मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर चल रहे विवाद पर बुधवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए Supreme Court of India ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कराना Election Commission of India के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसे अवैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है, इसलिए मतदाता सूची को सटीक, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाए रखने के लिए समय-समय पर विशेष पुनरीक्षण आवश्यक हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि SIR प्रक्रिया को केवल इसलिए असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह सामान्य पुनरीक्षण प्रणाली से अलग दिखाई देती है। अदालत के अनुसार संविधान और जनप्रतिनिधित्व कानून चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करने, संशोधित करने और आवश्यकता पड़ने पर विशेष पुनरीक्षण कराने की शक्ति देते हैं। न्यायालय ने यह भी माना कि मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट अथवा अपात्र प्रविष्टियों को हटाना और पात्र मतदाताओं का सही पंजीकरण सुनिश्चित करना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी है।
यह मामला उस समय सुर्खियों में आया जब बिहार सहित कई राज्यों में SIR प्रक्रिया को विभिन्न याचिकाओं के जरिए चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई थी कि इस प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हट सकते हैं, जिससे मतदान अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने अदालत में दलील दी कि SIR का उद्देश्य किसी नागरिक को मताधिकार से वंचित करना नहीं बल्कि मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी, शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है, ताकि चुनाव निष्पक्ष तरीके से संपन्न हो सकें।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया पारदर्शी और कानूनसम्मत होनी चाहिए। यदि किसी मतदाता की पात्रता या दस्तावेजों पर सवाल उठता है, तो उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनाव आयोग के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्पष्ट हो गया है कि विशेष परिस्थितियों में आयोग मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कर सकता है, बशर्ते प्रक्रिया निष्पक्ष और कानूनी मानकों के अनुरूप हो।




