राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश को विभाजित करने वाली भाषा और मानसिकता पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि “‘तेरे टुकड़े होंगे’ जैसी बातें अब नहीं चलेंगी।” उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह भारत के लिए टूटने या मरने का नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के लिए सकारात्मक रूप से जीने का समय है। भागवत ने कहा कि देश की आज़ादी और एकता के लिए जिन लोगों ने बलिदान दिया, उनका सम्मान करते हुए वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह भारत को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने में योगदान दे।
भागवत ने समाज में बढ़ते वैचारिक टकराव और विभाजनकारी सोच पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भाषा और विचार दोनों ही राष्ट्र की दिशा तय करते हैं, इसलिए सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार और संयमित शब्दों का प्रयोग जरूरी है। जाति, धर्म या क्षेत्र के नाम पर समाज को बांटने की कोशिशें देश की एकता के लिए घातक हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की मूल शक्ति उसकी विविधता में एकता है और इसी भावना को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
अपने संबोधन में आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि देशभक्ति का अर्थ केवल बलिदान की बातें करना नहीं, बल्कि राष्ट्र के विकास में सक्रिय भागीदारी निभाना है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे नकारात्मक नारों और हिंसक सोच से दूर रहकर देश को आगे ले जाने वाले कार्यों में जुड़ें। भागवत के अनुसार, आज का समय भारत को एक मजबूत, संगठित और आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का है, जहां समाज का हर वर्ग देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए मिलकर काम करे।




