देश में उस समय सियासी सरगर्मी बढ़ गई जब लोकपाल कार्यालय द्वारा सात लक्जरी BMW 3-सीरीज़ (330Li M-Sport) कारों की खरीद के लिए टेंडर जारी किया गया। बताया जा रहा है कि इन गाड़ियों की अनुमानित कीमत करीब 4 से 5 करोड़ रुपये है। 16 अक्टूबर को जारी हुए इस टेंडर में गाड़ियों के मॉडल, रंग, सुरक्षा फीचर और ड्राइवर ट्रेनिंग तक की शर्तें तय की गईं। जैसे ही यह सूचना सार्वजनिक हुई, विपक्षी दलों और सोशल मीडिया पर लोकपाल की आलोचना शुरू हो गई। लोगों ने सवाल उठाया कि जिस संस्था को भ्रष्टाचार पर नजर रखनी है, वह खुद इतनी महंगी गाड़ियां क्यों खरीद रही है।
विपक्ष ने इस मामले को हाथों-हाथ लेते हुए सरकार और लोकपाल दोनों पर हमला बोला। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने व्यंग्य करते हुए कहा कि “ईमानदारी के रखवाले अब ‘शौकपाल’ बन गए हैं।” नेताओं ने पूछा कि जब सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश साधारण गाड़ियों से काम चलाते हैं, तो लोकपाल जैसे पदों के लिए BMW जैसी लक्जरी कारों की क्या जरूरत है। कुछ विपक्षी नेताओं ने घरेलू ऑटो कंपनियों, जैसे महिंद्रा या टाटा, की गाड़ियां लेने की सलाह दी, ताकि ‘मेक इन इंडिया’ को भी प्रोत्साहन मिल सके।
वहीं, दूसरी ओर लोकपाल के कुछ समर्थकों और सरकारी सूत्रों ने इस खरीद का बचाव करते हुए कहा कि यह निर्णय सुरक्षा, विश्वसनीयता और लंबे परिचालन की जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि टेंडर में विक्रेता द्वारा ड्राइवरों और स्टाफ को आवश्यक प्रशिक्षण देने की शर्त भी जोड़ी गई है, ताकि वाहनों का सही उपयोग और रखरखाव हो सके। समर्थकों का कहना है कि वरिष्ठ संवैधानिक पदों पर कार्यरत अधिकारियों को कुछ विशेष सुविधाएँ मिलना असामान्य नहीं है, और यह खरीद भी उन्हीं नियमों के तहत की जा रही है।
इस मुद्दे पर जनता और मीडिया के बीच भी बहस तेज हो गई है। कई लोगों का कहना है कि भ्रष्टाचार-रोधी संस्था को अपने खर्च और फैसलों में अधिक सादगी दिखानी चाहिए। वहीं कुछ का मानना है कि सुरक्षा और तकनीकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इस तरह की खरीद उचित है। कई सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं ने लोकपाल से इस टेंडर की पूरी जानकारी सार्वजनिक करने, लागत का ब्योरा देने और वैकल्पिक विकल्पों पर विचार करने की मांग की है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा है कि लोकपाल कार्यालय या सरकार इस बढ़ते विवाद को देखते हुए टेंडर पर पुनर्विचार कर सकती है। हालांकि, यदि कार्यालय स्पष्ट तकनीकी कारणों के साथ अपनी स्थिति रखता है, तो यह विवाद धीरे-धीरे शांत भी हो सकता है। फिलहाल विपक्ष इस मुद्दे को लेकर आक्रामक है और सरकार पर निशाना साध रही है, जबकि आम जनता यह सवाल पूछ रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाली संस्था को क्या वास्तव में इतनी विलासिता की आवश्यकता है।
लोकपाल संस्था की स्थापना भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए की गई थी। ऐसे में जब वही संस्था महंगी लक्जरी कारें खरीदती दिख रही है, तो जनता में स्वाभाविक रूप से असंतोष और सवाल उठना स्वाभाविक है। यह मामला न केवल सरकारी खर्च की प्राथमिकताओं पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है, बल्कि यह भी दिखा रहा है कि सादगी और जवाबदेही की अपेक्षा जनता अब हर संवैधानिक संस्था से करने लगी है।




