“स्वार्थ छोड़ो, सद्भाव अपनाओ” — मोहन भागवत ने दुनिया को दी सीख

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मोहन भागवत  ने नागपुर में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वैश्विक संघर्षों और युद्धों पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि दुनिया में होने वाले अधिकांश युद्ध “स्वार्थ” और “वर्चस्व की चाह” का परिणाम हैं। उनके अनुसार, बीते करीब 2000 वर्षों में मानवता ने संघर्ष समाप्त करने के कई प्रयास किए, लेकिन स्थायी शांति अब भी एक चुनौती बनी हुई है। भागवत ने यह भी कहा कि धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्मांतरण और श्रेष्ठता की भावना जैसी प्रवृत्तियां आज भी समाजों और देशों के बीच टकराव को बढ़ा रही हैं।

उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक मनुष्य अपने विचार और व्यवहार में बदलाव नहीं लाता, तब तक शांति की स्थापना संभव नहीं है। भागवत ने भारत की प्राचीन सांस्कृतिक सोच का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय दर्शन “सभी एक हैं” और “पूरा विश्व एक परिवार है” की भावना पर आधारित है, जो वैश्विक स्तर पर सद्भाव और सहयोग का मार्ग दिखा सकता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि आधुनिक विज्ञान भी धीरे-धीरे इस विचार के करीब पहुंच रहा है, जो आपसी जुड़ाव और एकता को स्वीकार करता है।

संघ प्रमुख ने “धर्म” को केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित न मानते हुए उसे जीवन में उतारने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, अनुशासन, नैतिकता और एकता जैसे मूल्यों को अपनाकर ही स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इन मूल्यों को व्यवहार में लाने के लिए निरंतर अभ्यास और त्याग जरूरी है। अंत में, भागवत ने दुनिया को संदेश देते हुए कहा कि आज मानवता को संघर्ष नहीं, बल्कि सद्भाव, सहयोग और पारस्परिक सम्मान की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है, तभी एक शांतिपूर्ण और संतुलित विश्व की कल्पना साकार हो सकती है।

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