भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) 20 अक्टूबर 2026 से प्रभावी हो गया है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापारिक बाधाओं को कम करना, भारतीय उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देना, निवेश के नए अवसर पैदा करना और रोजगार की संभावनाओं का विस्तार करना है। समझौते के तहत न्यूजीलैंड भारतीय उत्पादों को अपने बाजार में शून्य सीमा शुल्क पर प्रवेश देने की व्यवस्था कर रहा है। दूसरी ओर, न्यूजीलैंड के कई उत्पादों को भारतीय बाजार में चरणबद्ध तरीके से कम आयात शुल्क पर प्रवेश मिलेगा। हालांकि, भारत ने अपने डेयरी क्षेत्र और कई संवेदनशील कृषि उत्पादों को व्यापक शुल्क रियायतों से बाहर रखा है। इस समझौते के जरिए दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं के द्विपक्षीय व्यापार को 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
भारत और न्यूजीलैंड के बीच समझौता कब हुआ?
भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर बातचीत 16 मार्च 2025 को शुरू हुई थी। दोनों देशों ने 22 दिसंबर 2025 को वार्ता पूरी होने की घोषणा की। इसके बाद 27 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद इसे 20 अक्टूबर 2026 से लागू किया गया। इस समझौते का उद्देश्य केवल वस्तुओं के आयात-निर्यात को बढ़ाना नहीं है, बल्कि सेवाओं, निवेश, शिक्षा, तकनीकी सहयोग और पेशेवरों की आवाजाही के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग को मजबूत करना है।
भारत के लिए यह समझौता अपने निर्यात बाजारों का विस्तार करने की रणनीति का हिस्सा है। वहीं, न्यूजीलैंड के लिए भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार अपने उत्पादों और सेवाओं की पहुंच बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है। दोनों देशों को उम्मीद है कि व्यापारिक बाधाएं कम होने से कंपनियों के लिए नए बाजारों में प्रवेश करना आसान होगा और आर्थिक संबंध अधिक व्यापक बनेंगे।
भारत और न्यूजीलैंड के बीच अभी कितना व्यापार होता है?
भारत और न्यूजीलैंड के बीच व्यापारिक संबंध पिछले कई वर्षों से जारी हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच कारोबार की संभावनाओं की तुलना में व्यापार का मौजूदा स्तर सीमित रहा है। उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। यह आंकड़ा केवल वस्तुओं के व्यापार से संबंधित है। इसमें आईटी, पर्यटन, शिक्षा और अन्य सेवाओं को शामिल करने पर कुल द्विपक्षीय व्यापार का आकार अलग होगा।
भारत न्यूजीलैंड को मुख्य रूप से कपड़े, रेडीमेड परिधान, दवाइयां, रसायन, इंजीनियरिंग उत्पाद, मशीनरी, चमड़े के सामान और आभूषण जैसे उत्पादों का निर्यात करता है। दूसरी ओर, न्यूजीलैंड से भारत में लकड़ी, ऊन, कोयला और कुछ कृषि उत्पादों सहित विभिन्न वस्तुओं का आयात होता है। दोनों देशों के बीच हुए नए समझौते से इन व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार करने की संभावना बढ़ी है।
भारत और न्यूजीलैंड ने वर्ष 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं के कुल द्विपक्षीय व्यापार को 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर, यानी लगभग 35,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह भविष्य के लिए तय किया गया लक्ष्य है, न कि मौजूदा व्यापार का आंकड़ा। इसे हासिल करने के लिए भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड में नए ग्राहक तलाशने होंगे, जबकि दोनों देशों की कंपनियों को निवेश और कारोबारी सहयोग बढ़ाना होगा।
भारतीय निर्यातकों को कैसे मिलेगा फायदा?
इस समझौते का एक प्रमुख प्रावधान न्यूजीलैंड के बाजार में भारतीय उत्पादों को शुल्क-मुक्त पहुंच देना है। इसका अर्थ है कि समझौते के तहत निर्धारित नियमों को पूरा करने वाले भारतीय उत्पादों पर न्यूजीलैंड में सीमा शुल्क नहीं लगेगा। इससे भारतीय वस्तुओं की आयात लागत कम हो सकती है और उन्हें दूसरे देशों के उत्पादों के मुकाबले प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलने की संभावना है।
भारतीय निर्यातकों के लिए यह अवसर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी उत्पाद की विदेशी बाजार में कीमत तय करने में सीमा शुल्क की भूमिका होती है। यदि आयात शुल्क समाप्त होने से उत्पाद की लागत कम होती है, तो निर्यातक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर सामान बेच सकते हैं या अपने कारोबार के विस्तार में इस लाभ का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, वास्तविक लाभ उत्पाद की मांग, उत्पादन लागत, परिवहन खर्च और बाजार में प्रतिस्पर्धा पर भी निर्भर करेगा।
इस समझौते से छोटे और मध्यम उद्योगों को भी नए बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है। कपड़ा, चमड़ा, जूते, दवाइयां, मशीनरी और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ बनाने वाली कंपनियां न्यूजीलैंड के आयातकों के साथ कारोबार बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं। इससे उत्पादन, पैकेजिंग, परिवहन और वितरण जैसे क्षेत्रों में भी कारोबारी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।
कपड़ा, चमड़ा और फुटवियर उद्योग को क्या लाभ होगा?
भारत का कपड़ा और परिधान उद्योग बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देता है। इस क्षेत्र की कंपनियां शर्ट, ट्राउजर, रेडीमेड कपड़े, घरेलू टेक्सटाइल और अन्य उत्पादों का निर्यात करती हैं। न्यूजीलैंड में भारतीय उत्पादों को शून्य सीमा शुल्क पर प्रवेश मिलने से भारतीय निर्माताओं को वहां अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।
चमड़े और फुटवियर उद्योग के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण है। भारत में जूते, बैग और चमड़े से बने दूसरे उत्पाद तैयार करने वाली कंपनियां न्यूजीलैंड के बाजार में अपने कारोबार का विस्तार कर सकती हैं। सीमा शुल्क में राहत से इन उत्पादों की कीमत प्रतिस्पर्धात्मक बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय कंपनियां न्यूजीलैंड के ग्राहकों की मांग, गुणवत्ता मानकों और डिजाइन संबंधी अपेक्षाओं को किस हद तक पूरा कर पाती हैं।
दवा और इंजीनियरिंग क्षेत्र के लिए नए अवसर
भारत दवा निर्माण और इंजीनियरिंग उत्पादों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। न्यूजीलैंड के बाजार में भारतीय दवाइयों, मशीनरी और अन्य औद्योगिक उत्पादों की पहुंच बढ़ने से इन क्षेत्रों की कंपनियों को कारोबार के विस्तार का अवसर मिल सकता है। समझौते में नियामकीय प्रक्रियाओं को आसान बनाने और कुछ मान्यता प्राप्त अंतरराष्ट्रीय नियामकों के निरीक्षण संबंधी अनुमोदनों को स्वीकार करने की व्यवस्था भी शामिल है।
इससे संबंधित उत्पादों के लिए बाजार में प्रवेश की प्रक्रिया सरल हो सकती है। हालांकि, दवाओं और मेडिकल उपकरणों के निर्यात के लिए गुणवत्ता, सुरक्षा और संबंधित नियामकीय आवश्यकताओं का पालन करना जरूरी होगा। इसी तरह, इंजीनियरिंग और मशीनरी उत्पादों को भी न्यूजीलैंड में लागू तकनीकी मानकों तथा अन्य आवश्यक शर्तों को पूरा करना होगा।
रत्न एवं आभूषण, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और अन्य उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली भारतीय कंपनियों को भी इस समझौते से लाभ मिलने की संभावना है। निर्यात बाजार का विस्तार होने से छोटे कारोबारियों को नए खरीदारों तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है। इसके बावजूद, केवल सीमा शुल्क समाप्त होने से निर्यात में स्वतः वृद्धि सुनिश्चित नहीं होती। उत्पाद की गुणवत्ता, कीमत, आपूर्ति क्षमता और ग्राहकों की मांग भी महत्वपूर्ण होंगी।
न्यूजीलैंड से भारत क्या-क्या आएगा?
भारत न्यूजीलैंड से लकड़ी, ऊन, कोयला और कुछ कृषि उत्पादों सहित विभिन्न वस्तुओं का आयात करता है। मुक्त व्यापार समझौते के तहत न्यूजीलैंड के कई उत्पादों को भारतीय बाजार में कम आयात शुल्क पर प्रवेश देने की व्यवस्था की गई है। इससे कुछ आयातित वस्तुओं की लागत कम हो सकती है और भारतीय कंपनियों को कच्चे माल तथा अन्य उत्पादों की आपूर्ति में विकल्प मिल सकते हैं।
न्यूजीलैंड सरकार की जानकारी के अनुसार, समझौते के शुरुआती चरण में उसके भारत को होने वाले निर्यात के लगभग 57 प्रतिशत हिस्से पर सीमा शुल्क समाप्त होने की व्यवस्था है। समय के साथ यह अनुपात लगभग 82 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है। कुल मिलाकर न्यूजीलैंड के लगभग 95 प्रतिशत मौजूदा निर्यात पर या तो शुल्क समाप्त होगा या उसमें कमी की जाएगी। हालांकि, सभी उत्पादों पर तत्काल शून्य सीमा शुल्क लागू नहीं हुआ है। अलग-अलग वस्तुओं के लिए शुल्क में कटौती की समयसीमा और शर्तें अलग हो सकती हैं।
आयात शुल्क घटने से भारतीय कंपनियों को कुछ उत्पाद अपेक्षाकृत कम लागत पर मिल सकते हैं। लेकिन आयातित वस्तुओं की अंतिम कीमत पर परिवहन, बीमा, विनिमय दर, अन्य कर और वितरण लागत का भी प्रभाव पड़ता है। इसलिए शुल्क में कमी का पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा या नहीं, यह बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
सेब, कीवी और शहद के आयात पर क्या असर पड़ेगा?
भारत और न्यूजीलैंड के समझौते में कुछ कृषि उत्पादों के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। न्यूजीलैंड से सेब, कीवी फल और मनुका शहद जैसे उत्पादों को निर्धारित शर्तों के तहत रियायती आयात शुल्क पर भारतीय बाजार में प्रवेश मिल सकता है। इसके लिए टैरिफ रेट कोटा यानी निर्धारित आयात मात्रा पर रियायती शुल्क की व्यवस्था का उपयोग किया जाएगा।
उदाहरण के तौर पर, वर्ष 2027 में न्यूजीलैंड से 35,000 टन सेब के आयात के लिए 25 प्रतिशत रियायती शुल्क की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है, जबकि सामान्य शुल्क दर 50 प्रतिशत बताई गई है। यह रियायत निर्धारित कोटे और लागू शर्तों के अंतर्गत होगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यूजीलैंड से आने वाले सभी सेब बिना शुल्क के भारत में बेचे जाएंगे।
इस व्यवस्था से भारतीय बाजार में कुछ आयातित फलों की उपलब्धता बढ़ सकती है और उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिल सकते हैं। हालांकि, भारतीय किसानों और घरेलू उत्पादकों के हितों को ध्यान में रखते हुए आयात की मात्रा, न्यूनतम आयात मूल्य और अन्य शर्तों जैसे सुरक्षा उपाय भी महत्वपूर्ण रहेंगे।
डेयरी और संवेदनशील कृषि उत्पादों को समझौते से बाहर क्यों रखा गया?
भारत ने मुक्त व्यापार समझौते में अपने डेयरी क्षेत्र और कई संवेदनशील कृषि उत्पादों को व्यापक शुल्क रियायतों से बाहर रखा है। दूध, क्रीम, मक्खन, पनीर, दही और अन्य प्रमुख डेयरी उत्पादों पर न्यूजीलैंड को व्यापक शुल्क रियायत नहीं दी गई है। इसके अलावा, चीनी, खाद्य तेलों और कई महत्वपूर्ण कृषि उत्पादों को भी संरक्षण दिया गया है।
भारत में कृषि और डेयरी क्षेत्र बड़ी संख्या में किसानों, पशुपालकों और छोटे उत्पादकों की आजीविका से जुड़ा है। न्यूजीलैंड डेयरी उत्पादों के बड़े निर्यातकों में शामिल है, इसलिए इन उत्पादों पर व्यापक शुल्क रियायत से घरेलू बाजार पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर संवेदनशीलता रही है। इसी वजह से भारत ने व्यापार बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू उत्पादकों के हितों की सुरक्षा के लिए कुछ क्षेत्रों को रियायतों से बाहर रखा है।
समझौते में कृषि उत्पादकता बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा, फसल कटाई के बाद उत्पादों के रखरखाव, आपूर्ति श्रृंखला, बागवानी और मधुमक्खी पालन जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं भी शामिल हैं। इससे दोनों देशों को कृषि क्षेत्र में तकनीकी जानकारी और अनुभव साझा करने का अवसर मिल सकता है।
न्यूजीलैंड भारत में कितना निवेश करेगा?
इस समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू निवेश से जुड़ा है। न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश को सुविधाजनक बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसका उद्देश्य भारत में निवेश के अवसरों को बढ़ावा देना और दोनों देशों की कंपनियों के बीच कारोबारी सहयोग को प्रोत्साहित करना है।
यदि आने वाले वर्षों में इस दिशा में निवेश बढ़ता है, तो विनिर्माण, बुनियादी ढांचे, कृषि और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में नई परियोजनाएं शुरू होने की संभावना बन सकती है। इससे रोजगार, तकनीकी सहयोग और उत्पादन क्षमता के विस्तार को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।
हालांकि, 20 अरब अमेरिकी डॉलर की राशि को भारत में तत्काल आ चुका निवेश नहीं समझना चाहिए। यह दीर्घकालिक निवेश प्रतिबद्धता है। वास्तविक निवेश का स्तर आने वाले वर्षों में शुरू होने वाली परियोजनाओं, कंपनियों के फैसलों और कारोबारी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
भारतीय युवाओं और पेशेवरों के लिए क्या बदलेगा?
भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते में पेशेवरों और युवाओं की आवाजाही को लेकर भी प्रावधान किए गए हैं। इसके तहत भारतीय पेशेवरों को निर्धारित शर्तों के अनुसार न्यूजीलैंड में काम करने के अवसर मिल सकते हैं। समझौते में प्रतिवर्ष 5,000 अस्थायी रोजगार प्रवेश वीजा का विशेष प्रावधान शामिल है। इसके अतिरिक्त, युवाओं के लिए प्रतिवर्ष 1,000 वर्किंग हॉलिडे वीजा की व्यवस्था भी की गई है।
इन प्रावधानों से पात्र भारतीय पेशेवरों और युवाओं को न्यूजीलैंड में काम करने, अंतरराष्ट्रीय अनुभव प्राप्त करने और अपने कौशल का उपयोग करने के अवसर मिल सकते हैं। हालांकि, वीजा प्राप्त करने के लिए निर्धारित पात्रता, आवेदन प्रक्रिया और अन्य नियमों का पालन करना जरूरी होगा। समझौते का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक को स्वतः न्यूजीलैंड में काम करने की अनुमति मिल जाएगी।
शिक्षा के क्षेत्र में भी यह समझौता महत्वपूर्ण है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित यानी STEM विषयों में पात्र स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी करने वाले भारतीय विद्यार्थियों को निर्धारित शर्तों के तहत तीन वर्ष तक के पोस्ट-स्टडी वर्क अधिकार मिल सकते हैं। डॉक्टरेट शोधार्थियों के लिए यह अवधि चार वर्ष तक हो सकती है। इससे भारतीय विद्यार्थियों को न्यूजीलैंड में शिक्षा के बाद करियर बनाने के अवसर मिल सकते हैं, बशर्ते वे संबंधित नियमों और पात्रता की शर्तों को पूरा करें।
आईटी और सेवा क्षेत्र को कैसे मिलेगा फायदा?
भारत की अर्थव्यवस्था में सूचना प्रौद्योगिकी, परामर्श, पर्यटन, पेशेवर सेवाओं और अन्य सेवा क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका है। समझौते में न्यूजीलैंड के बाजार में भारतीय सेवा प्रदाताओं की पहुंच बढ़ाने के प्रावधान शामिल हैं। इसके तहत लगभग 118 सेवा क्षेत्रों में बाजार पहुंच से संबंधित व्यवस्थाएं की गई हैं।
इससे भारतीय आईटी कंपनियों, पेशेवर संस्थानों और अन्य सेवा प्रदाताओं को न्यूजीलैंड में कारोबार बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। समझौते में लगभग 139 उप-क्षेत्रों के लिए सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र यानी मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं। इनका उद्देश्य निर्धारित क्षेत्रों में भारत के लिए बाजार पहुंच से जुड़ी कुछ शर्तों को सुरक्षित करना है।
हालांकि, प्रत्येक सेवा क्षेत्र में मिलने वाला लाभ संबंधित नियमों, कारोबारी गतिविधियों और समझौते की शर्तों पर निर्भर करेगा। इसलिए इसे सभी भारतीय कंपनियों के लिए बिना शर्त बाजार पहुंच के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
आम लोगों को क्या फायदा हो सकता है?
इस समझौते का आम लोगों पर असर आयातित उत्पादों की कीमतों, बाजार में उपलब्ध विकल्पों और रोजगार के अवसरों के माध्यम से दिखाई दे सकता है। यदि आयात शुल्क में कमी का लाभ कंपनियों और आयातकों से आगे उपभोक्ताओं तक पहुंचता है, तो कुछ वस्तुएं अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध हो सकती हैं। इसके साथ ही, बाजार में उत्पादों की विविधता भी बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड में बेहतर बाजार पहुंच मिलने से उत्पादन बढ़ाने और कारोबार का विस्तार करने का अवसर मिल सकता है। यदि कंपनियों को नए ऑर्डर मिलते हैं, तो विनिर्माण, पैकेजिंग, परिवहन, भंडारण और वितरण से जुड़े क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
हालांकि, किसी भी उत्पाद की कीमत केवल सीमा शुल्क से निर्धारित नहीं होती। उत्पादन लागत, परिवहन, बीमा, विनिमय दर, अन्य कर और बाजार में मांग भी इसकी कीमत को प्रभावित करते हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि शुल्क में हर कमी का पूरा लाभ सीधे उपभोक्ताओं को मिले।
क्या मुक्त व्यापार समझौते से भारत का व्यापार घाटा कम होगा?
भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौते से भारत के निर्यात को बढ़ावा मिलने की संभावना है, लेकिन इससे व्यापार घाटा अपने आप कम हो जाएगा, ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी। व्यापार घाटा इस बात पर निर्भर करता है कि भारत न्यूजीलैंड से कितने मूल्य का आयात करता है और उसके मुकाबले कितना निर्यात करता है।
यदि भारतीय कंपनियां न्यूजीलैंड में अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाती हैं, तो भारत के निर्यात में वृद्धि हो सकती है। दूसरी ओर, न्यूजीलैंड के उत्पादों पर आयात शुल्क घटने से भारत में उनकी मांग और बिक्री भी बढ़ सकती है। अंतिम परिणाम दोनों देशों के आयात-निर्यात, बाजार की मांग, निवेश और कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर निर्भर करेगा।
इसलिए समझौते के वास्तविक आर्थिक प्रभाव को समझने के लिए आने वाले महीनों और वर्षों में व्यापार, निवेश और रोजगार से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करना जरूरी होगा।
भारत-न्यूजीलैंड समझौते का व्यापक महत्व
भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को व्यापक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत को न्यूजीलैंड के बाजार में अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ाने का अवसर मिलेगा, जबकि न्यूजीलैंड की कंपनियों को भारतीय बाजार में कारोबार के विस्तार की संभावनाएं मिलेंगी। निवेश, शिक्षा और पेशेवरों की आवाजाही से संबंधित प्रावधान भी दोनों देशों के बीच सहयोग को मजबूत कर सकते हैं।
हालांकि, इस समझौते की सफलता केवल आयात शुल्क घटाने पर निर्भर नहीं करेगी। भारतीय कंपनियों को उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने, प्रतिस्पर्धी कीमतों पर सामान उपलब्ध कराने और विदेशी बाजारों की मांग के अनुरूप उत्पादन करने की जरूरत होगी। इसी तरह, आयात शुल्क में कमी से मिलने वाले लाभ का आकलन करने के लिए वास्तविक कीमतों और व्यापार के आंकड़ों पर नजर रखनी होगी।
कुल मिलाकर, भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता भारतीय निर्यातकों, सेवा प्रदाताओं, निवेशकों और पात्र पेशेवरों के लिए नए अवसर खोल सकता है। लेकिन इन अवसरों का वास्तविक लाभ कितना होगा, यह आने वाले वर्षों में समझौते के क्रियान्वयन और दोनों देशों के कारोबारी प्रदर्शन से स्पष्ट होगा।




