देश में महिलाओं को राजनीति में अधिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण कानून के क्रियान्वयन को लेकर स्पष्ट रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। आधिकारिक स्तर पर बनी रूपरेखा के अनुसार, यह कानून 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू किया जा सकता है। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि इस कानून को लागू करने से पहले परिसीमन (सीटों के पुनर्निर्धारण) की प्रक्रिया पूरी करना आवश्यक होगा। माना जा रहा है कि 2026 के बाद होने वाले परिसीमन में लोकसभा सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। वर्तमान में 543 सीटें हैं, जिन्हें बढ़ाकर लगभग 750 तक किया जा सकता है। इस कदम का उद्देश्य राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन स्थापित करना और आरक्षण लागू करने में आने वाली राजनीतिक चुनौतियों को कम करना है।
महिला आरक्षण को लेकर सबसे बड़ा विवाद अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए अलग कोटा न होने पर सामने आया है। विपक्षी दल लगातार मांग कर रहे हैं कि आरक्षण के भीतर OBC महिलाओं के लिए अलग हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए। हालांकि, सरकार का कहना है कि मौजूदा कानून में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में महिलाओं के लिए उप-आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन OBC के लिए अलग कोटा शामिल नहीं किया गया है।
इस कानून के लागू होने में एक और महत्वपूर्ण पहलू जनगणना है। 2021 की जनगणना कोविड-19 महामारी के कारण नहीं हो सकी थी, जिसके चलते अब नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन संभव होगा। यही वजह है कि सरकार ने 2029 को एक व्यवहारिक समयसीमा के रूप में देखा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण का मुद्दा आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख विषय बना रहेगा। जहां सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष OBC महिलाओं को अलग से शामिल न किए जाने को लेकर सरकार पर दबाव बना रहा है।
कुल मिलाकर, महिला आरक्षण कानून के लागू होने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है, लेकिन इसके पूर्ण क्रियान्वयन के लिए जनगणना और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण चरणों का पूरा होना जरूरी होगा। 2029 का आम चुनाव इस बदलाव का निर्णायक पड़ाव साबित हो सकता है।




