जल विवाद पर भारत का बड़ा संदेश, संप्रभुता से समझौता नहीं

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भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर विवाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। पाकिस्तान पिछले लगभग दस वर्षों से भारत की जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों और तथाकथित ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ का सहारा लेता रहा है। हालांकि भारत ने 2026 में एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि वह इस अदालत को “अवैध रूप से गठित” मानता है और उसके किसी भी फैसले को स्वीकार नहीं करेगा। विदेश मंत्रालय ने हालिया निर्णय को पूरी तरह “शून्य और अमान्य” बताते हुए कहा कि भारत अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ किसी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा।

सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस समझौते के तहत रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का अधिकार भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का अधिकांश उपयोग पाकिस्तान को दिया गया। हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित जलविद्युत परियोजनाएं विकसित करने और गैर-उपभोग उपयोग की अनुमति भी दी गई थी। पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान भारत की किशनगंगा और रतले जैसी परियोजनाओं का विरोध करता रहा है और इन्हें लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में शिकायतें दर्ज कराता रहा है।

भारत का कहना है कि पाकिस्तान तकनीकी मुद्दों को जानबूझकर राजनीतिक और कानूनी विवाद में बदलने की कोशिश करता रहा है। नई दिल्ली के अनुसार, संधि में विवाद समाधान के लिए ‘न्यूट्रल एक्सपर्ट’ और ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ जैसी अलग-अलग व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन पाकिस्तान समानांतर प्रक्रियाओं के जरिए भारत पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाता रहा है। यही कारण है कि भारत लगातार इन अंतरराष्ट्रीय मंचों की वैधता पर सवाल उठाता आया है।

2025 में पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद भारत द्वारा चलाए गए “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद दोनों देशों के रिश्तों में और तनाव बढ़ गया। भारत ने सिंधु जल संधि को “अस्थायी रूप से स्थगित” रखने का फैसला लेते हुए कहा कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक सामान्य व्यवस्था बहाल नहीं की जाएगी। इसके बाद पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर हेग स्थित मध्यस्थता मंच तक कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भारत के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराईं।

हाल ही में हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने भारत की जलविद्युत परियोजनाओं में जल भंडारण सीमा यानी “मैक्सिमम पॉन्डेज” को लेकर फैसला सुनाया, लेकिन भारत ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत इस तथाकथित अदालत को कभी मान्यता नहीं देता और उसके सभी आदेश पहले की तरह अब भी “निरर्थक” हैं। भारत ने यह भी दोहराया कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला जारी रहेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की कृषि और सिंचाई व्यवस्था काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। ऐसे में संधि को लेकर जारी विवाद और अनिश्चितता से वहां जल संकट की आशंका और गहरा सकती है। पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है, जबकि भारत इसे अपने खिलाफ कानूनी और कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति मानता है। भारत का रुख साफ है कि आतंकवाद और जल सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते, और इसी संदेश के साथ उसने 2026 में एक बार फिर पाकिस्तान को कड़ा जवाब दिया है।

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