योगी सरकार की वापसी हुई तो यूपी में लागू होगा समान नागरिक संहिता? अमित शाह ने दिया संकेत

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में समान नागरिक संहिता (UCC) का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में भाजपा की लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य सामने रखते हुए समान नागरिक संहिता को लेकर पार्टी की प्रतिबद्धता दोहराई है। इस मुद्दे को भाजपा लंबे समय से अपने प्रमुख राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे में शामिल करती रही है। पार्टी का मानना है कि देश में सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों में समान कानूनी व्यवस्था होनी चाहिए।

लखनऊ में आयोजित भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में अमित शाह ने आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भाजपा की असली ताकत उसके समर्पित कार्यकर्ता हैं। बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करना और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाना बेहद जरूरी है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लक्ष्य बनाकर एकजुटता के साथ काम करने और प्रदेश में लगातार तीसरी बार भाजपा की सरकार बनाने के लिए मेहनत करने का आह्वान किया।

अपने संबोधन में अमित शाह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में पहले माफिया और अपराध का प्रभाव था, लेकिन योगी सरकार ने सख्त शासन व्यवस्था के माध्यम से कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाने का काम किया है। उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का उल्लेख करते हुए भाजपा सरकार की उपलब्धियों को भी सामने रखा। इसके साथ ही उन्होंने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा और प्रदेश की पिछली सरकारों के कार्यकाल को लेकर सवाल उठाए।

अमित शाह ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों के परिणामों का जिक्र करते हुए भाजपा की चुनावी सफलता का उल्लेख किया। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि जिस तरह पार्टी ने पिछले दो विधानसभा चुनावों में जनता का समर्थन हासिल किया, उसी तरह 2027 में भी संगठन को मजबूत बनाकर चुनाव मैदान में उतरना होगा। भाजपा का लक्ष्य प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना है। ऐसे में समान नागरिक संहिता का मुद्दा आगामी विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड ऐसी कानूनी व्यवस्था है, जिसके तहत देश के सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत और पारिवारिक मामलों में समान कानून लागू करने का प्रस्ताव है। इसके दायरे में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे और गोद लेने जैसे विषय आ सकते हैं। वर्तमान में भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए कई मामलों में अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य इन मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में भी समान नागरिक संहिता का उल्लेख किया गया है। यह संविधान के नीति-निदेशक तत्वों का हिस्सा है, जिसमें राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि, यह प्रावधान अपने आप में कानून लागू नहीं करता। इसके लिए सरकार को संबंधित कानून बनाना और विधायी प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में उत्तराखंड पहला राज्य बना। वहां फरवरी 2024 में यूसीसी विधेयक पारित किया गया और जनवरी 2025 से इसे लागू कर दिया गया। इसके बाद गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यों में भी इस दिशा में चर्चा और प्रक्रिया आगे बढ़ी। अमित शाह ने सितंबर 2026 में मुंबई में कहा था कि भाजपा और एनडीए की सरकार वाले सभी 21 राज्यों में वर्ष 2029 से पहले समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास किया जाएगा।

उत्तर प्रदेश में भी इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज रही हैं। भाजपा नेताओं की ओर से पहले भी संकेत दिए गए हैं कि पार्टी समान नागरिक संहिता लागू करने के पक्ष में है। पार्टी के चुनावी संकल्प और राजनीतिक एजेंडे में इस विषय को प्रमुखता दी जाती रही है। हालांकि, प्रदेश में यूसीसी लागू करने के लिए राज्य सरकार को कानून का प्रारूप तैयार करने, आवश्यक विचार-विमर्श करने और विधानसभा में विधायी प्रक्रिया पूरी करने की जरूरत होगी।

समान नागरिक संहिता को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग विचार सामने आते रहे हैं। भाजपा इसे लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय और सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी अधिकारों से जोड़ती है। वहीं, कुछ विपक्षी दलों और संगठनों ने धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों और संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों को लेकर सवाल उठाए हैं। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी समेत कई विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे पर अपनी आपत्तियां जाहिर की हैं।

फिलहाल उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समान नागरिक संहिता का मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता दिखाई दे रहा है। भाजपा जहां इसे समानता और सामाजिक न्याय से जोड़कर जनता के सामने रख सकती है, वहीं विपक्षी दल इस पर सरकार से सवाल कर सकते हैं। यदि प्रदेश में भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आती है, तो समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में नई सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। हालांकि, कानून कब लागू होगा और उसका स्वरूप क्या होगा, यह सरकार की आधिकारिक घोषणा तथा विधायी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

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