नए CJI बने जस्टिस सूर्यकांत: संविधान, सेना और नागरिक अधिकारों से जुड़े बड़े मुकदमों में रहा है अहम योगदान

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भारत के नए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने 24 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के 53वें CJI के रूप में पदभार संभाला। हरियाणा के हिसार जिले के पेटवार गांव में 10 फरवरी 1962 को जन्मे जस्टिस सूर्यकांत का सफर एक साधारण ग्रामीण परिवेश से सर्वोच्च न्यायालय के शीर्ष पद तक पहुंचने का उदाहरण माना जाता है। उन्होंने महार्षि दयानंद विश्वविद्यालय से लॉ की पढ़ाई की और 1984 में जिला अदालत, हिसार से अपने वकालत करियर की शुरुआत की। इसके बाद 1985 में वे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे, जहां उन्होंने संवैधानिक, नागरिक, सेवा और प्रशासनिक मामलों में विशेष पहचान बनाई। 2000 में हरियाणा के अटॉर्नी जनरल के पद पर नियुक्त होकर उन्होंने प्रशासनिक व संवैधानिक मामलों में अपनी विशेषज्ञता स्थापित की। वर्ष 2004 में वे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जज बने और 2018 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए। 2019 में सुप्रीम कोर्ट में शामिल होने के बाद उन्होंने लगातार कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई में प्रभावशाली भूमिका निभाई।

जस्टिस सूर्यकांत न्यायिक स्वतंत्रता, संवैधानिक संतुलन और नागरिक अधिकारों के विमर्श में अपनी सक्रिय भागीदारी के लिए पहचाने जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान वे कई ऐसे मामलों की सुनवाई का हिस्सा रहे जिनका राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा कानूनी और सामाजिक प्रभाव पड़ा। इनमें सबसे प्रमुख रहा वन रैंक-वन पेंशन (OROP) से जुड़ा विवाद, जिसमें उन्होंने उस बेंच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसने समान रैंक और समान सेवा अवधि वाले सैनिकों को समान पेंशन देने के सिद्धांत को कायम रखा। यह फैसला देश के लाखों पूर्व सैनिकों के हितों से जुड़ा हुआ था और इसे सैन्य कल्याण से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में गिना जाता है।

इसके अलावा जस्टिस सूर्यकांत अनुच्छेद 370 से जुड़े संवैधानिक विवादों की सुनवाई करने वाली बेंच का हिस्सा रहे, जहां केंद्र सरकार के कदमों और संघीय ढांचे पर विस्तृत कानूनी बहस हुई। उन्होंने उन सुनवाइयों में संवैधानिक प्रक्रियाओं, राज्य-केंद्र संबंधों और नागरिक अधिकारों पर संतुलित रुख अपनाने पर ज़ोर दिया। पेगासस जासूसी मामले में भी उनकी भूमिका अहम रही, जिसमें डिजिटल गोपनीयता और सरकारी शक्तियों की सीमाओं पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर चिंता साफ दिखाई दी। इसी तरह देशद्रोह कानून (Sedition Law) की वैधता और इसके दुरुपयोग पर हो रही सुनवाई में उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को महत्व देते हुए राज्य और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर ध्यान दिलाया।

जस्टिस सूर्यकांत उन सुनवाइयों में भी शामिल रहे जिनमें प्रधानमंत्री के काफिले में सुरक्षा चूक की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र समिति गठित की थी। इस प्रकरण में उन्होंने सुरक्षा प्रोटोकॉल, जवाबदेही और पारदर्शिता की जरूरत पर बल दिया। इसके अलावा सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने और रक्षा क्षेत्र में लैंगिक समानता से जुड़े मामलों पर भी उनकी बेंच के फैसलों का व्यापक प्रभाव पड़ा। उत्तराखंड की चारधाम परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और सामरिक प्रश्नों पर भी उन्होंने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन पर आधारित दृष्टिकोण अपनाया।

चुनाव सुधारों, मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों में भी वे कई बार सुप्रीम कोर्ट की उन बेंचों का हिस्सा रहे, जिनके फैसलों ने चुनावी पारदर्शिता को मजबूत किया। व्यापार, कर (Taxation) और वैधानिक छूटों से जुड़े कई जटिल मामलों में उनके फैसलों ने कॉर्पोरेट जगत, निवेश नीतियों और व्यापारिक संरचना को स्पष्ट दिशा दी। हाईकोर्ट के दौर से ही जस्टिस सूर्यकांत जेल सुधार, बंदी अधिकारों और मानवाधिकारों के मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं और उन्होंने कई बार प्रशासन को मानवीय और न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए जरूरी सुधारों के निर्देश दिए।

उनकी न्यायिक शैली की खासियत यह मानी जाती है कि वे प्रत्येक संवैधानिक मुद्दे को गहराई से विश्लेषित करते हैं और फैसले में नागरिक अधिकारों, संस्थागत जवाबदेही तथा विधिक प्रक्रिया के संतुलन को प्राथमिकता देते हैं। मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनके कार्यकाल से यह उम्मीद की जा रही है कि वे लंबित मामलों के प्रभावी समाधान, न्यायिक सुधारों और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए एक व्यापक और निर्णायक दृष्टिकोण अपनाएंगे।

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