति और आगे होने वाली बारिश पर भी निर्भर करेगी।

दक्षिण भारत के नदी बेसिन में पानी की कमी बढ़ी

दक्षिण भारत के कई नदी बेसिन में इस साल कम बारिश के कारण जल भंडारण प्रभावित हुआ है। कावेरी और पेन्नार नदी बेसिन में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक बताई जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कावेरी बेसिन में सामान्य भंडारण की तुलना में पानी की उपलब्धता 60.50 प्रतिशत कम है, जबकि पेन्नार बेसिन में यह कमी 72.32 प्रतिशत तक पहुंच गई है। कृष्णा नदी बेसिन में भी सामान्य स्तर की तुलना में 32.59 प्रतिशत कम जल भंडारण दर्ज किया गया है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में जल संसाधनों पर दबाव बना हुआ है। यदि आने वाले समय में पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो स्थानीय प्रशासन को पेयजल और सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना पड़ सकता है।

कर्नाटक में कावेरी बेसिन की स्थिति चिंताजनक

कर्नाटक में कम बारिश का असर कावेरी नदी से जुड़े जलाशयों पर दिखाई दे रहा है। सितंबर के अंतिम सप्ताह में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, कृष्णराज सागर यानी केआरएस, हेमावती, कबिनी और हरंगी जलाशयों में पानी का भंडारण पिछले साल की तुलना में काफी कम था। 28 सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक, इन चार जलाशयों में कुल भंडारण लगभग 59.5 टीएमसी फीट था, जबकि पिछले साल इसी समय यह लगभग 107.4 टीएमसी फीट था। इन जलाशयों में उपयोगी जल भंडारण लगभग 36.2 टीएमसी फीट दर्ज किया गया, जबकि पिछले साल यह करीब 84.1 टीएमसी फीट था। कावेरी नदी पर निर्भर कृषि क्षेत्रों में पानी की कमी से सिंचाई प्रभावित होने की आशंका है। इसके अलावा, नदी प्रणाली पर निर्भर शहरों और कस्बों में पेयजल की उपलब्धता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण चुनौती बन सकता है।

तमिलनाडु में मेट्टूर बांध के जलस्तर पर नजर

तमिलनाडु में कावेरी नदी पर स्थित मेट्टूर बांध राज्य की कृषि व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस बांध से छोड़ा जाने वाला पानी कावेरी डेल्टा के कई कृषि क्षेत्रों में सिंचाई के लिए इस्तेमाल होता है। अक्टूबर के मध्य में बांध का जलस्तर 60 फीट से नीचे पहुंचने के बाद सिंचाई के लिए पानी छोड़ने पर रोक लगाए जाने की खबर सामने आई थी। 15 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, मेट्टूर बांध का जलस्तर लगभग 59.13 फीट था और इसमें करीब 24.04 टीएमसी फीट पानी उपलब्ध था। बांध में पानी की आवक भी घटकर लगभग 696 क्यूसेक रह गई थी। इससे कावेरी डेल्टा में सांबा धान की खेती करने वाले किसानों की चिंताएं बढ़ गई हैं। तमिलनाडु में अक्टूबर से दिसंबर के बीच होने वाली उत्तर-पूर्वी मॉनसून की बारिश जलाशयों को भरने और कृषि की जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में किसानों की नजर आगामी बारिश पर टिकी हुई है।

आंध्र प्रदेश में भी जल भंडारण को लेकर चिंता

आंध्र प्रदेश के कुछ प्रमुख जलाशयों में भी पानी की उपलब्धता सामान्य स्तर से काफी कम बताई गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सोमासिला जलाशय में पानी का स्तर सामान्य भंडारण के लगभग 22.05 प्रतिशत और श्रीशैलम में करीब 33.64 प्रतिशत था। जलाशयों में पानी की कमी का असर कृषि सिंचाई, ग्रामीण पेयजल व्यवस्था और अन्य जरूरतों पर पड़ सकता है। विशेष रूप से उन इलाकों में स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है, जहां किसान सिंचाई के लिए बांधों और नहरों पर निर्भर रहते हैं। हालांकि, जलाशयों की स्थिति का आकलन करते समय कुल क्षमता, उपयोगी भंडारण, पानी की आवक और स्थानीय मांग जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कई इलाकों में सूखे का असर

कम बारिश का असर केवल जलाशयों तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि और पेयजल की उपलब्धता को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। अक्टूबर में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कई उप-जिला क्षेत्रों में कम बारिश के कारण सूखे जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है। कर्नाटक में बारिश की कमी से फसलों को नुकसान पहुंचने और किसानों की सिंचाई संबंधी जरूरतों को पूरा करने में कठिनाई की आशंका है। आंध्र प्रदेश में भी जलाशयों और भूजल पर दबाव बढ़ने की चिंता बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुओं और बोरवेल का जलस्तर नीचे जाने से किसानों तथा घरेलू उपभोक्ताओं को पानी जुटाने में अधिक परेशानी हो सकती है। हालांकि, दोनों राज्यों में स्थिति जिले और स्थानीय जल स्रोतों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

तेलंगाना में भी कम बारिश का असर

तेलंगाना में भी इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान बारिश की कमी दर्ज की गई। अक्टूबर की शुरुआत में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में मॉनसून की कुल बारिश सामान्य से लगभग 17 प्रतिशत कम रही। राज्य के 33 जिलों में से 18 जिलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, 30 सितंबर को कृष्णा और गोदावरी नदी प्रणालियों से जुड़े जलाशयों में संयुक्त जल भंडारण लगभग 503.43 टीएमसी फीट था, जबकि पिछले साल इसी तारीख को यह करीब 834.92 टीएमसी फीट था। जल भंडारण में इस अंतर से सिंचाई और पेयजल की जरूरतों को पूरा करने की चुनौती बढ़ सकती है। तेलंगाना में कृषि के लिए सिंचाई परियोजनाओं और नदी के पानी पर निर्भरता को देखते हुए आने वाले महीनों में जल प्रबंधन की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

मॉनसून की विदाई के बाद उत्तर-पूर्वी मॉनसून से उम्मीद

इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान देश में सामान्य से कम बारिश हुई। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 30 सितंबर 2026 के बीच देश में लगभग 759 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि दीर्घकालिक औसत 868 मिलीमीटर है। इस तरह मौसमी बारिश सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम रही। जून में बारिश की कमी सबसे अधिक थी और इस महीने वर्षा दीर्घकालिक औसत से लगभग 36 प्रतिशत कम रही। जुलाई में बारिश में सुधार हुआ और वर्षा सामान्य से करीब एक प्रतिशत अधिक दर्ज की गई, लेकिन अगस्त और सितंबर में फिर कमी देखी गई।

दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की विदाई का अर्थ यह नहीं है कि दक्षिण भारत में अब बारिश नहीं होगी। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने 15 अक्टूबर को दक्षिण भारत में उत्तर-पूर्वी मॉनसून के आगमन की जानकारी दी थी। विभाग के अनुसार, तमिलनाडु, पुडुचेरी, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में 21 अक्टूबर तक बारिश की संभावना जताई गई थी। उत्तर-पूर्वी मॉनसून अक्टूबर से दिसंबर के बीच दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में वर्षा का महत्वपूर्ण स्रोत होता है। तमिलनाडु को अपनी सालाना बारिश का लगभग आधा हिस्सा इसी अवधि में मिलता है। इसलिए इस मौसम की बारिश जलाशयों की स्थिति सुधारने और कृषि संबंधी जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

आने वाले महीनों में बढ़ सकती है पानी की किल्लत

जलाशयों में कम पानी होने का सबसे बड़ा असर सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता पर पड़ सकता है। मॉनसून समाप्त होने के बाद जलाशयों में जमा पानी का इस्तेमाल अगले कई महीनों तक करना पड़ता है। इस दौरान यदि बारिश सीमित रहती है, तो पानी की मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बढ़ सकता है। कृषि क्षेत्र में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलने पर किसानों को फसलों के चयन, सिंचाई के समय और खेती की लागत से जुड़े फैसलों में बदलाव करना पड़ सकता है। कुछ इलाकों में फसल उत्पादन प्रभावित होने की आशंका भी बढ़ सकती है।

शहरी क्षेत्रों में जलाशयों से होने वाली पेयजल आपूर्ति पर दबाव बढ़ने की स्थिति में प्रशासन को पानी के वितरण की प्राथमिकताएं तय करनी पड़ सकती हैं। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि सभी शहरों में तत्काल पानी की कटौती होगी। स्थानीय जल स्रोतों, भूजल और वैकल्पिक आपूर्ति की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। इसी तरह, जलविद्युत परियोजनाओं में कम जल भंडारण के कारण कुछ जगहों पर बिजली उत्पादन की संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसका वास्तविक असर संबंधित परियोजनाओं की स्थिति और बिजली उत्पादन के अन्य स्रोतों पर निर्भर करेगा।

जल संकट से निपटने के लिए जल संरक्षण जरूरी

कम बारिश वाले क्षेत्रों में उपलब्ध पानी का योजनाबद्ध इस्तेमाल करना और जल संरक्षण को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। सिंचाई के दौरान पानी की बर्बादी कम करने, वर्षा जल संचयन को प्रोत्साहित करने और भूजल के इस्तेमाल पर निगरानी रखने जैसे कदम लंबे समय में मददगार हो सकते हैं। किसानों के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकें कुछ फसलों और परिस्थितियों में पानी बचाने का प्रभावी माध्यम बन सकती हैं। शहरों में पाइपलाइन से होने वाले रिसाव को रोकना, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना और उपचारित पानी का दोबारा इस्तेमाल करना भी उपयोगी उपाय हैं।

इसके साथ ही, जलाशयों से पानी छोड़ने की योजना बनाते समय पेयजल, सिंचाई और पर्यावरणीय जरूरतों को ध्यान में रखना आवश्यक है। साझा नदी जल के प्रबंधन में राज्यों के बीच समन्वय और समय पर जानकारी का आदान-प्रदान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। जल संकट से निपटने के लिए केवल बारिश पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना जरूरी है।

निष्कर्ष

देश के प्रमुख जलाशयों में पिछले साल और दीर्घकालिक औसत की तुलना में कम पानी उपलब्ध होना आने वाले महीनों के लिए चिंता का विषय है। दक्षिण भारत में कावेरी, पेन्नार और कृष्णा जैसे नदी बेसिन की स्थिति पर विशेष नजर रखने की जरूरत है। कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कम बारिश का असर कृषि और जल प्रबंधन पर दिखाई दे रहा है। हालांकि, उत्तर-पूर्वी मॉनसून से दक्षिण भारत के कई हिस्सों में बारिश की उम्मीद बनी हुई है। यदि पर्याप्त और व्यापक वर्षा होती है, तो जलाशयों की स्थिति में सुधार संभव है। फिलहाल जल संकट की गंभीरता का आकलन करने के लिए बारिश के पूर्वानुमान, जलाशयों के वास्तविक भंडारण और स्थानीय पानी की मांग पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा।

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