असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने असम समझौते (असम एकॉर्ड) को लेकर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि वर्ष 1985 में हुए इस ऐतिहासिक समझौते के दौरान केवल असम की सीमा की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय पूरी भारत-बांग्लादेश सीमा की घेराबंदी की मांग की जानी चाहिए थी। मुख्यमंत्री का मानना है कि यदि उस समय व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सीमा पर फेंसिंग और निगरानी की व्यवस्था की गई होती, तो अवैध घुसपैठ और उससे जुड़ी कई समस्याओं पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि असम लंबे समय से अवैध प्रवासन की चुनौती का सामना कर रहा है। राज्य में जनसांख्यिकीय बदलाव, संसाधनों पर बढ़ता दबाव और नागरिकता से जुड़े विवाद लगातार चर्चा का विषय रहे हैं। उनके अनुसार, अवैध घुसपैठ का मुद्दा केवल असम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा प्रबंधन से जुड़ा व्यापक विषय है। इसलिए भारत-बांग्लादेश सीमा से लगे सभी राज्यों में समान रूप से मजबूत सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है।
हिमंत बिस्व सरमा ने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल सहित अन्य सीमावर्ती राज्यों में भी प्रभावी फेंसिंग और निगरानी तंत्र उतना ही महत्वपूर्ण है जितना असम में। उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की पहचान और नागरिकता संबंधी प्रक्रियाओं को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि सीमा सुरक्षा को लेकर किसी भी प्रकार की ढिलाई भविष्य में गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकती है।
गौरतलब है कि 15 अगस्त 1985 को केंद्र सरकार और असम आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संगठनों के बीच असम समझौता हुआ था। इस समझौते का उद्देश्य राज्य में लंबे समय से चल रहे आंदोलन का समाधान निकालना और अवैध प्रवासन के मुद्दे पर स्पष्ट नीति तैयार करना था। समझौते में सीमा सुरक्षा मजबूत करने, अवैध घुसपैठ रोकने तथा सीमा क्षेत्रों में आवश्यक सुरक्षा ढांचे के निर्माण जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए थे।
भारत और बांग्लादेश के बीच लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम जैसे राज्यों से होकर गुजरती है। पिछले कई वर्षों में इस सीमा पर फेंसिंग और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। हालांकि कुछ क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सुरक्षा व्यवस्था को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता बनी हुई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब सीमा सुरक्षा, अवैध प्रवासन और नागरिकता से जुड़े मुद्दे फिर से राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बने हुए हैं। ऐसे में उनका यह वक्तव्य न केवल असम बल्कि पूरे देश में सीमा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर नई चर्चा को जन्म दे सकता है।




