लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने नागालैंड की राजधानी कोहिमा में कहा कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को पद से हटाने से जुड़े संवैधानिक संशोधन बिल पर विचार करने के लिए जल्द ही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि समिति का गठन तभी संभव है जब सभी राजनीतिक दल अपने-अपने प्रतिनिधियों के नाम औपचारिक रूप से लोकसभा सचिवालय को भेज देंगे। बिरला कोहिमा में आयोजित कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन (सीपीए) जोन-III सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे थे, जहां उन्होंने यह अहम घोषणा की।
केंद्र सरकार ने 20 अगस्त 2025 को संसद में संविधान (एक सौ तीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2025 पेश किया था, जिसमें ऐसे प्रावधान शामिल हैं कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार हो जाता है, तो उसकी संवैधानिक स्थिति और अधिकार स्पष्ट किए जाएं। सरकार का तर्क है कि इस संशोधन से शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक ढांचे और संघीय व्यवस्था के लिए खतरा बता रहा है।
विपक्षी दलों जैसे कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और अन्य ने इस संशोधन बिल का विरोध करते हुए कहा कि यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और इससे राजनीतिक द्वेष के आधार पर कार्रवाई की आशंका बढ़ जाएगी। कुछ दलों ने तो जेपीसी में शामिल न होने की घोषणा भी की है। हालांकि, सरकार का कहना है कि सभी दलों की भागीदारी से ही एक निष्पक्ष और ठोस रिपोर्ट तैयार हो सकती है।
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि जैसे ही पार्टियाँ अपने सदस्यों के नाम भेजेंगी, जेपीसी का औपचारिक गठन कर दिया जाएगा और समिति से उम्मीद है कि वह आगामी शीतकालीन सत्र में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। सूत्रों के मुताबिक, जेपीसी को सीमित समय में अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपनी हैं, ताकि बिल पर आगे की कार्रवाई तय की जा सके।
संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि यह संशोधन संसद और न्यायपालिका के बीच शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकता है। गिरफ्तारी मात्र के आधार पर पद से हटाने का प्रावधान न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है। इसलिए विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि इस पर व्यापक बहस और कानूनी परामर्श जरूरी है, जो जेपीसी के माध्यम से संभव होगा।
लोकसभा अध्यक्ष के कोहिमा बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि केंद्र सरकार और विपक्ष, दोनों इस बिल पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की तैयारी में हैं। अगर जेपीसी जल्द गठित होती है, तो यह संवैधानिक बहस आने वाले सत्र में संसद की सबसे अहम चर्चा बन सकती है।




